केन-बेतवा परियोजना के विरोध में राहुल गांधी से मिले प्रभावित ग्रामीण, मुआवजा-पुनर्वास से लेकर विस्थापन तक उठे सवाल

केन-बेतवा परियोजना के विरोध में राहुल गांधी से मिले प्रभावित ग्रामीण, मुआवजा-पुनर्वास से लेकर विस्थापन तक उठे सवाल

छतरपुर: मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर प्रभावित ग्रामीणों, किसानों और आदिवासी परिवारों की नाराजगी लगातार सामने आ रही है। इसी बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने परियोजना का विरोध कर रहे प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की और प्रभावित लोगों की समस्याएं व मांगें सुनीं। प्रतिनिधिमंडल ने जमीन, मुआवजा, विस्थापन और पुनर्वास से जुड़े मुद्दे राहुल गांधी के सामने रखे। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब परियोजना को लेकर छतरपुर और पन्ना क्षेत्र में प्रभावित परिवारों के बीच मुआवजे और पुनर्वास को लेकर विरोध जारी है।

क्यों हो रहा है विरोध?

केन-बेतवा परियोजना का विरोध कर रहे ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता जमीन और घर के बदले मिलने वाला मुआवजा, पुनर्वास और आजीविका है। प्रभावित परिवारों का कहना है कि परियोजना के कारण जिन लोगों की जमीन, घर या आजीविका प्रभावित होगी, उन्हें उचित मुआवजा और पुनर्वास का लाभ मिलना चाहिए।

विरोध प्रदर्शनों में यह मांग भी उठी है कि हर प्रभावित परिवार की पहचान सही तरीके से की जाए, ताकि कोई परिवार सरकारी मुआवजे या पुनर्वास के लाभ से बाहर न रह जाए। हाल के महीनों में प्रभावित इलाकों में मुआवजा और पुनर्वास को लेकर कई तरह के आंदोलन भी हुए हैं।

राहुल गांधी ने क्या किया?

राहुल गांधी से मुलाकात के दौरान केन-बेतवा परियोजना का विरोध कर रहे प्रतिनिधिमंडल ने प्रभावित परिवारों की स्थिति और अपनी मांगों की जानकारी दी। बातचीत में मुख्य रूप से जमीन अधिग्रहण, उचित मुआवजा, विस्थापन और पुनर्वास के मुद्दे सामने रखे गए।

राहुल गांधी पहले भी केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित आदिवासी समुदायों के विस्थापन का मुद्दा उठा चुके हैं। हाल ही में केंद्र के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने परियोजना से आदिवासियों के विस्थापन से संबंधित मिली शिकायतों को मध्य प्रदेश सरकार के पास उचित कार्रवाई के लिए भेजे जाने की जानकारी लोकसभा में दी थी।

क्या है केन-बेतवा लिंक परियोजना?

केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना है, जिसका उद्देश्य केन नदी के पानी को बेतवा नदी की ओर ले जाना है। परियोजना में पन्ना और छतरपुर जिलों के बीच केन नदी पर 96.7 मीटर ऊंचे दौधन बांध का निर्माण और करीब 218 किलोमीटर लंबी लिंक नहर का निर्माण शामिल है।

केंद्र सरकार के अनुसार परियोजना की कुल लागत 44,605 करोड़ रुपये आंकी गई है। केंद्र ने इसके लिए 39,317 करोड़ रुपये की सहायता मंजूर की है, जिसमें 36,290 करोड़ रुपये अनुदान और 3,027 करोड़ रुपये ऋण के रूप में हैं।

बुंदेलखंड को क्या फायदा मिलने का दावा?

