बालाघाट के नक्सल प्रभावित बिरसा में पहली बार पहुंची मेडिकल टीम, 125 बच्चों की बची जान; 980 घरों तक पहुंचा स्वास्थ्य विभाग

बालाघाट के नक्सल प्रभावित बिरसा में पहली बार पहुंची मेडिकल टीम, 125 बच्चों की बची जान; 980 घरों तक पहुंचा स्वास्थ्य विभाग

बालाघाट। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले का बिरसा विकासखंड लंबे समय तक नक्सली गतिविधियों के कारण बेहद संवेदनशील इलाका रहा है। कई गांवों में सरकारी सेवाओं और स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बेहद सीमित रही। अब सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के बाद पहली बार स्वास्थ्य विभाग की टीमें इन दुर्गम इलाकों तक लगातार पहुंच रही हैं। इसी अभियान के दौरान कई गांवों में बड़ी संख्या में बच्चे अलग-अलग बीमारियों से पीड़ित मिले। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक 125 से अधिक बच्चों को उपचार के बाद स्वस्थ कर अस्पताल से घर भेजा गया है, जबकि कई अन्य बच्चों का इलाज जारी है।

यह अभियान सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि उन गांवों में स्वास्थ्य व्यवस्था की नई शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है, जहां लंबे समय तक डर और नक्सली प्रभाव के कारण ग्रामीण सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्यकर्मियों से दूर रहे।

कभी नक्सलियों का मजबूत गढ़ था बिरसा

बालाघाट का बिरसा क्षेत्र लंबे समय तक नक्सली गतिविधियों का केंद्र रहा है। बोंदारी, अडोरी, कुंडेकसा, कोरका, मछुरदा, मातला और गठिया जैसे कई गांवों में सुरक्षा बलों के लिए पहुंच बनाना भी चुनौतीपूर्ण रहा है।

क्षेत्र में वर्ष 1980 के दशक से नक्सली गतिविधियां बढ़ीं। समय के साथ इसका असर ग्रामीण जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं की पहुंच पर भी पड़ा। नक्सली प्रभाव के कारण कई ग्रामीण सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों से दूरी बनाए रखते थे।

अब सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के बाद प्रशासन की कोशिश है कि केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की पहुंच भी इन गांवों तक सुनिश्चित की जाए।

डॉक्टरों को देखकर पहले डर जाते थे ग्रामीण

स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारियों की पहचान करना नहीं थी। कई ग्रामीण लंबे समय तक सरकारी व्यवस्था से दूर रहने के कारण डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को देखकर भी असहज हो जाते थे।

टीमों के मुताबिक शुरुआत में कुछ परिवार बच्चों को डॉक्टरों से दूर ले जाने की कोशिश करते थे। ऐसे में स्वास्थ्यकर्मियों ने घर-घर जाकर लोगों से संपर्क बनाया और उन्हें समझाया कि बीमारी की स्थिति में समय पर इलाज कराना जरूरी है।

लगातार संपर्क और जागरूकता के बाद अब ग्रामीण अपने बच्चों को इलाज के लिए स्वास्थ्य टीमों तक लेकर आ रहे हैं।

बच्चों में मिले अलग-अलग बीमारी के लक्षण

स्वास्थ्य विभाग की टीमों को क्षेत्र में कई बच्चों में बुखार, सर्दी-खांसी, त्वचा संबंधी समस्याएं, कमजोरी, पेट दर्द, उल्टी-दस्त और अन्य लक्षण मिले। कुछ बच्चों में मीजल्स, स्कैबीज और मलेरिया जैसी बीमारियों की भी पहचान की गई।

एक बच्चे की बीमारी के दौरान मौत की जानकारी भी सामने आई है। स्वास्थ्य विभाग अब गांवों में मेडिकल सर्वे कर बीमारी के कारणों और पैटर्न को समझने की कोशिश कर रहा है, ताकि समय रहते गंभीर मामलों की पहचान की जा सके।

169 बच्चे अस्पताल में भर्ती, 125 स्वस्थ होकर लौटे

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार बिरसा क्षेत्र के कुंडेकसा, अडोरी, कोरका और बोंदारी सहित प्रभावित गांवों में बीमार बच्चों की पहचान की गई। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण कुल 169 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया।

इनमें से 125 बच्चे उपचार के बाद स्वस्थ होकर अपने गांव लौट चुके हैं, जबकि 44 बच्चों का इलाज जारी है। विभाग का कहना है कि अस्पताल में उपचाररत बच्चों की हालत स्थिर है और उनकी लगातार निगरानी की जा रही है।

