आदिवासी ज्ञान से सामने आए 37 औषधीय पौधे, कई बीमारियों में उपयोगी होने के संकेत; 22 का तैयार हुआ वैज्ञानिक मोनोग्राफ
भोपाल। मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में पीढ़ियों से इस्तेमाल किए जा रहे औषधीय पौधों और पारंपरिक उपचार पद्धतियों को वैज्ञानिक तरीके से दर्ज करने की दिशा में बड़ा काम सामने आया है। भोपाल के पंडित खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय के चार साल से अधिक समय तक चले शोध में डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर और शहडोल जिलों के आदिवासी वैद्यों के पारंपरिक ज्ञान का अध्ययन किया गया। शोध में 348 औषधीय पौधों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई, जिनमें से 37 पौधों को विशेष रूप से आगे के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए चिन्हित किया गया है।
हालांकि इसे यह कहना सही नहीं होगा कि इन 37 पौधों से कैंसर, डायबिटीज या लकवे का इलाज साबित हो गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इन पौधों के पारंपरिक इस्तेमाल और शुरुआती प्रयोगात्मक/क्लीनिकल अध्ययनों में कुछ संभावनाएं सामने आई हैं। बड़े स्तर के परीक्षण और वैज्ञानिक पुष्टि के बाद ही किसी पौधे को प्रमाणित उपचार या दवा के रूप में मान्यता मिल सकती है। केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान परिषद भी पारंपरिक दावों के वैज्ञानिक सत्यापन को संभावित दवा-विकास की दिशा में महत्वपूर्ण मानती है।
चार आदिवासी बहुल जिलों में हुआ अध्ययन
यह शोध मध्य प्रदेश के डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर और शहडोल जिलों में किया गया। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से गोंड और बैगा समुदायों के पारंपरिक वैद्यों से जानकारी जुटाई गई।
शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि स्थानीय वैद्य किन पौधों का इस्तेमाल करते हैं, पौधे के किस हिस्से का उपयोग किया जाता है और किस बीमारी या समस्या में उसका इस्तेमाल किया जाता है।
शोध के दौरान सामने आया कि कई पौधे ऐसे हैं जिनका पारंपरिक इस्तेमाल लंबे समय से होता आ रहा है और जिनका उल्लेख आयुर्वेद से जुड़े ग्रंथों अथवा औषधीय संदर्भों में भी मिलता है।
348 पौधों की जानकारी जुटाई गई
शोध की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक 348 औषधीय पौधों का दस्तावेजीकरण है। इन पौधों का उपयोग आदिवासी वैद्य अलग-अलग बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं के लिए करते हैं।
इनमें कुछ पौधों की जड़, कुछ की पत्ती, तना, बीज या अन्य हिस्सों का इस्तेमाल किया जाता है।
शोधकर्ताओं ने पौधों की पहचान, स्थानीय नाम, अलग-अलग भाषाओं में इस्तेमाल होने वाले नाम, संरचना और रासायनिक गुणों जैसी जानकारियां भी दर्ज की हैं।
37 पौधों पर विशेष फोकस
348 पौधों में से 37 पौधों को आगे के वैज्ञानिक अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया है। इनमें से 22 पौधों के मोनोग्राफ तैयार किए जा चुके हैं।
मोनोग्राफ में किसी औषधीय पौधे की पहचान से लेकर उसकी संरचना, इस्तेमाल होने वाला हिस्सा, सूक्ष्मदर्शीय विशेषताएं, भौतिक-रासायनिक मानक और रासायनिक घटकों जैसी जानकारियां शामिल की जाती हैं।
इस तरह का दस्तावेज भविष्य में पौधों की वैज्ञानिक पहचान और गुणवत्ता तय करने में मदद कर सकता है।
किन बीमारियों में इस्तेमाल करते हैं आदिवासी वैद्य?