सरकारी योजना के मुताबिक केन-बेतवा परियोजना से बुंदेलखंड के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल की सुविधा बढ़ाने का लक्ष्य है। परियोजना से करीब 10.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई, लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने तथा 103 मेगावाट हाइड्रो और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के कई जिलों को परियोजना से लाभ मिलने की उम्मीद जताई गई है। सरकार का तर्क है कि इससे कृषि गतिविधियां बढ़ेंगी, रोजगार के अवसर बनेंगे और पानी की कमी के कारण होने वाला पलायन कम हो सकता है।

कितने परिवार प्रभावित होने का अनुमान?

परियोजना के सामाजिक प्रभाव को लेकर सरकारी आंकड़ों में अलग-अलग चरणों में अलग अनुमान सामने आए हैं। केंद्र सरकार ने 2025 में लोकसभा में बताया था कि दौधन बांध के लिए भूमि अधिग्रहण की धारा 11 की अधिसूचना के समय लगभग 7,193 परिवारों को परियोजना से प्रभावित माना गया था। मध्य प्रदेश सरकार ने इनके लिए विशेष पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन पैकेज भी मंजूर किया है।

इससे पहले 2022 में केंद्र सरकार ने बताया था कि दौधन जलाशय से करीब 9,000 हेक्टेयर क्षेत्र के डूब में आने का अनुमान था, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व का कोर और बफर क्षेत्र तथा 10 गांव शामिल थे और उस आकलन में करीब 1,913 परिवार प्रभावित बताए गए थे। बाद के आकलनों में प्रभावित परिवारों की संख्या बढ़ी है।

पन्ना टाइगर रिजर्व को लेकर भी चिंता

केन-बेतवा परियोजना का सबसे संवेदनशील पहलू इसका पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के वन क्षेत्र पर प्रभाव है। सरकारी पर्यावरणीय आकलन के अनुसार परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास करीब 6,017 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होने की पहचान की गई है।

परियोजना को पर्यावरण और वन्यजीव से जुड़ी मंजूरियां मिल चुकी हैं, लेकिन इसके प्रभावों को कम करने के लिए Integrated Landscape Management Plan तैयार किया गया है। इसमें वन्यजीव कॉरिडोर, बाघ, गिद्ध और घड़ियाल जैसे प्रमुख वन्यजीवों के संरक्षण और आवास सुधार पर ध्यान देने की बात कही गई है।

सरकार और प्रभावित परिवारों के तर्क अलग-अलग

परियोजना के समर्थन में सरकार का कहना है कि बुंदेलखंड लंबे समय से सूखे और पानी की कमी से प्रभावित रहा है। केन का पानी बेतवा बेसिन तक पहुंचने से क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ सकती है।

वहीं प्रभावित परिवारों और विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि विकास परियोजना के लाभ के साथ विस्थापित होने वाले लोगों के अधिकारों और आजीविका की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। यही वजह है कि मुआवजा, पुनर्वास और प्रभावित परिवारों की सूची को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

आंदोलन भी रहा चर्चा में

2026 में परियोजना को लेकर छतरपुर-पन्ना क्षेत्र में विरोध प्रदर्शनों ने कई बार जोर पकड़ा। प्रभावित लोगों ने चिता आंदोलन, जल सत्याग्रह और भूख हड़ताल जैसे प्रतीकात्मक तरीकों से अपनी मांगें उठाईं। कुछ प्रदर्शनों में प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति भी बनी और प्रभावित गांवों में मुआवजा दावों के दोबारा सर्वे की प्रक्रिया शुरू किए जाने की खबरें सामने आईं।

अब आगे क्या?

केन-बेतवा परियोजना को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि विकास और विस्थापन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा। सरकार परियोजना से बुंदेलखंड को मिलने वाले पानी और सिंचाई के लाभ को महत्वपूर्ण मानती है, जबकि प्रभावित परिवार उचित मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग कर रहे हैं।

राहुल गांधी की प्रभावित प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा में आया है। आने वाले समय में मुआवजा दावों की जांच, पुनर्वास की प्रक्रिया और प्रभावित परिवारों की शिकायतों पर सरकार की कार्रवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में अहम होगी।