देशद्रोह पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया कड़ा फैसला, 1870 में बने कानून के तहत नए केस दर्ज करने पर रोक, पुराने मामलों में कार्रवाई भी रोकी

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देश में अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे देशद्रोह कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त फैसला दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि जब तक IPC की धारा 124-ए की री-एग्जामिन प्रोसेस पूरी नहीं हो जाती, तब तक इसके तहत कोई मामला दर्ज नहीं होगा। कोर्ट ने पहले से दर्ज मामलों में भी कार्रवाई पर रोक लगा दी है। वहीं, इस धारा में जेल में बंद आरोपी भी जमानत के लिए अपील कर सकते हैं।

केंद्र सरकार ने बुधवार को 1870 में बने यानी 152 साल पुराने राजद्रोह कानून (IPC की धारा 124-ए) पर सुप्रीम कोर्ट में जवाब दायर किया। इसके बाद कोर्ट ने केंद्र को इस कानून के प्रावधानों पर फिर से विचार करने की अनुमति दे दी।

सरकार बोली- कानून रहे पर जांच के बाद FIR दर्ज हो
इसके पहले सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि IPC की धारा 124-ए पर रोक न लगाई जाए। हालांकि, उन्होंने यह प्रस्ताव दिया है कि भविष्य में इस कानून के तहत FIR पुलिस अधीक्षक की जांच और सहमति के बाद ही दर्ज की जाए।

यदि नया केस दर्ज किया तो क्या होगा
CJI एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत त्रिपाठी और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने यह भी आदेश दिया है कि इसके बाद भी यदि कोई नया केस दर्ज किया जाता है तो पीड़ित पक्ष कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। निचली अदालतों से भी अपील है वे पारित आदेश को ध्यान में रखते हुए मांगी गई राहत की जांच करें। गौरतलब है कि कपिल सिब्बल ने कोर्ट में जानकारी दी है कि देशद्रोह कानून के तहत देशभर की जेलों में 13 हजार लोग आज तक बंद हैं।

केंद्र ने कहा- आरोपियों की जमानत पर जल्दी फैसला हो
केंद्र ने कहा कि जहां तक लंबित मामलों का सवाल है, संबंधित अदालतों को आरोपियों की जमानत पर शीघ्रता से विचार करने का निर्देश दिया जा सकता है। गौरतलब है कि देशद्रोह के मामलों में धारा 124-ए से जुड़ी 10 से ज्यादा याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

SG ने सरकार की तरफ से यह भी कहा

  • केंद्र ने कहा संज्ञेय अपराध को दर्ज होने से नहीं रोका जा सकता है। कानून के प्रभाव पर रोक लगाना सही नहीं हो सकता, इसलिए जांच के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी होना चाहिए। मामला तभी दर्ज हो, जब वह कानून के तहत तय मानकों के अनुरूप हो।
  • SG तुषार मेहता ने कहा कि देशद्रोह के लंबित मामलों की गंभीरता का पता नहीं है। इनमें शायद आतंकी या मनी लॉन्ड्रिंग का एंगल है। वे कोर्ट में विचाराधीन हैं, और हमें उनके फैसलों का इंतजार करना चाहिए।
  • केंद्र ने यह दलील भी दी कि कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा बरकरार रखे गए देशद्रोह के प्रावधानों पर रोक लगाने के लिए आदेश देना सही तरीका नहीं हो सकता है।

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