सागर में जहरीली शराब ने ली 22 जानें: पहले धुंधला दिखा, फिर शरीर पड़ा नीला; आखिर मेथेनॉल ने कैसे मचाया मौत का तांडव?

सागर में जहरीली शराब ने ली 22 जानें: पहले धुंधला दिखा, फिर शरीर पड़ा नीला; आखिर मेथेनॉल ने कैसे मचाया मौत का तांडव?

5 सितंबर को शराब को जांच में बताया गया था पीने योग्य, अगले ही दिन बंडा इलाके में एक के बाद एक लोगों की तबीयत बिगड़ी; 112 से ज्यादा मरीज अस्पतालों में भर्ती, कई की आंखों की रोशनी गई

मध्यप्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब से हुई मौतों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। बंडा क्षेत्र के कई गांवों में संदिग्ध शराब पीने के बाद लोगों की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। किसी को उल्टी और सिरदर्द हुआ तो किसी को धुंधला दिखाई देने लगा। देखते ही देखते कई मरीजों की हालत गंभीर हो गई। कुछ लोगों के शरीर नीले पड़ गए और इलाज के दौरान या अस्पताल पहुंचने से पहले उनकी मौत हो गई।

ताजा प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक 22 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 112 से ज्यादा मरीज अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की ओर से मरीजों के इलाज की व्यवस्था की जा रही है। मामले में अवैध और नकली शराब के नेटवर्क की जांच भी जारी है।

इस पूरे मामले ने सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया है कि आखिर ऐसी शराब लोगों तक पहुंची कैसे और जब शराब को लेकर पहले शिकायत की जा चुकी थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

2 सितंबर को मिली थी नकली शराब की शिकायत

पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए 2 सितंबर से शुरुआत करनी होगी। जानकारी के मुताबिक राठौर डिस्टलरी के संचालक शुवेंद्र सिंह राठौर ने आबकारी विभाग को लिखित शिकायत दी थी। शिकायत में इलाके में 'सागर गोल्ड' और 'बॉम्बे व्हिस्की' ब्रांड की नकली कॉपी बेचे जाने की बात कही गई थी।

यानी शराब को लेकर प्रशासन के सामने पहले ही संदेह और शिकायत पहुंच चुकी थी। इसके बाद आबकारी विभाग की ओर से जांच की गई।

लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए।

5 सितंबर को जांच में शराब को बताया गया 'पीने योग्य'

शिकायत के बाद आबकारी विभाग की ओर से जांच की गई। 5 सितंबर को तैयार की गई जांच रिपोर्ट में शराब को पीने योग्य और किसी तरह का खतरा नहीं होने की बात कही गई थी।

इस रिपोर्ट के ठीक अगले दिन बंडा क्षेत्र के कई गांवों से लोगों के बीमार पड़ने की खबरें सामने आने लगीं।

यही इस पूरे मामले का सबसे अहम और गंभीर पहलू बन गया है—एक दिन पहले जिस शराब को जांच में सुरक्षित बताया गया, उसे पीने के बाद अगले ही दिन लोगों की हालत बिगड़ने लगी।

6 सितंबर की सुबह शुरू हुआ मौतों का सिलसिला

6 सितंबर की सुबह करीब 4:30 बजे बंडा क्षेत्र के नौराज, गूगरा खुर्द, पाटन, छापरी और बमूरा भेड़ा समेत कई गांवों से लोगों के बीमार होने की खबरें आने लगीं।

बताया गया कि शनिवार रात शराब पीने वाले लोगों में रविवार सुबह अचानक उल्टी, सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, कमजोरी और शरीर में अकड़न जैसे लक्षण दिखाई देने लगे।

कई मरीजों की हालत तेजी से बिगड़ती गई। कुछ लोगों को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन कई मरीज रास्ते में ही दम तोड़ गए।

बमुराबेड़ा के रामकुमार दांगी के अनुसार उनके गांव में साथ शराब पीने वाले तीन लोगों की तबीयत इतनी तेजी से बिगड़ी कि करीब आधे घंटे के भीतर उनकी मौत हो गई।

पोस्टमार्टम और मेडिकल जांच में मृतकों के शरीर में बड़ी मात्रा में मेथेनॉल पाए जाने की बात सामने आई है।

आखिर जहरीली शराब होती क्या है?

