MP में डकैत नहीं तो 45 साल पुराना डकैती एक्ट क्यों? हाईकोर्ट ने DGP समेत 6 जिलों के SP से मांगा जवाब

MP में डकैत नहीं तो 45 साल पुराना डकैती एक्ट क्यों? हाईकोर्ट ने DGP समेत 6 जिलों के SP से मांगा जवाब

डकैती अधिनियम 1981 की जरूरत पर हाईकोर्ट में उठे सवाल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ. गोविंद सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई

ग्वालियर-चंबल अंचल में लागू डकैती अधिनियम 1981 को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में मंगलवार को अहम सुनवाई हुई। मध्यप्रदेश विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष और लहार के पूर्व विधायक डॉ. गोविंद सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका में इस कानून की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि जब सरकार विधानसभा में यह स्वीकार कर चुकी है कि प्रदेश में अब कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, तो फिर करीब 45 साल पुराने इस कानून के तहत मामले दर्ज किए जाने का औचित्य क्या है। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने पुलिस और गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब मांगा है।

छह जिलों में एक्ट के इस्तेमाल को लेकर कोर्ट ने मांगा जवाब

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले को गंभीरता से लेते हुए मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह विभाग के सचिव समेत ग्वालियर-चंबल संभाग के छह जिलों के पुलिस अधीक्षकों को नोटिस जारी किया है। जिन जिलों के एसपी से जवाब मांगा गया है, उनमें ग्वालियर, शिवपुरी, भिंड, मुरैना, दतिया और श्योपुर शामिल हैं। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से डकैती अधिनियम के वर्तमान इस्तेमाल और इसकी जरूरत को लेकर जवाब मांगा है। अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए गए हैं।

याचिका में सरकार के ही बयान को बनाया आधार

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में मुख्य रूप से मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा में दिए गए उस जवाब का हवाला दिया गया, जिसमें प्रदेश में किसी सूचीबद्ध डकैत गिरोह के सक्रिय नहीं होने की बात कही गई थी। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह कानून मूल रूप से डकैत गिरोहों और उनसे जुड़े अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई के लिए बनाया गया था। ऐसे में जब राज्य में सूचीबद्ध डकैत गिरोह मौजूद नहीं हैं, तो कानून को लंबे समय तक उसी स्वरूप में लागू रखने की जरूरत पर पुनर्विचार होना चाहिए।

2020 से अब तक एक हजार से ज्यादा FIR का दावा

जनहित याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 2020 से अब तक ग्वालियर-चंबल अंचल के छह जिलों में डकैती अधिनियम के तहत एक हजार से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के सामने सवाल उठाया गया कि यदि क्षेत्र में संगठित डकैत गिरोह सक्रिय नहीं हैं, तो इतनी बड़ी संख्या में मामलों में इस कानून का इस्तेमाल किस आधार पर किया गया। हालांकि इन आंकड़ों और पुलिस की कार्रवाई का अंतिम आकलन संबंधित सरकारी पक्ष के जवाब के बाद ही स्पष्ट होगा।

मामूली विवादों में एक्ट लगाने का आरोप

याचिका में मध्यप्रदेश पुलिस पर डकैती अधिनियम के कथित दुरुपयोग का आरोप भी लगाया गया है। याचिकाकर्ता के वकील की ओर से अदालत में कहा गया कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में कुछ मामलों में आपसी विवाद, रंजिश और छोटे स्तर के झगड़ों में भी इस कानून की धाराओं का इस्तेमाल किए जाने की शिकायतें हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इससे ग्रामीणों और किसानों को गंभीर कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। ये आरोप फिलहाल याचिका में लगाए गए हैं और इन पर पुलिस तथा सरकार का पक्ष आना बाकी है।

धारा 11 और 13 के इस्तेमाल पर भी सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से विशेष तौर पर डकैती अधिनियम की धारा 11 और 13 के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया है। आरोप है कि इन धाराओं को ऐसे मामलों में भी लगाया जाता है जिनमें याचिकाकर्ता के मुताबिक डकैती या संगठित डकैत गिरोह से सीधा संबंध नहीं होता। अदालत के सामने यह भी तर्क रखा गया कि कानून की कुछ धाराओं के कारण आरोपित व्यक्तियों के लिए सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में कानूनी राहत हासिल करना कठिन हो सकता है।

