Jagannath Rath Yatra 2026: वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शुरू हुई विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा, नंदीघोष, तालध्वज और देवदलन रथों पर विराजमान होंगे भगवान; देश-विदेश से उमड़ा आस्था का सैलाब

Jagannath Rath Yatra 2026: वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शुरू हुई विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा, नंदीघोष, तालध्वज और देवदलन रथों पर विराजमान होंगे भगवान; देश-विदेश से उमड़ा आस्था का सैलाब

ओडिशा के पुरी स्थित 12वीं शताब्दी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में गुरुवार को विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 का शुभारंभ धार्मिक परंपराओं और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुआ। लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा को मंदिर के गर्भगृह से पारंपरिक 'पहंडी बीजे' (Pahandi Bije) अनुष्ठान के तहत बाहर लाया गया। इसके बाद तीनों देवताओं को उनके भव्य रथों पर विराजमान कराया जाएगा और फिर श्रद्धालु विशाल रस्सियों से रथों को खींचते हुए लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर तक ले जाएंगे।

इस वर्ष की रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होकर 27 जुलाई 2026 को 'नीलाद्री बीजे' (Niladri Bije) के साथ संपन्न होगी। इस दौरान भगवान नौ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहेंगे, जिसे भगवान जगन्नाथ का मायका माना जाता है।

सुबह से मंदिर परिसर में गूंजे वैदिक मंत्र

रथ यात्रा की शुरुआत सुबह ब्रह्म मुहूर्त से ही धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हुई। मंदिर के सेवायतों और पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चार, हवन और विशेष पूजा-अर्चना संपन्न कराई। परंपरा के अनुसार सबसे पहले तीनों रथों का पूजन किया गया और उनके शीर्ष पर स्थापित ध्वज देवताओं की विधिवत प्रतिष्ठा की गई।

इस दौरान—

नंदीघोष रथ पर श्रीहनुमान
तालध्वज रथ पर भगवान नृसिंह
देवदलन (दर्पदलन) रथ पर मां भुवनेश्वरी

की स्थापना की गई। धार्मिक मान्यता है कि ये देवता पूरी यात्रा के दौरान रथों और भगवान की रक्षा करते हैं।

पहंडी बीजे: गर्भगृह से बाहर आए भगवान बलभद्र

सुबह सबसे पहले भगवान बलभद्र को पारंपरिक शैली में मंदिर से बाहर लाया गया। सेवायत विशेष लय और भक्ति संगीत के बीच भगवान को कंधों पर लेकर सिंहद्वार तक पहुंचे। इसके बाद देवी सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ को बाहर लाने की प्रक्रिया पूरी होगी।

इस पूरे आयोजन के दौरान "जय जगन्नाथ" के उद्घोष से पूरा पुरी शहर भक्तिमय हो उठा।

तीनों रथों की अपनी अलग पहचान

रथ यात्रा में तीनों देवताओं के लिए हर वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं। इनका निर्माण अक्षय तृतीया से शुरू होता है और विशेष प्रकार की लकड़ी का उपयोग किया जाता है।

1. नंदीघोष रथ (भगवान जगन्नाथ)
ऊंचाई लगभग 45 फीट
16 विशाल पहिए
पीले और लाल रंग की सजावट
सबसे बड़ा रथ
2. तालध्वज रथ (भगवान बलभद्र)
14 पहिए
हरे और लाल रंग का आवरण
3. देवदलन (दर्पदलन) रथ (देवी सुभद्रा)
12 पहिए
काले और लाल रंग की सजावट

तीनों रथ मंदिर के सिंहद्वार पर सुबह से ही तैयार खड़े रहे, जहां हजारों श्रद्धालु उनके दर्शन करते रहे।

भारी बारिश भी नहीं रोक सकी श्रद्धालुओं की आस्था

सुबह पुरी में रुक-रुक कर बारिश होती रही, लेकिन इसका श्रद्धालुओं के उत्साह पर कोई असर नहीं पड़ा। मंदिर परिसर, ग्रैंड रोड (बड़ा डांडा) और आसपास के क्षेत्रों में लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए घंटों पहले से जमा हो गए।