जहरीली शराब का मतलब ऐसी शराब से है जिसमें पीने योग्य अल्कोहल यानी एथेनॉल के बजाय जहरीला औद्योगिक अल्कोहल मेथेनॉल मौजूद हो या उसमें इसकी खतरनाक मात्रा मिल गई हो।

एथेनॉल वह अल्कोहल है जिसका इस्तेमाल वैध शराब में किया जाता है। दूसरी तरफ मेथेनॉल मानव शरीर के लिए बेहद जहरीला होता है और इसका इस्तेमाल औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है।

मेथेनॉल देखने, सूंघने या स्वाद से आसानी से पहचाना नहीं जा सकता। यही वजह है कि नकली शराब में इसकी मिलावट बेहद खतरनाक हो सकती है।

नकली शराब बनाने वाले गिरोह कम लागत में शराब तैयार करने के लिए कई बार औद्योगिक अल्कोहल का इस्तेमाल करते हैं। ऊपर से असली ब्रांड जैसी बोतल, लेबल और पैकेजिंग होने के कारण आम व्यक्ति को नकली और असली शराब में फर्क करना मुश्किल हो सकता है।

मेथेनॉल शरीर में जाने के बाद क्या करता है?

मेथेनॉल शरीर में पहुंचने के बाद सीधे उसी रूप में सबसे बड़ा नुकसान नहीं करता। असली खतरा तब पैदा होता है जब शरीर इसे तोड़ता है।

लिवर मेथेनॉल को तोड़ने की प्रक्रिया में ऐसे जहरीले पदार्थ बनाता है जो शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनमें फॉर्मेल्डिहाइड और फॉर्मिक एसिड प्रमुख हैं।

इसके बाद शरीर में कई गंभीर बदलाव होने लगते हैं।

पहला असर: खून में बढ़ने लगता है एसिड

मेथेनॉल से बनने वाला फॉर्मिक एसिड शरीर के एसिड-बेस संतुलन को बिगाड़ देता है। इसे मेटाबॉलिक एसिडोसिस कहा जाता है।

इस स्थिति में सांस लेने में परेशानी, कमजोरी, बेहोशी और ब्लड प्रेशर गिरने जैसी गंभीर समस्या हो सकती है।

दूसरा असर: आंखों की रोशनी पर हमला

मेथेनॉल पॉइजनिंग की सबसे खतरनाक पहचान आंखों से जुड़ी समस्या है।

पीड़ित को पहले धुंधला दिखाई दे सकता है। इसके बाद आंखों की रोशनी तेजी से कम हो सकती है और गंभीर मामलों में स्थायी अंधापन भी हो सकता है।

सागर के मामले में भी कई मरीजों की आंखों की रोशनी प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है।

तीसरा असर: शरीर नीला पड़ना

जहर के कारण शरीर में ऑक्सीजन का इस्तेमाल और पहुंच प्रभावित होने पर मरीज की त्वचा और होंठ नीले पड़ सकते हैं। इस स्थिति को सायनोसिस कहा जाता है।

यह गंभीर स्थिति का संकेत है और तत्काल चिकित्सा उपचार की जरूरत होती है।

चौथा असर: मौत

यदि समय पर इलाज नहीं मिले तो मेथेनॉल पॉइजनिंग से गंभीर मेटाबॉलिक एसिडोसिस, आंखों की स्थायी क्षति, बेहोशी, अंगों की विफलता और मौत तक हो सकती है।

शराब पीने के तुरंत बाद क्यों नहीं पता चलता?

मेथेनॉल पॉइजनिंग का एक खतरनाक पहलू यह है कि इसके गंभीर लक्षण कई मामलों में तुरंत दिखाई नहीं देते।

व्यक्ति शराब पीने के बाद कुछ समय तक सामान्य नजर आ सकता है। इसके बाद कई घंटे बाद सिरदर्द, उल्टी, चक्कर, कमजोरी और देखने में परेशानी जैसे लक्षण शुरू हो सकते हैं।

इसी वजह से पीड़ित या परिवार के लोग शुरुआत में इसे सामान्य शराब का नशा समझ सकते हैं और अस्पताल पहुंचने में देर हो सकती है।

हालांकि, लक्षणों का समय और गंभीरता मेथेनॉल की मात्रा तथा व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करती है।

क्या मेथेनॉल पॉइजनिंग का इलाज संभव है?

