MP के 1,895 सरकारी स्कूलों में नहीं है एक भी शिक्षक, CAG रिपोर्ट पर हाई कोर्ट सख्त; राज्य सरकार से 4 हफ्ते में मांगा जवाब
भोपाल: मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी को लेकर एक गंभीर मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंच गया है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि प्रदेश के 1,895 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है, जबकि इनमें से 1,379 स्कूलों में विद्यार्थी नियमित रूप से नामांकित हैं।
मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने 14 जुलाई को की। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।
CAG रिपोर्ट ने खोली शिक्षा व्यवस्था की पोल
याचिका का आधार भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की वह ऑडिट रिपोर्ट है, जिसमें वर्ष 2018 से मार्च 2023 के बीच मध्य प्रदेश के 66,814 सरकारी स्कूलों की स्थिति का आकलन किया गया था।
रिपोर्ट में सामने आया कि प्रदेश के 1,895 सरकारी विद्यालयों में एक भी शिक्षक उपलब्ध नहीं था। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें 1,379 स्कूल ऐसे थे जहां छात्र पढ़ाई के लिए नामांकित थे, लेकिन पढ़ाने वाला कोई शिक्षक मौजूद नहीं था।
इस स्थिति को याचिका में बच्चों के संवैधानिक शिक्षा के अधिकार (Right to Education) का सीधा उल्लंघन बताया गया है।
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को जारी किया नोटिस
'लाइव लॉ' में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, इस मामले में अधिवक्ता सौरभ त्रिपाठी ने जनहित याचिका दायर की और स्वयं इसकी पैरवी भी की।
सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि संबंधित प्रतिवादियों को RAD (Registered Acknowledgement Due) माध्यम से नोटिस जारी किए जाएं और नोटिस प्राप्त होने के बाद चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत किया जाए।
अदालत ने निर्देश दिया कि निर्धारित समय सीमा में प्रक्रिया शुल्क जमा होने के बाद नोटिस जारी किए जाएं।
केवल शिक्षक नहीं, तैनाती व्यवस्था पर भी सवाल
याचिका में केवल शिक्षकों की कमी ही नहीं, बल्कि उनकी तैनाती की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
याचिका के अनुसार—
435 सरकारी स्कूल ऐसे मिले जहां एक भी छात्र नामांकित नहीं था, लेकिन वहां शिक्षक पदस्थ थे।
128 शिक्षकों को ऐसे 320 विद्यालयों में नियुक्त किया गया, जहां शिक्षकों के स्वीकृत पद ही उपलब्ध नहीं थे।
इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षक उपलब्ध होने के बावजूद उनकी तैनाती आवश्यकता और छात्र संख्या के अनुरूप नहीं की गई।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि शिक्षकों का वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से स्थानांतरण एवं पदस्थापना की जाती, तो बड़ी संख्या में स्कूल बिना शिक्षक के नहीं रहते।
शिक्षा के स्तर में गिरावट का भी उल्लेख
याचिका में माध्यमिक शिक्षा के परिणामों का हवाला देते हुए कहा गया है कि सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता लगातार प्रभावित हुई है।
दाखिल दस्तावेजों के अनुसार—
2018-19 में कक्षा 10 का उत्तीर्ण प्रतिशत लगभग 67 प्रतिशत था।
2021-22 तक यह घटकर लगभग 38 प्रतिशत रह गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि शिक्षकों की कमी और शैक्षणिक निगरानी में लापरवाही का सीधा असर छात्रों के परीक्षा परिणामों पर पड़ा है।
स्कूल निरीक्षण में भी लापरवाही के आरोप
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि प्रदेश के कई जिलों में शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने नियमानुसार विद्यालयों का निरीक्षण नहीं किया।
इंदौर, मंडला, श्योपुर सहित कई जिलों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि नियमित निरीक्षण नहीं होने के कारण स्कूलों की वास्तविक स्थिति लंबे समय तक प्रशासन की नजर से बाहर रही।
याचिका में कहा गया है कि यदि समय-समय पर निरीक्षण होता, तो बिना शिक्षक वाले विद्यालयों की समस्या पहले ही सामने आ जाती।
अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति पर भी उठे सवाल
याचिका में एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा भी उठाया गया है।
आरोप लगाया गया है कि—
जिला शिक्षा अधिकारी (DEO),
ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO),
तथा जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET)
से जुड़े 14 अधिकारियों को अन्य विभागों में कार्य करने के लिए प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया गया, जबकि उनका वेतन लगातार स्कूल शिक्षा विभाग से दिया जाता रहा।
याचिका के अनुसार, इन अधिकारियों के वेतन पर करीब 3.27 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे शिक्षा विभाग में प्रशासनिक निगरानी और कमजोर हुई।
संविधान के शिक्षा अधिकार का हवाला
याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण एवं निःशुल्क शिक्षा का अधिकार प्राप्त है।
यदि किसी विद्यालय में शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं, तो बच्चों के शिक्षा के अधिकार का वास्तविक क्रियान्वयन संभव नहीं है।
याचिका में यह भी कहा गया कि केवल स्कूल भवन खोल देना पर्याप्त नहीं है; गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता अनिवार्य है।
कोर्ट से क्या-क्या मांग की गई?
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी करने की मांग की है, जिनमें प्रमुख हैं—
जिन 1,895 स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, वहां निश्चित समय सीमा के भीतर शिक्षकों की नियुक्ति की जाए।
पूरे प्रदेश में शिक्षकों की पदस्थापना व्यवस्था की स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
शिक्षक तैनाती के लिए पारदर्शी एवं छात्र संख्या आधारित नीति बनाई जाए।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए नियमित मॉनिटरिंग व्यवस्था लागू की जाए।
फिलहाल क्या स्थिति है?
हाई कोर्ट ने अभी इस मामले में कोई अंतिम टिप्पणी या निर्देश जारी नहीं किया है।
अदालत ने केवल राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। सरकार के जवाब और आगामी सुनवाई के बाद यह तय होगा कि कोर्ट इस मामले में आगे कौन से निर्देश जारी करता है।
यदि याचिका में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक पदस्थापना नीति और प्रशासनिक जवाबदेही पर व्यापक असर पड़ सकता है।
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने CAG रिपोर्ट आधारित PIL पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।
CAG ऑडिट में 66,814 सरकारी स्कूलों का अध्ययन किया गया।
1,895 स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं, इनमें 1,379 स्कूलों में छात्र नामांकित हैं।
435 बिना छात्रों वाले स्कूलों में शिक्षक तैनात होने का दावा।
320 स्कूलों में स्वीकृत पद नहीं होने के बावजूद 128 शिक्षकों की पदस्थापना का आरोप।
कक्षा 10 का उत्तीर्ण प्रतिशत 67% से घटकर 38% होने का उल्लेख।
कोर्ट ने राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।
याचिका में शिक्षा के अधिकार के उल्लंघन का हवाला देते हुए सभी शिक्षकविहीन स्कूलों में शीघ्र नियुक्ति और उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करने की मांग की गई है।
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