शोध में सामने आया कि इन औषधीय पौधों का पारंपरिक इस्तेमाल कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं में किया जाता है। इनमें डायबिटीज, घाव भरने, बालों की समस्या, आर्थराइटिस, त्वचा रोग, पीलिया, पेट संबंधी बीमारी, मलेरिया, टायफाइड, सर्पदंश, हीट स्ट्रोक, दांत दर्द और कुछ कैंसर संबंधी समस्याएं शामिल हैं।
कुछ पौधों का इस्तेमाल लकवा और हृदय संबंधी समस्याओं के लिए भी पारंपरिक रूप से किए जाने की जानकारी मिली है।
लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि पारंपरिक इस्तेमाल और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध इलाज एक ही बात नहीं है। किसी पौधे से बीमारी का इलाज संभव होने का दावा करने से पहले नियंत्रित और बड़े स्तर के वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी होते हैं।
तीन पौधों पर चूहों में प्रयोग
शोध के अगले चरण में कुछ पौधों का प्रयोगात्मक अध्ययन भी किया गया। रिपोर्ट के अनुसार तीन पौधों पर चूहों में प्रायोगिक अध्ययन किया गया।
इनमें गोंदकतीरा या कुल्लू (Sterculia urens) के बारे में घाव भरने की क्षमता का अध्ययन किया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रयोग में इसकी क्षमता की तुलना पोवीडोन आयोडीन से की गई।
इसी तरह वन बरमसिया या दंडोतफला (Tridax procumbens) पर बालों की वृद्धि से संबंधित अध्ययन किया गया।
चिपकी (Xanthium strumarium) के मूत्रवर्धक प्रभाव का भी अध्ययन किया गया, जिसे मूत्र संबंधी संक्रमण और किडनी से जुड़ी कुछ समस्याओं में संभावित उपयोग के संदर्भ में देखा गया।
इन शुरुआती परिणामों को अंतिम चिकित्सा प्रमाण नहीं माना जा सकता। आगे बड़े और नियंत्रित अध्ययनों की जरूरत होगी।
पांच पौधों पर छोटे स्तर का क्लीनिकल अध्ययन
शोध में कुछ पौधों पर पायलट क्लीनिकल अध्ययन भी किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक पांच पौधों का अलग-अलग करीब 10 से 15 रोगियों पर अध्ययन किया गया और शुरुआती परिणाम सकारात्मक बताए गए हैं।
अब इन पौधों में से कुछ पर बड़े समूह के साथ आगे अध्ययन किए जाने की योजना है।
यही चरण यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि शुरुआती परिणाम बड़े स्तर पर भी दोहराए जाते हैं या नहीं और उपचार के दौरान इनका प्रभाव तथा सुरक्षा कितनी है।
24 पौधों की जानकारी साझा नहीं करना चाहते वैद्य
शोध के दौरान एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि 24 अन्य पौधों का इस्तेमाल आदिवासी वैद्य कैंसर, सर्पदंश और अन्य बीमारियों के पारंपरिक उपचार में करते हैं, लेकिन वे इन पौधों के बारे में विस्तृत जानकारी साझा नहीं करना चाहते।
पारंपरिक ज्ञान अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ता है। ऐसे ज्ञान का दस्तावेजीकरण करते समय समुदायों के अधिकार और उनके पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
फार्माकोपिया में शामिल करने की तैयारी
शोध के आधार पर मध्य प्रदेश सरकार की ओर से इन पौधों को भारतीय फार्माकोपिया में स्थान दिलाने के लिए केंद्रीय आयुष मंत्रालय को प्रस्ताव भेजने की बात सामने आई है।
हालांकि इसके लिए पौधों की पहचान, गुणवत्ता, रासायनिक संरचना, प्रभाव और सुरक्षा समेत कई वैज्ञानिक मानकों पर आगे परीक्षण जरूरी होगा।
यदि ये परीक्षण सफल रहे तो भविष्य में कुछ पौधों को औषधीय मानकों के तहत आधिकारिक स्थान मिलने की संभावना बन सकती है।
2024 में हुई थी संगोष्ठी और कार्यशालाएं
इस शोध को आगे बढ़ाने के लिए जनवरी 2024 में भोपाल में संगोष्ठी आयोजित की गई थी। इसके बाद तीन कार्यशालाएं भी कराई गईं, जिनमें देशभर के औषधीय पौधों और द्रव्यगुण विशेषज्ञों को बुलाया गया।
जिन पौधों की पहचान में कठिनाई थी, उनके बारे में विशेषज्ञों की मदद ली गई। इसके अलावा चारों जिलों में फील्ड स्तर पर जानकारी जुटाने के लिए शोधकर्ताओं की टीमें भी लगाई गईं।
आदिवासी ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल
इस पूरी रिसर्च का महत्व सिर्फ 37 पौधों तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में सदियों से मौजूद स्थानीय औषधीय ज्ञान को वैज्ञानिक तरीके से दस्तावेजित करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है।
केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान परिषद के अनुसार स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं और पारंपरिक औषधीय दावों का दस्तावेजीकरण तथा उनका वैज्ञानिक सत्यापन भविष्य में नए उपचार और औषधीय विकास के लिए उपयोगी आधार बन सकता है।
मंडला क्षेत्र में गोंड और बैगा समुदायों के औषधीय ज्ञान पर पहले भी वैज्ञानिक अध्ययन प्रकाशित हो चुके हैं, जिससे इस क्षेत्र में पारंपरिक वनस्पति-आधारित उपचार की समृद्ध परंपरा का पता चलता है।
अभी क्या अपडेट है?
26 अगस्त 2026 को सामने आई जानकारी के अनुसार 37 औषधीय पौधों की पहचान की गई है और इनमें से 22 के मोनोग्राफ तैयार हो चुके हैं। तीन पौधों पर प्रयोगात्मक और पांच पर छोटे स्तर के क्लीनिकल अध्ययन किए जा चुके हैं। आगे कुछ पौधों पर बड़े समूह में अध्ययन किया जाएगा।
फिलहाल इन पौधों को कैंसर, डायबिटीज या लकवे का प्रमाणित इलाज बताना जल्दबाजी होगी। रिसर्च में इनके पारंपरिक उपयोग और शुरुआती वैज्ञानिक संभावनाएं सामने आई हैं। अंतिम चिकित्सा मान्यता के लिए आगे के विस्तृत वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी हैं।
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