LNIPE में 47 संविदा नियुक्तियों से फिर गरमाया विवाद: गैर-स्वीकृत पदों पर भर्ती का आरोप, 19 हजार से 1 लाख तक वेतन पर भी सवाल
ग्वालियर के लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान में संविदा भर्ती को लेकर उठे सवाल; छह साल पहले भी 51 गैर-स्वीकृत पदों पर नियुक्तियों और 2.63 करोड़ वेतन भुगतान पर ऑडिट ने जताई थी आपत्ति
ग्वालियर। लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान (LNIPE) में संविदा नियुक्तियों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। संस्थान में 47 लोगों की संविदा नियुक्तियां किए जाने की जानकारी सामने आने के बाद इन पदों की स्वीकृति और पद सृजन की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
बताया जा रहा है कि इन नियुक्तियों में जूनियर क्लर्क, एमटीएस, हॉस्टल इंचार्ज, नर्स, कुक सहित अलग-अलग श्रेणियों के पद शामिल हैं। इन कर्मचारियों को मिलने वाले मासिक वेतन की राशि भी अलग-अलग है, जो करीब 19 हजार रुपए से लेकर 1 लाख रुपए तक बताई गई है।
मामला इसलिए ज्यादा गंभीर माना जा रहा है क्योंकि संस्थान में इससे पहले भी गैर-स्वीकृत पदों पर संविदा नियुक्तियों को लेकर ऑडिट आपत्ति दर्ज कर चुका है। करीब छह साल पहले तत्कालीन कुलपति डॉ. दिलीप कुमार दुरेहा के कार्यकाल के दौरान 51 ऐसे पदों पर नियुक्तियों और करीब 2.63 करोड़ रुपए के वेतन भुगतान को लेकर ऑडिट ने सवाल उठाए थे।
47 नियुक्तियों में कई अलग-अलग पद शामिल
सामने आई जानकारी के अनुसार LNIPE में इस बार 47 संविदा नियुक्तियों का मामला सामने आया है। इनमें 11 जूनियर क्लर्क, 7 एमटीएस, 4 हॉस्टल इंचार्ज और 3 नर्स शामिल हैं। इसके अलावा तीन कुक सहित अन्य पदों पर भी नियुक्तियां किए जाने की जानकारी है।
इन नियुक्तियों को लेकर सबसे अहम सवाल यह है कि जिन पदों पर संविदा कर्मचारी रखे गए हैं, क्या वे संस्थान में विधिवत स्वीकृत पद हैं? यदि पद स्वीकृत नहीं हैं तो फिर उनकी भर्ती के लिए किस स्तर पर अनुमति ली गई और नियुक्तियों का आधार क्या रहा?
यही बिंदु इस पूरे मामले को विवाद के केंद्र में ला रहा है।
वेतन की राशि ने भी बढ़ाए सवाल
इन 47 संविदा कर्मचारियों के वेतन को लेकर भी अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। बताया गया है कि पद और जिम्मेदारी के हिसाब से मासिक वेतन करीब 19 हजार रुपए से 1 लाख रुपए तक है।
वेतन की यह बड़ी रेंज भी सवालों के घेरे में है। खासतौर पर तब, जब नियुक्त किए गए पदों की स्वीकृति और पद सृजन से संबंधित प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहे हों।
ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि इन पदों के लिए वेतनमान या पारिश्रमिक किस नियम और स्वीकृति के आधार पर तय किया गया है।
छह साल पुराना ऑडिट मामला फिर आया सामने
मौजूदा विवाद को समझने के लिए करीब छह वर्ष पुराने मामले को देखना जरूरी है।
तत्कालीन कुलपति डॉ. दिलीप कुमार दुरेहा के कार्यकाल में संस्थान में 51 गैर-स्वीकृत पदों पर संविदा नियुक्तियां किए जाने का मामला सामने आया था। इन नियुक्तियों के चलते करीब 2.63 करोड़ रुपए के वेतन भुगतान पर ऑडिट ने आपत्ति दर्ज की थी।
उस समय संस्थान की ओर से अपने पक्ष में यह तर्क दिया गया था कि संस्थान की गतिविधियों का विस्तार हुआ है और कई नियमित कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके कारण कर्मचारियों की आवश्यकता बढ़ी थी।
संस्थान की ओर से यह भी तर्क दिया गया था कि बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट ने कुलपति को जरूरत के अनुसार संविदा नियुक्तियां करने की अनुमति दी थी।
हालांकि ऑडिट ने संस्थान के इस जवाब को स्वीकार नहीं किया था।
पुराने विवाद के बावजूद फिर उठे वही सवाल
अब जब एक बार फिर 47 संविदा नियुक्तियों का मामला सामने आया है, तो करीब छह साल पुराने ऑडिट विवाद की चर्चा भी शुरू हो गई है।
मुख्य सवाल यह है कि क्या मौजूदा नियुक्तियों के दौरान पिछली ऑडिट आपत्तियों से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं का ध्यान रखा गया?