हां, समय पर इलाज मिलने पर मेथेनॉल पॉइजनिंग का उपचार संभव है। लेकिन इसमें देरी बेहद खतरनाक हो सकती है।

अस्पताल में डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार एंटीडोट, एसिडोसिस को नियंत्रित करने की दवाएं और जरूरत पड़ने पर हेमोडायलिसिस जैसी प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सकते हैं।

मेथेनॉल पॉइजनिंग में फोमेपिजोल एक प्रमुख एंटीडोट है। कुछ परिस्थितियों में चिकित्सकीय निगरानी में एथेनॉल का भी उपयोग किया जाता है।

गंभीर मामलों में डायलिसिस शरीर से मेथेनॉल और उसके जहरीले मेटाबोलाइट्स को हटाने में मदद कर सकता है।

ऐसे किसी भी संदिग्ध मामले में घरेलू उपचार या मरीज को सिर्फ 'नशा उतरने' का इंतजार कराना खतरनाक हो सकता है। संदिग्ध लक्षण दिखाई देने पर तत्काल अस्पताल पहुंचाना जरूरी है।

बोतल देखकर जहरीली शराब की पहचान संभव है?

नहीं। सिर्फ बोतल का रंग, शराब की गंध या स्वाद देखकर मेथेनॉल की मौजूदगी की पुष्टि नहीं की जा सकती।

नकली शराब कई बार बिल्कुल असली ब्रांड जैसी पैकेजिंग में बेची जाती है। इसलिए किसी संदिग्ध शराब को चखकर या सूंघकर जांचने की कोशिश बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।

सागर मामले में जिस शराब को लेकर शिकायत हुई, उसके सामान्य कीमत से करीब 20 रुपए सस्ते होने की बात भी सामने आई है। हालांकि केवल कम कीमत से यह साबित नहीं होता कि शराब जहरीली है, लेकिन संदिग्ध रूप से सस्ती या अवैध तरीके से बिक रही शराब को लेकर सावधानी जरूरी है।

ललितपुर से सागर तक पहुंची नकली शराब का कनेक्शन?

जांच में नकली शराब के नेटवर्क का कनेक्शन उत्तर प्रदेश के ललितपुर से जुड़ने की बात सामने आई है। जानकारी के मुताबिक वहां नकली रैपर और फर्जी बारकोड-QR कोड से जुड़ा मामला पहले ही जांच के दायरे में आ चुका था।

4 मई 2026 को ललितपुर कोतवाली में दर्ज FIR में बड़ी संख्या में नकली रैपर, ढक्कन और खाली पाउच जब्त किए जाने का उल्लेख है।

FIR में सागर जिले के कुछ ढाबों और मध्यप्रदेश में शराब की सप्लाई से जुड़े आरोपों का भी उल्लेख होने की बात सामने आई है।

हालांकि ललितपुर पुलिस की ओर से इन आरोपों को खारिज किए जाने की बात भी सामने आई है। ऐसे में अब जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाना अहम है कि सागर में पहुंची संदिग्ध शराब का वास्तविक स्रोत क्या था और सप्लाई नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे।

2020 की बोतलों पर 2026 की तारीख लगाने का भी दावा

इस मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और कुछ ग्रामीणों ने दावा किया है कि 2020 की एक्सपायर्ड शराब की बोतलों पर 2026 की तारीख डालकर उन्हें बेचने की कोशिश की गई।

यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला सिर्फ मेथेनॉल मिलावट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नकली पैकेजिंग और एक्सपायरी डेट में हेरफेर का मामला भी सामने आएगा।

