सोशल मीडिया पर फेमस होने के लिए घर में सजाया फर्जी कोर्ट: जज की स्क्रीन लगाकर खुद करता था बहस, हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला
भोपाल। सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स और व्यू बढ़ाने के लिए लोग किस हद तक जा सकते हैं, इसका एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर खुद को बड़ा वकील दिखाने के लिए अपने घर में ही फर्जी कोर्ट जैसा सेटअप तैयार कर लिया। कमरे में जज की तस्वीर या स्क्रीन लगाकर वह खुद को अदालत में बहस करता हुआ दिखाता था और वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर लोगों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करता था।
मामले की गंभीरता तब सामने आई, जब न्यायिक प्रक्रिया और अदालत से जुड़े कंटेंट के इस तरह इस्तेमाल की जानकारी हाईकोर्ट तक पहुंची। जांच के दौरान कथित तौर पर यह सामने आया कि जिस व्यक्ति को सोशल मीडिया पर लोग वकील और कानूनी जानकार समझ रहे थे, उसके वीडियो में दिखाई जा रही कोर्ट की पूरी गतिविधि वास्तविक अदालत की कार्यवाही नहीं थी।
घर के कमरे को बना दिया ‘कोर्ट रूम’
आरोपी ने अपने घर के एक कमरे को इस तरह तैयार किया था कि वह देखने में अदालत जैसा लगे। सामने जज की स्क्रीन या तस्वीर दिखाई जाती थी, जबकि खुद वह वकील की तरह खड़े होकर बहस करता था। वीडियो में उसकी भाषा और प्रस्तुति इस तरह रखी जाती थी, जिससे देखने वाले को लगे कि वह किसी वास्तविक न्यायिक कार्यवाही में हिस्सा ले रहा है।
बताया जा रहा है कि इन वीडियो का मुख्य उद्देश्य सोशल मीडिया पर रीच, व्यू और फॉलोअर्स बढ़ाना था। वह खुद को बड़ा वकील बताकर कानूनी मामलों पर अपनी राय देता और कोर्ट जैसी पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करके कंटेंट को ज्यादा प्रभावशाली बनाने की कोशिश करता था।
असली अदालत की तरह दिखाने की कोशिश
सोशल मीडिया के दौर में वीडियो की प्रस्तुति लोगों की धारणा पर बड़ा असर डालती है। इसी का फायदा उठाते हुए आरोपी ने अपने वीडियो में अदालत जैसा माहौल तैयार किया। जज की स्क्रीन, बहस करने का अंदाज और कानूनी भाषा का इस्तेमाल कर वह खुद को पेशेवर वकील के तौर पर प्रस्तुत करता था।
ऐसे वीडियो देखने वाले कई लोग इसे वास्तविक अदालत की कार्यवाही या किसी वास्तविक वकील का वीडियो समझ सकते थे। यही वजह है कि मामला सामने आने के बाद इसकी गंभीरता बढ़ गई।
हाईकोर्ट की नजर पड़ते ही खुला मामला
मामले की जानकारी हाईकोर्ट तक पहुंचने के बाद न्यायिक अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर उपलब्ध कंटेंट और उससे जुड़े तथ्यों को गंभीरता से लिया। जांच के दौरान यह पता लगाने की कोशिश की गई कि वीडियो में दिखाई जा रही कार्यवाही वास्तविक है या किसी व्यक्ति द्वारा तैयार किया गया सेटअप।
जांच आगे बढ़ने पर कथित फर्जी कोर्ट का पूरा खेल सामने आया। इसके बाद संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।
हालांकि, किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले आरोपों और जांच के आधिकारिक निष्कर्षों को अंतिम माना जाना उचित नहीं है। मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई की जाएगी।
सिर्फ वीडियो नहीं, न्यायपालिका की छवि से जुड़ा मामला
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल सोशल मीडिया कंटेंट बनाने का सवाल नहीं है। अदालत, जज और न्यायिक प्रक्रिया की पहचान का इस्तेमाल करके लोगों को भ्रमित करना न्यायपालिका की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
अगर कोई व्यक्ति अदालत जैसी पृष्ठभूमि तैयार करके खुद को वकील या कानूनी विशेषज्ञ बताता है, तो सोशल मीडिया पर उसे देखने वाले लोग उसकी बातों को आधिकारिक कानूनी सलाह या वास्तविक कोर्ट की कार्यवाही मान सकते हैं। इससे गलत जानकारी फैलने के साथ न्यायिक संस्थाओं की छवि पर भी असर पड़ सकता है।
सोशल मीडिया पर फर्जी पहचान का बढ़ता चलन
यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब सोशल मीडिया पर फर्जी पहचान और भ्रामक वीडियो तेजी से बढ़ रहे हैं। लोग ज्यादा व्यू और फॉलोअर्स हासिल करने के लिए कई बार वास्तविक घटनाओं, अदालतों, पुलिस अधिकारियों, सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक व्यक्तियों की तस्वीरों या वीडियो का इस्तेमाल करते हैं।
मध्य प्रदेश में भी हाल के महीनों में न्यायपालिका से जुड़े फर्जी डिजिटल कंटेंट के मामले सामने आए हैं। जुलाई 2026 में सिंगरौली के एक युवक पर जबलपुर हाईकोर्ट की फर्जी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तैयार कर उसे फेसबुक और X पर पोस्ट करने का आरोप लगा था। पुलिस के मुताबिक वह खुद को सुप्रीम कोर्ट का लीगल एडवाइजर बताता था और पूछताछ में सोशल मीडिया की लोकप्रियता बढ़ाने के उद्देश्य से वीडियो बनाने की बात सामने आई थी। इस मामले में हाईकोर्ट के स्वत: संज्ञान के बाद केस दर्ज किया गया और आरोपी को गिरफ्तार किया गया।
फर्जी कोर्ट और AI कंटेंट से बढ़ी चुनौती
डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आसान इस्तेमाल ने ऐसे मामलों को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अब किसी व्यक्ति की तस्वीर, आवाज या वीडियो को बदलकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो पहली नजर में वास्तविक दिखाई दे।
जुलाई 2025 में कर्नाटक हाईकोर्ट की कार्यवाही के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को यह समझाने के लिए एक उदाहरण दिया था कि इंटरनेट पर किसी न्यायिक संस्था के नाम से फर्जी अकाउंट बनाकर गलत जानकारी फैलाना कितना आसान है। उन्होंने AI से बनाए गए ऐसे वीडियो का भी उदाहरण दिया था, जिसमें जज की आवाज और चेहरे का इस्तेमाल करके गलत संदेश दिखाया जा सकता है।
इससे साफ है कि न्यायिक संस्थानों से जुड़े फर्जी डिजिटल कंटेंट को लेकर अदालतें भी गंभीर हैं।
असली वकील और फर्जी कानूनी पहचान में फर्क जरूरी
किसी व्यक्ति का कोर्ट जैसा वीडियो बनाना और कानूनी भाषा बोलना उसे वास्तविक अधिवक्ता नहीं बना देता। वकालत करने के लिए निर्धारित कानूनी योग्यता और बार काउंसिल से संबंधित आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन जरूरी होता है।
सोशल मीडिया यूजर्स के लिए भी यह समझना जरूरी है कि किसी वीडियो में व्यक्ति को काले कोट में देखकर या अदालत जैसी पृष्ठभूमि देखकर उसकी पेशेवर पहचान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। कानूनी सलाह से जुड़े मामलों में आधिकारिक और सत्यापित स्रोतों से जानकारी लेना ज्यादा सुरक्षित है।
व्यू और फॉलोअर्स की चाहत ने बढ़ाया फर्जी कंटेंट
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल होने की होड़ ने कंटेंट क्रिएटर्स के सामने एक नई चुनौती पैदा की है। सनसनीखेज, अलग और चौंकाने वाला कंटेंट जल्दी वायरल होता है। इसी वजह से कुछ लोग वास्तविकता और अभिनय के बीच की सीमा को पार कर देते हैं।
फर्जी कोर्ट बनाकर वीडियो तैयार करना इसी प्रवृत्ति का उदाहरण माना जा सकता है। जहां एक तरफ इसका मकसद ज्यादा व्यू और फॉलोअर्स हासिल करना हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ इससे देखने वाले लोगों के बीच गलत धारणा पैदा होने का खतरा रहता है।
हाईकोर्ट की कार्रवाई ने दिया स्पष्ट संदेश
इस मामले में हाईकोर्ट की सक्रियता यह संकेत देती है कि न्यायिक संस्थानों की पहचान और कार्यवाही का सोशल मीडिया पर गलत इस्तेमाल हल्के में नहीं लिया जाएगा। अदालतों से जुड़े वीडियो या तस्वीरों को संदर्भ से हटाकर पेश करना, फर्जी कोर्ट बनाकर वास्तविक कार्यवाही जैसा दिखाना या खुद को झूठी कानूनी पहचान देना गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
फिलहाल मामले की कानूनी प्रक्रिया के आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने की दौड़ में लोग कानून और संस्थाओं की गरिमा की सीमा कहां तक पार कर रहे हैं।
news desk MPcg