MP में सड़कों से ज्यादा टोल की कमाई! 1,360 करोड़ की तीन सड़कों से वसूले गए 7,225 करोड़
टोल वसूली के आंकड़ों ने खड़े किए सवाल, निर्माण लागत से कई गुना ज्यादा रकम वसूलने का दावा; सड़क परियोजनाओं की लागत और टोल अवधि पर उठे सवाल
मध्य प्रदेश में सड़क परियोजनाओं और उनसे होने वाली टोल वसूली को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। नईदुनिया की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश की तीन प्रमुख सड़कों के निर्माण पर करीब 1,360 करोड़ रुपए खर्च किए गए, जबकि इनसे अब तक लगभग 7,225 करोड़ रुपए की टोल वसूली की जा चुकी है। यानी इन सड़कों से वसूली गई रकम उनकी निर्माण लागत से कई गुना अधिक बताई जा रही है। इसी अंतर को लेकर टोल व्यवस्था और सड़क परियोजनाओं की आर्थिक गणना पर सवाल उठ रहे हैं।
मामला सिर्फ टोल वसूली की रकम तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन सड़कों के निर्माण में सरकार या संबंधित एजेंसियों ने सीमित राशि खर्च की, वहां टोल वसूली की अवधि कितनी लंबी रखी गई और उसकी गणना किस आधार पर की गई। सड़क बनने के बाद वाहन चालकों से वर्षों तक टोल लिया जाता है। ऐसे में निर्माण लागत, रखरखाव खर्च, वित्तीय लागत और ठेके की शर्तों के बीच संतुलन को लेकर पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
मध्य प्रदेश में बीओटी यानी बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर मॉडल पर बनी कई सड़कों को लेकर पहले भी विधानसभा में सवाल उठते रहे हैं। विधानसभा की कार्यवाही में विधायकों ने आरोप लगाया था कि कुछ टोल सड़कों की लागत निकल जाने के बावजूद लंबे समय तक टोल वसूली जारी रही। इसी बहस में लेबड़-नयागांव फोरलेन का उदाहरण देते हुए टोल वसूली की लंबी अवधि पर भी सवाल उठाए गए थे।
टोल व्यवस्था का मूल उद्देश्य सड़क निर्माण में लगाए गए निवेश और उसके संचालन एवं रखरखाव की लागत की भरपाई करना होता है। लेकिन जब किसी परियोजना से प्राप्त टोल राशि निर्माण लागत की तुलना में कई गुना अधिक हो जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वाहन चालकों से टोल कितने समय तक लिया जाना चाहिए। यही वजह है कि टोल रोड की लागत, ट्रैफिक अनुमान, टोल दर और वसूली की अवधि की स्वतंत्र समीक्षा की मांग समय-समय पर सामने आती रही है।
विधानसभा की पुरानी कार्यवाही में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तत्कालीन बहस में एक विधायक ने आरोप लगाया था कि बीओटी से बनी कुछ टोल सड़कों की लागत निकल जाने के बाद भी वसूली की अवधि बढ़ा दी गई। वहीं सरकार की ओर से सड़क विकास, निर्माण और रखरखाव के लिए अलग-अलग बजट प्रावधानों और योजनाओं की जानकारी सदन में दी गई थी।
सड़क परियोजनाओं में टोल तय करते समय कई बातों को ध्यान में रखा जाता है। इसमें सड़क निर्माण की वास्तविक लागत, जमीन अधिग्रहण, पुल-पुलियों का निर्माण, रखरखाव, यातायात का अनुमान और परियोजना में लगाए गए निवेश की वसूली शामिल होती है। इसके आधार पर टोल दर और वसूली की अवधि निर्धारित की जाती है। इसलिए केवल निर्माण लागत और कुल टोल वसूली की तुलना से पूरी वित्तीय तस्वीर सामने नहीं आती। हालांकि, दोनों आंकड़ों के बीच इतना बड़ा अंतर होने पर परियोजना की शर्तों और टोल अवधि की समीक्षा का सवाल जरूर महत्वपूर्ण हो जाता है।