फिलहाल इस दावे की आधिकारिक जांच और पुष्टि महत्वपूर्ण है।

आखिर जिम्मेदार कौन? प्रशासन पर उठे सवाल

सागर शराब कांड में अब सबसे बड़ा सवाल जिम्मेदारी का है।

क्योंकि घटनाक्रम में शिकायत पहले सामने आई, उसके बाद जांच हुई और रिपोर्ट में शराब को सुरक्षित बताया गया। इसके अगले ही दिन उसी तरह की शराब पीने के बाद बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ गए।

सरकार और प्रशासन की ओर से मामले में कार्रवाई शुरू कर दी गई है। कई अधिकारियों को निलंबित किया गया है और कुछ को दूसरी जगह अटैच किया गया है।

जानकारी के मुताबिक सहायक आबकारी आयुक्त कीर्ति दुबे, जिला आबकारी अधिकारी दिलीप खंडाते और बंडा आबकारी उप निरीक्षक रोशनी उरेती समेत कई अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है।

इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है। गूगरा चौकी प्रभारी सब-इंस्पेक्टर पूरन लाल लाडिया और बंडा थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह कुशवाहा को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई है।

बंडा SDM आरती यादव को भी हटाकर कलेक्ट्रेट कार्यालय सागर में पदस्थ किया गया है और उनकी जगह डिप्टी कलेक्टर संजय कुमार जैन को प्रभार दिया गया है।

30 से ज्यादा नामजद, 14 गिरफ्तार

पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए 30 से ज्यादा लोगों को नामजद आरोपी बनाया है और 14 आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है।

लाइसेंसी ठेकेदार सिद्धार्थ कुशवाहा और यशवंत ठाकुर के नाम भी आरोपियों में शामिल बताए गए हैं।

अब पुलिस के सामने सिर्फ यह पता लगाना चुनौती नहीं है कि जहरीली शराब किसने बनाई, बल्कि यह भी पता लगाना है कि इसे किन रास्तों से सागर तक पहुंचाया गया और किन लोगों ने इसे गांवों तक पहुंचाने में मदद की।

आबकारी विभाग की पुरानी रिपोर्ट भी जांच के घेरे में

इस मामले में सबसे ज्यादा सवाल 5 सितंबर की आबकारी जांच रिपोर्ट को लेकर उठ रहे हैं। शिकायत के बाद जांच की गई और शराब को पीने योग्य बताया गया।

इसके ठीक अगले दिन मौतों का सिलसिला शुरू हो गया।

ऐसे में जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि सैंपल कैसे लिया गया, उसकी जांच किस तरीके से हुई, जांच के दौरान क्या-क्या देखा गया और रिपोर्ट तैयार करने में किन अधिकारियों की भूमिका थी।

यदि जांच में लापरवाही साबित होती है तो संबंधित अधिकारियों पर आगे भी कार्रवाई हो सकती है।

अभी सबसे बड़ा खतरा क्या है?

सबसे बड़ी चिंता यह है कि संदिग्ध शराब का सेवन करने वाले सभी लोग अभी सामने नहीं आए हैं। प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक 112 से ज्यादा मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं और मौतों का आंकड़ा बढ़ने की आशंका भी जताई गई है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे मामलों में शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। खासकर शराब पीने के बाद धुंधला दिखना, उल्टी, तेज सिरदर्द, चक्कर, अत्यधिक कमजोरी, सांस लेने में परेशानी या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो मरीज को तत्काल अस्पताल ले जाना चाहिए।

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

सागर की घटना ने मध्यप्रदेश में अवैध शराब के कारोबार पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ अस्पतालों में भर्ती मरीजों की जान बचाना और दूसरी तरफ नकली शराब के पूरे नेटवर्क तक पहुंचना।

सिर्फ स्थानीय स्तर पर कार्रवाई से मामला खत्म नहीं होगा। जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि शराब का कच्चा माल कहां से आया, नकली बोतल और रैपर कहां तैयार हुए, सप्लाई किसने की और सरकारी ठेकों या स्थानीय बाजार तक यह शराब कैसे पहुंची।

22 मौतों के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस नेटवर्क ने जहरीली शराब लोगों तक पहुंचाई, उसकी पूरी कड़ी कब सामने आएगी और क्या उन सभी लोगों पर कार्रवाई होगी जिनकी लापरवाही या मिलीभगत से यह त्रासदी हुई?