शहडोल में धान की फसल पर बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का खतरा, पीले पड़ रहे पत्ते; समय पर उपचार नहीं तो 50% तक नुकसान

शहडोल में धान की फसल पर बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट का खतरा, पीले पड़ रहे पत्ते; समय पर उपचार नहीं तो 50% तक नुकसान

लगातार बारिश और बदलते मौसम के बीच खेतों में दिखे रोग के लक्षण, कृषि वैज्ञानिक ने बताया बचाव का तरीका
धान के खेतों में बीमारी के लक्षण से बढ़ी किसानों की चिंता

शहडोल जिले में खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान पर बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट यानी जीवाणु झुलसा रोग का खतरा बढ़ता दिखाई दे रहा है। लगातार 15 से 20 दिनों तक हुई बारिश के बाद मौसम में अचानक बदलाव और उमस की स्थिति ने फसलों में रोग फैलने की आशंका बढ़ा दी है। जिले के कुछ किसानों ने अपनी धान की फसल में पत्तियों के किनारों पर पीले धब्बे दिखाई देने की शिकायत कृषि वैज्ञानिकों से की है।

पत्तियों के किनारों से शुरू हो रहे पीले धब्बे

चटहा गांव के किसानों के मुताबिक धान की पत्तियों पर किनारों की तरफ से पीले रंग के धब्बे दिखाई दे रहे हैं। शुरुआत में ये निशान छोटे नजर आते हैं, लेकिन धीरे-धीरे पत्तियों के दूसरे हिस्सों तक फैल सकते हैं। फसल में इस तरह के लक्षण देखकर किसान चिंतित हैं और उन्होंने कृषि विशेषज्ञों से संपर्क कर बीमारी की पहचान और उपचार के बारे में जानकारी ली है।

कृषि वैज्ञानिक ने बताया बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट

कृषि वैज्ञानिक डॉ. नितिन सिंघई के अनुसार धान में दिखाई देने वाले इन लक्षणों का संबंध बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट से हो सकता है, जिसे जीवाणु झुलसा या पत्ती झुलसा रोग भी कहा जाता है। यह जीवाणु से फैलने वाला रोग है। इसके शुरुआती लक्षण पत्तियों के ऊपरी हिस्से और किनारों पर पीले रंग के निशान के रूप में दिखाई दे सकते हैं। वैज्ञानिक के मुताबिक प्रभावित हिस्से को हाथ से मसलने पर चिपचिपा पदार्थ भी नजर आ सकता है।

समय पर पहचान नहीं हुई तो 20 से 50 प्रतिशत नुकसान

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बीमारी के शुरुआती लक्षणों पर ही ध्यान देने की सलाह दी है। बताया गया है कि यदि फसल में रोग की पहचान होने के बाद समय पर नियंत्रण के उपाय नहीं किए गए तो उत्पादन को 20 से 50 प्रतिशत तक नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में किसानों के लिए खेतों की नियमित निगरानी करना और पत्तियों में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना जरूरी बताया गया है।

कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के छिड़काव की सलाह

कृषि वैज्ञानिक के अनुसार जीवाणु से संबंधित इस रोग के नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP के इस्तेमाल की सलाह दी गई है। बताए गए उपचार के अनुसार 1 ग्राम दवा को एक लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव किया जा सकता है। हालांकि किसी भी रसायन का इस्तेमाल करते समय किसानों को उत्पाद के लेबल निर्देश और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही मात्रा और छिड़काव की विधि तय करनी चाहिए।

लगातार बारिश के बाद बदला मौसम बना चुनौती

शहडोल में इस बार खरीफ सीजन के दौरान मौसम में काफी बदलाव देखने को मिला है। शुरुआत में बारिश अपेक्षाकृत कम रहने के बाद बाद के दिनों में तेज बारिश हुई। इसके चलते किसानों ने धान की रोपाई पूरी की, लेकिन लगातार बारिश, नमी और उमस के बाद अब फसल में विभिन्न रोगों का खतरा बढ़ गया है। कृषि क्षेत्र में मौसम की यही स्थिति धान के लिए चुनौती बन रही है।

शहडोल में धान सबसे प्रमुख खरीफ फसल

आदिवासी बहुल शहडोल जिले में बड़ी संख्या में किसान खरीफ सीजन में धान की खेती करते हैं। यहां कई किसान वर्षा आधारित खेती पर निर्भर हैं और उनके लिए धान की फसल पूरे कृषि सीजन का प्रमुख आधार होती है। ऐसे में फसल में बीमारी का प्रकोप बढ़ने पर किसानों की आय और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

किसानों को खेतों की निगरानी रखने की जरूरत

फिलहाल किसानों के लिए सबसे जरूरी है कि वे धान की पत्तियों पर पड़ने वाले पीले धब्बों और अन्य असामान्य लक्षणों की लगातार निगरानी करें। किसी बीमारी की पुष्टि होने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही उपचार करें। बारिश और उमस के बीच फसल प्रबंधन में लापरवाही उत्पादन पर भारी पड़ सकती है, इसलिए शुरुआती लक्षणों पर कार्रवाई करना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।

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