बैल पोला को लेकर भिवापुर में उत्साह: सजावटी सामान खरीदने उमड़े किसान, बाजार में 10 फीसदी बढ़ी बिक्री

बैल पोला को लेकर भिवापुर में उत्साह: सजावटी सामान खरीदने उमड़े किसान, बाजार में 10 फीसदी बढ़ी बिक्री

त्योहार के चलते बुधवार को ही लगा साप्ताहिक बाजार

भिवापुर: बैल पोला पर्व को लेकर भिवापुर शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में उत्साह का माहौल है। आमतौर पर भिवापुर में साप्ताहिक बाजार शुक्रवार को लगता है, लेकिन इस बार बैल पोला का त्योहार 10 सितंबर, गुरुवार को पड़ने के कारण बाजार बुधवार 9 सितंबर को ही लगाया गया। त्योहार के लिए खरीदारी करने बड़ी संख्या में किसान बाजार पहुंचे।

बाजार में बैलों को सजाने के लिए इस्तेमाल होने वाली विभिन्न सामग्री की दुकानें आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। किसान अपने बैलों को पोला के दिन विशेष रूप से सजाने के लिए घुंघरू की माला, रंग-बिरंगे सजावटी सामान, मोरपंखी और अन्य सामग्री खरीदते नजर आए।

सजावटी सामान की दुकानों पर किसानों की भीड़

बैल पोला किसानों के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि उनके कृषि जीवन और पशुधन के प्रति सम्मान का पर्व माना जाता है। सालभर खेतों में किसानों का साथ देने वाले बैलों को इस दिन नहलाकर सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है।

इसी परंपरा के चलते बुधवार को भिवापुर के बाजार में बैलों की सजावट से जुड़ी दुकानों पर अच्छी भीड़ देखने को मिली। आसपास के गांवों से आए किसान अपनी जरूरत के मुताबिक सजावटी सामान खरीदते नजर आए। बाजार में बैलों के लिए अलग-अलग तरह की सजावट और रंगीन सामग्री उपलब्ध रही।

भंडारा से आए दुकानदार, 1700 से 3000 रुपये तक के झूले

बैल पोला के अवसर पर भंडारा जिले के लाखनी-बोरगांव से लोकेश निर्वाण भी सजावटी सामान लेकर भिवापुर पहुंचे। उन्होंने बैल पोला के लिए आकर्षक मोरों और विभिन्न प्रकार के मखमली झूलों की बिक्री के लिए दुकान लगाई।

इन सजावटी झूलों की कीमत करीब 1700 रुपये से लेकर 3000 रुपये तक बताई गई। किसानों के बीच इन सजावटी सामानों को लेकर खासा उत्साह दिखाई दिया। त्योहार के मौके पर किसान अपने बैलों को पारंपरिक और आकर्षक रूप देने के लिए अपनी पसंद के अनुसार सामान खरीद रहे हैं।

35 साल से बाजार में बैलों की सजावट का सामान बेच रहे रामजी

नागपुर जिले की कुही तहसील के तारणा गांव निवासी रामजी हिरेखन पिछले करीब 35 वर्षों से भिवापुर के साप्ताहिक बाजार में बैलों की सजावट का सामान बेच रहे हैं। इतने लंबे समय से इस बाजार से जुड़े होने के कारण उन्हें बैल पोला के दौरान किसानों की जरूरतों और पसंद का अच्छा अनुभव है।

रामजी हिरेखन के पास घुंघरू की माला, लीवेन शाल, मटाटा जोड़, रंगीन मोरपंखी और अन्य पारंपरिक सजावटी सामान उपलब्ध रहते हैं। पोला के समय इन वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है और किसान अपने बैलों की सजावट के लिए इन्हें खरीदते हैं।

पिछले साल के मुकाबले सजावटी सामान की बिक्री बढ़ी

इस बार बैल पोला को लेकर किसानों में खरीदारी का अच्छा उत्साह देखने को मिला। बाजार में बैलों की सजावट से संबंधित सामान बेचने वाले दुकानदारों के मुताबिक पिछले वर्ष की तुलना में इस बार बिक्री में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।

किसानों की बढ़ी हुई खरीदारी से बाजार में रौनक भी बढ़ गई है। बैलों के लिए घुंघरू, रंग, सजावटी सामान और अन्य आवश्यक वस्तुओं के अलावा बैलगाड़ियों से जुड़े सामान की दुकानें भी बाजार में दिखाई दीं।

