ग्वालियर की 120 साल पुरानी नैरोगेज का सफर खत्म! हेरिटेज ट्रेन भी नहीं लौटेगी, बानमोर तक 20 किमी ट्रैक उखाड़ने की तैयारी
Gwalior Narrow Gauge: कभी ग्वालियर की पहचान रही दो फीट चौड़ी नैरोगेज अब इतिहास के पन्नों में सिमटने जा रही है। कोरोना काल में बंद हुई इस ऐतिहासिक रेल को हेरिटेज ट्रेन के रूप में फिर चलाने की उम्मीद भी अब खत्म हो गई है। रेलवे ने हेरिटेज ट्रेन के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और ग्वालियर से बानमोर तक करीब 20 किलोमीटर बचे नैरोगेज ट्रैक को हटाने के लिए जल्द टेंडर जारी किए जाने की तैयारी है।
ग्वालियर। ग्वालियर की पहचान से जुड़ी रही करीब 120 साल पुरानी नैरोगेज रेल अब सिर्फ तस्वीरों, पुराने कोच और यादों में दिखाई देगी। जिस नैरोगेज ट्रेन को कभी शहर और आसपास के क्षेत्रों के बीच परिवहन की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता था, उसके दोबारा हेरिटेज ट्रेन के रूप में पटरी पर लौटने की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई है।
रेलवे ने ग्वालियर-बानमोर के बीच नैरोगेज को हेरिटेज ट्रेन के रूप में संचालित करने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी है। अब इस मार्ग पर मौजूद करीब 20 किलोमीटर लंबे नैरोगेज ट्रैक को पूरी तरह हटाने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए रेलवे की ओर से जल्द टेंडर जारी किए जाने की बात सामने आई है।
सिंधिया रियासतकाल में शुरू हुई थी नैरोगेज
ग्वालियर की नैरोगेज रेल का इतिहास सिंधिया रियासत के दौर से जुड़ा है। करीब दो फीट चौड़ी पटरी पर चलने वाली यह रेल लंबे समय तक ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों की परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा रही।
इसकी खासियत सिर्फ इसका छोटा ट्रैक या संकरी पटरी नहीं थी, बल्कि यह ग्वालियर की ऐतिहासिक पहचान का भी हिस्सा बन चुकी थी। समय के साथ बड़ी लाइन का विस्तार हुआ और नैरोगेज रेल का महत्व कम होता गया, लेकिन ग्वालियर के लोगों के लिए यह ट्रेन आज भी पुरानी यादों से जुड़ी हुई है।
कोरोना काल में बंद हुआ था संचालन
नैरोगेज ट्रेन का नियमित संचालन कोरोना काल के दौरान बंद हो गया था। इसके बाद दोबारा इस रेल सेवा को शुरू नहीं किया गया। धीरे-धीरे इसके ट्रैक और रेलवे से जुड़ा ढांचा इस्तेमाल से बाहर होता चला गया।
ट्रेन बंद होने के बाद स्थानीय स्तर पर इसे किसी न किसी रूप में संरक्षित करने की मांग उठती रही। लोगों और जनप्रतिनिधियों की ओर से मांग थी कि पूरी रेल सेवा भले ही व्यावसायिक रूप से शुरू न हो, लेकिन ग्वालियर की ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिए इसके एक हिस्से को हेरिटेज ट्रेन के रूप में चलाया जाए।
पहले बानमोर तक हेरिटेज ट्रेन की बनी थी योजना
नैरोगेज को बचाने की उम्मीद एक समय फिर जगी थी। रेलवे और स्थानीय स्तर पर ग्वालियर से बानमोर तक करीब 20 किलोमीटर के हिस्से में हेरिटेज ट्रेन चलाने की संभावना पर चर्चा हुई थी। इसके लिए फिजिबिलिटी सर्वे की बात भी सामने आई थी।
2023 में भी ग्वालियर से बानमोर के बीच करीब 20 किलोमीटर के ट्रैक पर हेरिटेज ट्रेन चलाने की योजना को लेकर रेलवे स्तर पर सर्वे और संभावनाओं पर चर्चा हुई थी। प्रस्ताव का उद्देश्य पुराने नैरोगेज इतिहास को पर्यटन से जोड़ना और ग्वालियर की इस विरासत को संरक्षित करना था।
लेकिन अब इस योजना पर भी विराम लग गया है।
रेलवे ने हेरिटेज ट्रेन का प्रस्ताव किया खारिज
ताजा जानकारी के अनुसार रेलवे ने ग्वालियर की नैरोगेज को हेरिटेज ट्रेन के रूप में चलाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। इसका मतलब यह है कि जिस ट्रैक पर कभी पुरानी नैरोगेज ट्रेन दौड़ती थी, वहां अब दोबारा पर्यटकों के लिए ट्रेन चलने की संभावना नहीं बची है।