अगर नए पद विधिवत स्वीकृत हैं तो उनकी स्वीकृति से संबंधित दस्तावेज और प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। वहीं यदि ये पद स्वीकृत नहीं हैं तो संविदा नियुक्तियां किस आधार पर की गईं, यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
यही दस्तावेजी स्थिति इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण होगी।
संस्थान में कर्मचारियों की जरूरत और नियमों के बीच संतुलन
संस्थान में नियमित कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने या कामकाज बढ़ने के कारण अतिरिक्त कर्मचारियों की जरूरत पैदा हो सकती है। ऐसे में संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति प्रशासनिक जरूरत का हिस्सा हो सकती है।
लेकिन किसी भी सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान में नियुक्ति के साथ निर्धारित नियमों और स्वीकृत पदों की प्रक्रिया का पालन भी जरूरी होता है।
यही कारण है कि विवाद सिर्फ इस बात पर नहीं है कि कर्मचारी क्यों नियुक्त किए गए। सवाल यह है कि किस पद पर, किस प्रक्रिया के तहत और किस स्वीकृति के आधार पर नियुक्तियां की गईं।
क्लर्क से लेकर नर्स और कुक तक पदों पर भर्ती
मामले में सामने आए पदों को देखें तो नियुक्तियां सिर्फ एक श्रेणी तक सीमित नहीं हैं।
जूनियर क्लर्क जैसे कार्यालयीन पदों के साथ एमटीएस, हॉस्टल इंचार्ज, नर्स और कुक जैसे अलग-अलग जिम्मेदारियों वाले पद भी शामिल हैं। इसका मतलब है कि संस्थान के विभिन्न हिस्सों में मानव संसाधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए संविदा नियुक्तियां की गई हैं।
लेकिन इन सभी पदों की प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
₹2.63 करोड़ के पुराने भुगतान ने बढ़ाई गंभीरता
छह वर्ष पहले सामने आए ऑडिट मामले में करीब 2.63 करोड़ रुपए के वेतन भुगतान पर आपत्ति दर्ज की गई थी। यह राशि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मामला केवल नियुक्ति प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा था, बल्कि सरकारी धन के भुगतान तक पहुंच गया था।
अब नए मामले में भी वेतन भुगतान की बात सामने आने से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस बार नियुक्तियों और भुगतान की प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप है।
संस्थान के रिकॉर्ड, स्वीकृति आदेश और संबंधित प्रशासनिक दस्तावेज इस मामले की वास्तविक स्थिति साफ कर सकते हैं।
अब दस्तावेजों से साफ होगी नियुक्तियों की स्थिति
47 संविदा नियुक्तियों के मामले में सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि संस्थान की ओर से पदों की स्वीकृति, नियुक्ति की अनुमति और वेतन भुगतान से जुड़े दस्तावेज सामने आएं।
यदि सभी नियुक्तियां निर्धारित प्रक्रिया और सक्षम स्तर की स्वीकृति के आधार पर हुई हैं, तो विवाद से जुड़े सवालों का जवाब दस्तावेजों से मिल सकता है।
वहीं यदि किसी पद की स्वीकृति या नियुक्ति प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने की जरूरत होगी।
छह साल बाद भी वही सवाल क्यों?
LNIPE से जुड़ा मौजूदा विवाद इसलिए भी अहम है क्योंकि गैर-स्वीकृत पदों पर संविदा नियुक्तियों का मुद्दा नया नहीं है। करीब छह साल पहले भी ऑडिट इसी तरह के मामले पर आपत्ति दर्ज कर चुका है।
अब फिर 47 नियुक्तियों का मामला सामने आने के बाद संस्थान की नियुक्ति व्यवस्था, पद स्वीकृति और वित्तीय प्रक्रिया पर निगाहें टिक गई हैं।
सवाल सिर्फ 47 कर्मचारियों की नियुक्ति का नहीं है। सवाल यह है कि संस्थान में संविदा भर्ती की व्यवस्था कितनी पारदर्शी है और क्या हर नियुक्ति के पीछे स्पष्ट प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति मौजूद है।
आने वाले समय में इन नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेज और संस्थान का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और साफ हो सकती है।
news desk MPcg