भिवापुर में दो स्थानों पर भरता है बैल पोला

भिवापुर शहर में बैल पोला का आयोजन दो प्रमुख स्थानों पर किया जाता है। पहला पोला धर्मापुर स्थित भीमादेवी मंदिर परिसर में और दूसरा शहर के आजा क्षेत्र स्थित विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर परिसर में आयोजित किया जाता है।

इन दोनों स्थानों पर त्योहार के दौरान बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण पहुंचते हैं। पोला स्थल के आसपास रंग-बिरंगे खिलौनों और अन्य वस्तुओं की दुकानें भी सजाई जाती हैं। इससे त्योहार का माहौल और अधिक उत्साहपूर्ण हो जाता है।

पोला से पहले बैलों को दिया जाता है विशेष निमंत्रण

बैल पोला की परंपरा के तहत त्योहार से एक दिन पहले बैलों को नहलाकर उनकी विशेष देखभाल की जाती है। किसान बैलों के कंधे पर हल्दी-कुमकुम लगाकर और उनकी पूजा की तैयारी करते हैं।

इसके बाद पारंपरिक रूप से बैलों को अगले दिन भोजन के लिए निमंत्रण दिया जाता है। स्थानीय परंपरा में इसे “आज आवतन घ्या, उद्या जेवायला या” कहकर बैलों को निमंत्रित करने की रस्म से जोड़ा जाता है।

बैलों की सेवा करने वाले मजदूरों को मिलते हैं नए कपड़े

बैल पोला के अवसर पर उन मजदूरों और परिवार के सदस्यों को भी सम्मान दिया जाता है, जो पूरे वर्ष बैलों की देखभाल और खेती के काम में सहयोग करते हैं। परंपरा के अनुसार कई किसान अपने बैलों की देखभाल करने वाले मजदूरों के लिए नए कपड़े खरीदते हैं।

इस परंपरा के जरिए खेती में बैलों और उनके साथ काम करने वाले लोगों के योगदान के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है। यही वजह है कि पोला पर्व ग्रामीण जीवन में सामाजिक जुड़ाव का भी महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है।

सजे-धजे बैलों को मिलता है पुरस्कार

बैल पोला के दौरान सामाजिक संगठनों की ओर से विशेष रूप से सजे-धजे और आकर्षक बैलों का चयन कर उन्हें पुरस्कार देने की परंपरा भी है। किसान अपने बैलों को रंग-बिरंगे आभूषणों और पारंपरिक सजावट से सजाकर पोला स्थल तक लेकर पहुंचते हैं।

कई किसान बैलों की सजावट पर विशेष ध्यान देते हैं। बैलों के सींग, गले और शरीर को अलग-अलग प्रकार की पारंपरिक सामग्री से सजाया जाता है, जिससे पोला स्थल पर रंगीन और आकर्षक दृश्य देखने को मिलता है।

आम के पत्तों के तोरण का भी विशेष महत्व

बैल पोला की रस्मों में आम के पत्तों से बनाए गए तोरण का भी विशेष महत्व बताया जाता है। पोला उत्सव के दौरान आम के पत्तों के तोरण को लेकर किसानों में उत्साह रहता है।

स्थानीय परंपरा के अनुसार पोला समाप्त होने के समय किसान आम के पत्तों से बने तोरण को लेने के लिए उत्सुक रहते हैं। ग्रामीण मान्यताओं और परंपराओं में इस तोरण को शुभ माना जाता है और किसान इसे अपने घरों में ले जाते हैं।

पूजा के बाद बैलों को खिलाई जाती है पुरणपोली

पोला की रस्म पूरी होने के बाद किसान अपने बैलों को घर लेकर जाते हैं। वहां बैलों की पूजा की जाती है और उन्हें विशेष भोजन कराया जाता है। इस दौरान पुरणपोली और पंचपकवान सहित पारंपरिक व्यंजन नैवेद्य के रूप में अर्पित किए जाते हैं।

इसके बाद किसान और परिवार के लोग आसपास के घरों में जाकर एक-दूसरे के साथ त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा सामाजिक मेल-जोल और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का भी माध्यम बनती है।

किसानों के लिए आस्था और कृषि परंपरा का पर्व

बैल पोला किसानों के जीवन में विशेष महत्व रखता है। खेती के काम में बैलों की भूमिका को सम्मान देने के उद्देश्य से मनाया जाने वाला यह पर्व ग्रामीण संस्कृति और कृषि परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

भिवापुर में इस बार त्योहार से पहले बाजार में दिखाई दे रही भीड़ और सजावटी सामान की बढ़ी मांग से साफ है कि किसान पूरे उत्साह के साथ बैल पोला मनाने की तैयारी कर रहे हैं। बाजारों में बढ़ी रौनक ने त्योहार के उत्साह को और बढ़ा दिया है।