यही वजह है कि ट्रैक हटाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रस्ताव खारिज होने के बाद करीब 20 किलोमीटर के बचे हुए ट्रैक को हटाने के लिए टेंडर जारी करने की तैयारी की जा रही है।
बानमोर तक का करीब 20 KM ट्रैक होगा खत्म
ग्वालियर से बानमोर तक करीब 20 किलोमीटर का नैरोगेज ट्रैक इस पूरी विरासत का सबसे महत्वपूर्ण बचा हुआ हिस्सा माना जा रहा था। इसी हिस्से पर हेरिटेज ट्रेन चलाने की संभावनाओं पर पहले विचार किया गया था।
अब इसी ट्रैक को उखाड़ने की तैयारी है। टेंडर जारी होने के बाद ठेका प्रक्रिया पूरी की जाएगी और इसके बाद ट्रैक हटाने का काम शुरू हो सकता है।
यानी आने वाले समय में ग्वालियर-बानमोर के बीच नैरोगेज की पटरियां भी नजर नहीं आएंगी। इससे इस ऐतिहासिक रेल व्यवस्था का भौतिक स्वरूप काफी हद तक खत्म हो जाएगा।
कभी ग्वालियर से श्योपुर तक जाती थी नैरोगेज
ग्वालियर की नैरोगेज रेल सिर्फ बानमोर तक सीमित नहीं थी। यह ऐतिहासिक रेल लाइन ग्वालियर से श्योपुर तक के लंबे रूट का हिस्सा रही थी। बाद में इस नैरोगेज नेटवर्क को चरणबद्ध तरीके से बड़ी लाइन में बदला गया और पुरानी ट्रेन का संचालन समाप्त होता चला गया।
नैरोगेज की सबसे बड़ी पहचान इसकी बेहद संकरी पटरी थी। दो फीट चौड़ी लाइन पर चलने वाली ट्रेन को देश की सबसे संकरी गेज वाली रेल सेवाओं में गिना जाता रहा है। यही वजह है कि रेलवे इतिहास और रेल प्रेमियों के बीच ग्वालियर की नैरोगेज का विशेष महत्व रहा है।
ग्वालियर के पर्यटन के लिए भी था मौका
अगर हेरिटेज ट्रेन योजना को मंजूरी मिलती तो ग्वालियर की नैरोगेज को पर्यटन से जोड़ने का मौका मिल सकता था। ग्वालियर पहले से ही किले, महल, संग्रहालय और ऐतिहासिक इमारतों के कारण देश-विदेश के पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र है।
ऐसे में पुरानी नैरोगेज पर हेरिटेज ट्रेन चलने से पर्यटकों को शहर के इतिहास से जुड़ा एक अलग अनुभव मिल सकता था। पुराने इंजन और कोच को संरक्षित कर उन्हें पर्यटन सर्किट से जोड़ने की संभावनाएं भी चर्चा में रही थीं।
लेकिन अब प्रस्ताव खारिज होने के बाद इस दिशा में आगे बढ़ने की संभावना फिलहाल खत्म होती नजर आ रही है।
क्या बच पाएगी नैरोगेज की विरासत?
ट्रैक हटाए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि ग्वालियर की नैरोगेज की ऐतिहासिक पहचान को किस रूप में संरक्षित किया जाएगा। रेल सेवा का नियमित संचालन तो पहले ही बंद हो चुका है और अब ट्रैक हटाने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है।
ऐसे में पुराने इंजन, कोच, स्टेशन से जुड़ी सामग्री और नैरोगेज के इतिहास को संग्रहालय के रूप में संरक्षित करना महत्वपूर्ण हो सकता है। इससे आने वाली पीढ़ियां यह जान सकेंगी कि ग्वालियर में कभी दो फीट चौड़ी पटरी पर नैरोगेज ट्रेन दौड़ा करती थी।
पटरियां हटेंगी, लेकिन इतिहास बाकी रहेगा
ग्वालियर की नैरोगेज अब भले ही दोबारा पटरी पर न लौटे, लेकिन शहर के इतिहास में इसका स्थान बना रहेगा। करीब एक सदी तक लोगों की आवाजाही का हिस्सा रही यह ट्रेन ग्वालियर के सामाजिक और परिवहन इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी रही है।
अब रेलवे के स्तर पर 20 किलोमीटर ट्रैक को हटाने की तैयारी ने हेरिटेज ट्रेन की बची हुई उम्मीद को भी खत्म कर दिया है। टेंडर जारी होने के बाद आगे की प्रक्रिया स्पष्ट होगी।
फिलहाल ग्वालियर के लिए यह सिर्फ पुरानी रेल पटरी हटने की खबर नहीं है, बल्कि शहर की एक ऐतिहासिक पहचान के धीरे-धीरे खत्म होने की कहानी भी है।
news desk MPcg