अग्रिम जमानत को लेकर भी उठाया गया मुद्दा

जनहित याचिका में डकैती अधिनियम की धारा 5(1) के प्रभाव का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल आरोपितों को अग्रिम जमानत की सुविधा से वंचित करने के लिए किया जाता है। याचिका में इसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जोड़ते हुए कानून की वर्तमान प्रासंगिकता की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है। अब इस मामले में सरकार और पुलिस की ओर से पेश होने वाला जवाब महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्यों बना था डकैती अधिनियम 1981?

मध्यप्रदेश डकैती अधिनियम 1981 का संबंध विशेष रूप से उन क्षेत्रों में डकैती और संगठित गिरोहों की गतिविधियों से निपटने की कानूनी व्यवस्था से रहा है, जहां लंबे समय तक डकैत गिरोह सक्रिय रहे थे। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र भी ऐतिहासिक रूप से डकैत समस्या के लिए जाना जाता रहा है। हालांकि समय के साथ पुलिस अभियानों और कानून-व्यवस्था में बदलाव के कारण क्षेत्र में डकैत गिरोहों की स्थिति काफी बदली है। इसी बदले हुए परिदृश्य को आधार बनाकर अब इस कानून की उपयोगिता पर सवाल अदालत के सामने रखा गया है।

ग्वालियर-चंबल में कभी डकैत गिरोह बड़ी चुनौती थे

ग्वालियर-चंबल का बीहड़ इलाका दशकों तक डकैत गिरोहों की गतिविधियों के लिए चर्चा में रहा है। कई कुख्यात गिरोहों के खिलाफ पुलिस और प्रशासन को लंबे समय तक अभियान चलाने पड़े। अपहरण, फिरौती, हत्या और लूट जैसी घटनाओं ने इस क्षेत्र की कानून-व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की थी। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में डकैती से जुड़े विशेष कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाता रहा। लेकिन वर्तमान स्थिति में डकैत गिरोहों की मौजूदगी को लेकर सरकार के बयान ने इस कानून की जरूरत पर नई बहस छेड़ दी है।

सरकार और पुलिस का जवाब अब रहेगा अहम

हाईकोर्ट के नोटिस के बाद अब राज्य सरकार, डीजीपी और छह जिलों की पुलिस को अदालत के सामने अपना पक्ष रखना होगा। उन्हें यह बताना होगा कि वर्तमान समय में डकैती अधिनियम का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा रहा है और पिछले वर्षों में इसके तहत कितने मामले दर्ज हुए हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट हो सकता है कि इन मामलों में कितने प्रकरण वास्तविक डकैती या संगठित अपराध से जुड़े थे और कितने अन्य प्रकार के विवादों से संबंधित थे।

कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी नजर

फिलहाल हाईकोर्ट ने डकैती अधिनियम को खत्म करने या इसके प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है। चार सप्ताह में जवाब दाखिल होने के बाद मामले की आगे सुनवाई होगी। उस दौरान सरकार के आंकड़े, कानून के इस्तेमाल का आधार और याचिका में लगाए गए आरोपों पर अदालत में विस्तार से बहस हो सकती है।

45 साल पुराने कानून की उपयोगिता पर छिड़ी नई बहस

इस मामले ने ग्वालियर-चंबल अंचल में कानून और बदलते अपराध के स्वरूप को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस खड़ी कर दी है। एक तरफ याचिकाकर्ता का तर्क है कि जिस समस्या से निपटने के लिए विशेष कानून बनाया गया था, वह अब पहले जैसी स्थिति में नहीं है। दूसरी तरफ सरकार और पुलिस का पक्ष यह स्पष्ट करेगा कि वर्तमान समय में इस कानून की आवश्यकता किन परिस्थितियों में बनी हुई है। हाईकोर्ट के सामने अब सबसे अहम सवाल यही है कि क्या बदलते अपराध के दौर में 1981 में बनाए गए इस विशेष कानून का मौजूदा इस्तेमाल पूरी तरह उचित है।