देश के लगभग हर राज्य के अलावा अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, बांग्लादेश, नेपाल, मॉरीशस, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देशों से भी भक्त पुरी पहुंचे।

एक विदेशी श्रद्धालु ने कहा कि वह वर्षों से भगवान जगन्नाथ के दर्शन का सपना देख रही थीं और पहली बार रथ यात्रा में शामिल होने का अवसर मिला है।

पहली बार रथ यात्रा देखने पहुंचे सोनू निगम

प्रसिद्ध गायक सोनू निगम भी इस वर्ष रथ यात्रा में शामिल होने पुरी पहुंचे।

उन्होंने कहा कि—

"मैंने भगवान जगन्नाथ के लिए पहले भी कई बार भक्ति गीत गाए हैं, लेकिन पहली बार यहां आकर रथ यात्रा देख रहा हूं। यहां का आध्यात्मिक वातावरण और व्यवस्था जीवनभर याद रहेगी।"

धर्मेंद्र प्रधान ने की शंकराचार्य से मुलाकात

रथ यात्रा शुरू होने से पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पुरी पहुंचकर गोवर्धन पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य से मुलाकात की और उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद उन्होंने भगवान जगन्नाथ के दर्शन भी किए।

क्यों निकाली जाती है रथ यात्रा?

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ वर्ष में एक बार अपने भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर अर्थात गुंडिचा मंदिर जाते हैं।

इसी यात्रा को जगन्नाथ रथ यात्रा कहा जाता है।

गुंडिचा मंदिर में भगवान नौ दिनों तक विश्राम करते हैं। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। अंत में नीलाद्री बीजे के साथ भगवान पुनः गर्भगृह में विराजमान होते हैं।

छेरा पहरा: गजपति महाराजा निभाते हैं अनोखी परंपरा

रथ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान 'छेरा पहरा' होता है।

इस परंपरा में पुरी के गजपति महाराजा सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई करते हैं और सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं।

इस परंपरा का संदेश है कि भगवान के सामने राजा और आम व्यक्ति सभी समान हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम

इस वर्ष रथ यात्रा के लिए ओडिशा सरकार ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है।

हजारों पुलिसकर्मी तैनात
AI आधारित निगरानी
सैकड़ों CCTV कैमरे
ड्रोन से निगरानी
बम निरोधक दस्ते
त्वरित चिकित्सा सहायता केंद्र
आपदा प्रबंधन टीमें
भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष बैरिकेडिंग

मौसम विभाग द्वारा बारिश की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने अतिरिक्त व्यवस्थाएं भी की हैं।

रथ यात्रा का सांस्कृतिक महत्व

जगन्नाथ रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का भी सबसे बड़ा उत्सव है।

रथ यात्रा के दौरान—

ओडिशी नृत्य प्रस्तुतियां
भजन-कीर्तन
संकीर्तन मंडलियां
वैदिक मंत्रोच्चार
पारंपरिक वाद्य यंत्रों की प्रस्तुति

पूरे पुरी शहर को आध्यात्मिक वातावरण में बदल देते हैं।

27 जुलाई तक चलेंगे प्रमुख आयोजन

रथ यात्रा के दौरान प्रमुख कार्यक्रम इस प्रकार रहेंगे—

16 जुलाई – रथ यात्रा
गुंडिचा मंदिर प्रवास
हेरा पंचमी
बहुदा यात्रा (वापसी यात्रा)
सुनाबेशा (स्वर्ण वेश)
अधरपाना अनुष्ठान
27 जुलाई – नीलाद्री बीजे (समापन)
विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में शामिल

पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा को दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है। हर वर्ष भारत और विदेशों से लाखों श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं। यह केवल आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्ष पुरानी धार्मिक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक माना जाता है।

तथ्य: रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को पहली बार मंदिर से बाहर निकलकर सभी श्रद्धालुओं को दर्शन देने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं, इसलिए इसे "जन-जन के भगवान की यात्रा" भी कहा जाता है।