ग्वालियर की 1.63 करोड़ की साइबर ठगी का मेरठ कनेक्शन, किराए के बैंक खाते से 7 राज्यों का पैसा ट्रांसफर
क्राइम ब्रांच ने तीन आरोपितों को पकड़ा; फर्जी फर्म के खाते में पहुंची थी 11 लाख की रकम, रोज 5 हजार रुपए लेकर साइबर ठगों को देते थे बैंक अकाउंट
मेरठ से पकड़े गए साइबर नेटवर्क के तीन सदस्य
ग्वालियर में निवेश के नाम पर हुई 1 करोड़ 63 लाख रुपए की साइबर ठगी की जांच अब मध्य प्रदेश से बाहर तक पहुंच गई है। ग्वालियर क्राइम ब्रांच ने इस मामले में मेरठ से तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि आरोपितों ने एक फर्जी फर्म के नाम से बैंक खाता खुलवाकर उसे साइबर ठगों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया था। पुलिस के मुताबिक इस खाते में सिर्फ ग्वालियर की ठगी की रकम ही नहीं, बल्कि सात अलग-अलग राज्यों से जुड़े साइबर अपराधों का पैसा भी पहुंचा।
निवेश का झांसा देकर ग्वालियर निवासी से ऐंठे 1.63 करोड़
मामला बहोड़ापुर क्षेत्र के रामदास घाटी निवासी मनीष जैन से जुड़ा है। आरोप है कि साइबर ठगों ने उन्हें निवेश के नाम पर अपने जाल में फंसाया और 22 अप्रैल से 20 जुलाई के बीच अलग-अलग ट्रांजैक्शन के जरिए 1 करोड़ 63 लाख रुपए की रकम हासिल कर ली। बड़ी रकम गंवाने के बाद मनीष जैन ने क्राइम ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद साइबर क्राइम विंग ने बैंक खातों और पैसों के ट्रांजैक्शन की कड़ियां जोड़ना शुरू किया।
11 लाख रुपए इसी खाते में पहुंचे
जांच के दौरान पुलिस को एक ऐसे बैंक खाते का पता चला, जिसमें इस साइबर ठगी से करीब 11 लाख रुपए ट्रांसफर किए गए थे। खाते की जांच आगे बढ़ी तो यह सामने आया कि अकाउंट एक फर्जी फर्म से जुड़ा हुआ था। पुलिस के अनुसार आरोपितों ने यह बैंक खाता खुद इस्तेमाल करने के बजाय साइबर अपराधियों को किराए पर दे रखा था। इसके बदले उन्हें प्रतिदिन 5 हजार रुपए मिलते थे।
एक खाते में सात राज्यों की ठगी का पैसा
क्राइम ब्रांच के लिए जांच का सबसे अहम पहलू यह रहा कि खाते में सिर्फ ग्वालियर के मामले की रकम नहीं मिली। पुलिस को सात राज्यों में हुई साइबर ठगी से जुड़े पैसों के लेनदेन के संकेत मिले हैं। इससे जांचकर्ताओं को इस बात की जानकारी मिल रही है कि किराए पर उपलब्ध कराया गया बैंक खाता एक बड़े साइबर नेटवर्क के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि खाते से रकम किन-किन खातों में भेजी गई और इसके पीछे कौन लोग काम कर रहे थे।
फर्जी फर्म और बैंक खातों का बना रखा था नेटवर्क
पुलिस की जांच में बैंक अकाउंट और फर्जी फर्म के इस्तेमाल का पैटर्न सामने आया है। साइबर अपराधी अक्सर ठगी की रकम सीधे अपने खातों में लेने के बजाय दूसरे लोगों के खातों का इस्तेमाल करते हैं, ताकि रकम के वास्तविक स्रोत तक पहुंचना मुश्किल हो। इस मामले में भी बैंक खाता उपलब्ध कराने वाले आरोपितों की भूमिका की जांच की जा रही है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि ऐसे और कितने खाते इस नेटवर्क को उपलब्ध कराए गए थे।
दिल्ली के 'साधू' तक पहुंचने की कोशिश
गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब इस नेटवर्क की अगली कड़ी तलाश रही है। जांच में दिल्ली के एक व्यक्ति का नाम सामने आने की बात कही गई है, जिसे 'साधू' के नाम से जोड़ा जा रहा है। पुलिस उसके संबंध गिरफ्तार आरोपितों और साइबर ठगी के नेटवर्क से जोड़कर देख रही है। बैंक खातों के लेनदेन, मोबाइल नंबरों और संपर्कों की पड़ताल के जरिए पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ठगी की रकम को आगे भेजने का पूरा सिस्टम कैसे काम करता था।
कमाई के लालच में बैंक खाता देना पड़ सकता है भारी
इस मामले ने बैंक खाता किराए पर देने के खतरे को भी सामने ला दिया है। कुछ लोग आसान कमाई के लालच में अपना बैंक अकाउंट दूसरे लोगों को इस्तेमाल करने के लिए दे देते हैं, लेकिन ऐसे खाते साइबर अपराध में इस्तेमाल होने पर खाताधारक भी पुलिस जांच के दायरे में आ सकता है। ग्वालियर के मामले में भी 5 हजार रुपए प्रतिदिन के बदले बैंक खाता उपलब्ध कराने की बात सामने आई है। अब पुलिस आरोपितों की भूमिका और उनकी जानकारी के स्तर की जांच कर रही है।
क्राइम ब्रांच अब पूरे नेटवर्क की तलाश में
तीनों आरोपितों से पूछताछ के जरिए क्राइम ब्रांच ठगी की रकम के पूरे ट्रेल को खंगाल रही है। सात राज्यों से जुड़े लेनदेन सामने आने के बाद जांच का दायरा और बढ़ गया है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क में बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले कितने लोग शामिल हैं, रकम को आगे किस तरह ट्रांसफर किया जाता था और ग्वालियर की 1.63 करोड़ रुपए की ठगी के पीछे मुख्य साइबर अपराधियों तक कैसे पहुंचा जाए।
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news desk MPcg