461 बच्चों का घर पर ही इलाज

स्वास्थ्य विभाग ने केवल गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के बजाय घर पर उपचार की व्यवस्था भी शुरू की है। अब तक 461 बच्चों का उनके घर पर ही इलाज किया गया है।

इसके लिए स्वास्थ्य टीमों को गांव-गांव भेजा जा रहा है। घर-घर सर्वे के दौरान बच्चों की जांच की जा रही है और जरूरत के अनुसार दवाइयां तथा पोषण संबंधी सहायता दी जा रही है।

अब तक विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े 630 मरीजों की पहचान की गई है। इनमें अस्पताल में भर्ती कराए गए मरीजों के साथ घर पर इलाज पाने वाले मरीज भी शामिल हैं।

20 सर्वे टीम और 4 एंबुलेंस तैनात

स्वास्थ्य विभाग ने अभियान को प्रभावी बनाने के लिए 20 सर्वेक्षण टीमों को घर-घर जांच के लिए लगाया है। इसके अलावा बीमारी की जांच और उपचार के लिए चिकित्सा अधिकारियों की टीम भी क्षेत्र में काम कर रही है।

जरूरत पड़ने पर मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए 4 एंबुलेंस तैनात की गई हैं। स्वास्थ्य विभाग की मोबाइल मेडिकल यूनिट भी गांवों में पहुंचकर लोगों की जांच कर रही है।

इसका मकसद यह है कि बीमारी की स्थिति में ग्रामीणों को अस्पताल तक आने का इंतजार न करना पड़े और स्वास्थ्य सेवा उनके घर तक पहुंच सके।

980 घरों तक पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम

स्वास्थ्य विभाग द्वारा बिरसा क्षेत्र के करीब 10 गांवों के 980 घरों में स्वास्थ्य सर्वे किया जा रहा है। इनमें कुंडेकसा, बोंदारी, कोरका, घुम्मुर, अडोरी, मछुरदा, गठिया और मातला सहित अन्य गांव शामिल हैं।

सर्वे के दौरान बच्चों की नियमित जांच के साथ-साथ पोषण और टीकाकरण पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

बच्चों को विटामिन-A, ORS और आयरन की खुराक

स्वास्थ्य अभियान के तहत अब तक 658 बच्चों को विटामिन-A और ORS दिया गया है। इसके अलावा 597 बच्चों को आयरन सिरप उपलब्ध कराया गया है।

वहीं 521 बच्चों को एल्बेंडाजोल की गोलियां दी गईं और 63 बच्चों को मीजल्स का टीका लगाया गया। स्वास्थ्य विभाग का फोकस केवल मौजूदा बीमारी के इलाज पर नहीं बल्कि बच्चों में कुपोषण, संक्रमण और दूसरी बीमारियों की रोकथाम पर भी है।

नक्सलवाद खत्म होने के बाद सरकारी सेवाओं की नई चुनौती

बिरसा क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति बेहतर होने के बाद प्रशासन के सामने अब एक नई चुनौती है—लंबे समय से सरकारी व्यवस्था से कटे ग्रामीण इलाकों को मुख्यधारा की सेवाओं से जोड़ना।

नक्सलवाद का प्रभाव खत्म होने के बाद इन इलाकों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग का घर-घर सर्वे इसी बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है।

125 बच्चों का स्वस्थ होकर घर लौटना इस अभियान की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन क्षेत्र में लगातार स्वास्थ्य निगरानी की जरूरत बनी हुई है। खासकर दुर्गम गांवों में बीमारी की समय रहते पहचान और ग्रामीणों में स्वास्थ्य को लेकर भरोसा पैदा करना प्रशासन के लिए अहम चुनौती है।

अब बीमारी का रिकॉर्ड तैयार करने पर जोर

लंबे समय तक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण इन इलाकों में कितने लोग किस बीमारी से प्रभावित हुए या कितनी मौतें हुईं, इसका व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। अब स्वास्थ्य विभाग घर-घर सर्वे के जरिए पहली बार व्यापक मेडिकल डेटा तैयार कर रहा है।

इससे आने वाले समय में यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि इलाके में कौन सी बीमारियां ज्यादा फैल रही हैं, बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति कैसी है और किन गांवों में अतिरिक्त मेडिकल सुविधाओं की जरूरत है।

बालाघाट के इस अभियान को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था के बाद अब सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पहुंच उन गांवों तक बनाई जा रही है, जहां वर्षों तक डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी नियमित रूप से नहीं पहुंच पाते थे