बस्तर का अनोखा मंदिर: मां हिंगलाजिन के साथ होती है पूर्व पुजारियों की पूजा

बस्तर का अनोखा मंदिर: मां हिंगलाजिन के साथ होती है पूर्व पुजारियों की पूजा

बस्तर।** छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित मां हिंगलाजिन माता का मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं और जनजातीय संस्कृति के लिए खास पहचान रखता है। यहां देवी की पूजा-अर्चना के साथ दिवंगत पूर्व पुजारियों की प्रतिमाओं की भी नियमित रूप से पूजा की जाती है। मंदिर की यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र होने के साथ ही पीढ़ियों से पूजा-पाठ की जिम्मेदारी निभाने वाले पुजारियों के प्रति सम्मान को भी दर्शाती है। मनोकामना पूरी होने पर भक्त माता को चांदी के छत्र अर्पित करते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 गिरोला गांव में स्थित है मां हिंगलाजिन का मंदिर

मां हिंगलाजिन माता का मंदिर जगदलपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर बस्तर विकासखंड के गिरोला गांव में स्थित है। मां हिंगलाजिन को मां दंतेश्वरी का स्वरूप और बस्तर की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा और तेलंगाना से भी श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।

बस्तर अपनी जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक रीति-रिवाजों और देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था के लिए जाना जाता है। मां हिंगलाजिन का मंदिर इसी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां पूजा-अर्चना के साथ स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं का भी विशेष महत्व है।

 देवी के साथ पूर्व पुजारियों की प्रतिमाओं की भी पूजा

मंदिर की सबसे खास परंपरा यहां दिवंगत पूर्व पुजारियों की प्रतिमाओं की पूजा करना है। मंदिर के प्रधान पुजारी लोकनाथ कश्यप के अनुसार, जिन पुजारियों का निधन हो चुका है, उनकी प्रतिमाएं मंदिर परिसर में स्थापित की गई हैं। इन प्रतिमाओं की नवरात्रि के दौरान ही नहीं, बल्कि साल के अन्य दिनों में भी पूजा-अर्चना की जाती है।

यह परंपरा मंदिर में पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक सेवा और पूजा-पाठ की जिम्मेदारी निभाने वाले पुजारियों के प्रति सम्मान को दर्शाती है। प्रधान पुजारी लोकनाथ कश्यप बताते हैं कि राजा-महाराजाओं के समय से स्थापित इस मंदिर में उनका परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूजा-अर्चना करता आ रहा है।

इस तरह मंदिर में देवी की आराधना के साथ उन लोगों की स्मृति को भी महत्व दिया जाता है, जिन्होंने अपना जीवन माता की सेवा और धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में लगाया।

 मनोकामना पूरी होने पर चढ़ाते हैं चांदी के छत्र

मां हिंगलाजिन मंदिर में चांदी के छत्र चढ़ाने की परंपरा भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। मान्यता है कि श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं और मनोकामना पूरी होने पर माता को चांदी के छोटे-बड़े छत्र अर्पित करते हैं।

इन छत्रों को माता के सिंहासन की छतरी भी कहा जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार माता को छत्र चढ़ाते हैं। इसी परंपरा के चलते मंदिर के गर्भगृह में चांदी के छत्रों का बड़ा संग्रह दिखाई देता है।

मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। श्रद्धालु यहां परिवार की सुख-शांति, खुशहाली और समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है और लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार ज्योत प्रज्वलित कर माता की आराधना करते हैं।

मोरिया बाजा की धुन से गूंजता है माता का दरबार

मां हिंगलाजिन मंदिर की धार्मिक पहचान में बस्तर का पारंपरिक मोरिया बाजा भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, माता की आराधना के दौरान मोरिया बाजा बजाने से देवी प्रसन्न होती हैं। इसी कारण पूजा-अर्चना और आरती के समय इस पारंपरिक वाद्य का उपयोग किया जाता है।

मोरिया बाजा की धुन मंदिर के धार्मिक वातावरण को बस्तर की लोकसंस्कृति से जोड़ती है। यहां धार्मिक आस्था और पारंपरिक संगीत का संगम देखने को मिलता है, जो इस मंदिर को क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ता है।

नवरात्रि में प्रज्वलित हुईं 770 ज्योत

नवरात्रि के दौरान मां हिंगलाजिन मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु ज्योत प्रज्वलित कर माता के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। मंदिर के प्रधान पुजारी लोकनाथ कश्यप के अनुसार, इस बार नवरात्रि में कुल 770 ज्योत प्रज्वलित की गईं। इनमें तेल की 645 और घी की 125 ज्योत शामिल थीं।

श्रद्धालु इन ज्योत के माध्यम से माता से परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और जीवन में शांति की कामना करते हैं। नवरात्रि के दिनों में मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है।

2016 में हुआ था मंदिर का जीर्णोद्धार

मां हिंगलाजिन मंदिर का वर्ष 2016 में जीर्णोद्धार किया गया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जीर्णोद्धार के बाद से मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखी गई है। अब यह मंदिर बस्तर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अपनी अलग पहचान रखता है।

मां हिंगलाजिन मंदिर की खासियत केवल यहां होने वाली पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। पूर्व पुजारियों की प्रतिमाओं की पूजा, मनोकामना पूरी होने पर चांदी के छत्र चढ़ाने की परंपरा और मोरिया बाजा की धुन इसे विशिष्ट बनाती हैं। यही वजह है कि यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ बस्तर की लोकसंस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का भी प्रतीक माना जाता है।