टोल वसूली का सीधा असर रोजाना इस मार्ग से गुजरने वाले वाहन चालकों पर पड़ता है। निजी वाहनों के साथ-साथ ट्रक, बस और अन्य व्यावसायिक वाहनों को भी निर्धारित दर के अनुसार टोल चुकाना पड़ता है। लंबी दूरी के व्यावसायिक परिवहन में टोल की राशि परिवहन लागत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। ऐसे में टोल की दर और वसूली की अवधि को लेकर पारदर्शिता वाहन मालिकों और आम यात्रियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
मध्य प्रदेश में सड़क नेटवर्क के विस्तार के साथ टोल सड़कों की संख्या भी बढ़ी है। बेहतर सड़कें मिलने से यात्रा का समय कम होता है और परिवहन व्यवस्था को फायदा मिलता है, लेकिन इसके साथ टोल भुगतान का बोझ भी जुड़ता है। यही कारण है कि सड़क की गुणवत्ता, टोल की दर और वसूली की अवधि के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी माना जाता है।
नईदुनिया की रिपोर्ट में सामने आए 1,360 करोड़ रुपए की निर्माण लागत और 7,225 करोड़ रुपए की टोल वसूली के आंकड़े इसी बहस को फिर सामने ला रहे हैं। अगर ये आंकड़े संबंधित परियोजनाओं की कुल स्वीकृत लागत और अब तक की वास्तविक टोल वसूली को दर्शाते हैं, तो परियोजना की वित्तीय शर्तों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि टोल वसूली में निर्माण लागत के अलावा रखरखाव, ब्याज, संचालन और अन्य खर्चों को किस तरह शामिल किया गया है।
सवाल यह भी है कि टोल वसूली की अवधि समाप्त होने के बाद सड़क का नियंत्रण और रखरखाव किसके पास रहेगा। बीओटी मॉडल में निजी कंपनी या कंसेशनायर को तय अवधि तक सड़क के संचालन और टोल वसूली का अधिकार मिलता है। अवधि पूरी होने के बाद परियोजना से जुड़े अधिकार और जिम्मेदारियां अनुबंध की शर्तों के अनुसार तय होती हैं। इसलिए हर सड़क के मामले में उसके कंसेशन एग्रीमेंट और वित्तीय मॉडल को देखना जरूरी होता है।
सरकार की तरफ से सड़क निर्माण और रखरखाव पर लगातार खर्च किया जाता है। विधानसभा में भी सड़क निर्माण, उन्नयन और संधारण के लिए करोड़ों रुपए के बजट प्रावधानों की जानकारी दी गई है। वर्ष 2019-20 की कार्यवाही में तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री ने 660 नई सड़क परियोजनाओं और 4,140 किलोमीटर लंबाई के कार्यों का उल्लेख किया था। साथ ही सड़क और पुल निर्माण तथा उन्नयन के लिए 6,920 करोड़ रुपए के प्रावधान की जानकारी दी गई थी।
ऐसे में टोल आधारित परियोजनाओं के साथ सरकारी सड़क परियोजनाओं की लागत और लाभ का तुलनात्मक अध्ययन भी जरूरी हो जाता है। आम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहता है कि सड़क सुविधा के बदले कितना भुगतान किया जा रहा है और कितने समय तक करना होगा।
फिलहाल 1,360 करोड़ रुपए की लागत वाली तीन सड़कों से 7,225 करोड़ रुपए की टोल वसूली का आंकड़ा सामने आने के बाद टोल व्यवस्था की पारदर्शिता, अनुबंध की शर्तों और वसूली की अवधि पर चर्चा तेज हो सकती है। आने वाले समय में यदि संबंधित विभाग इन परियोजनाओं की लागत, अब तक की वसूली, रखरखाव खर्च और टोल वसूली की शेष अवधि का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करता है, तो इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर और साफ हो सकेगी।
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