AC कोच में चूहों का आतंक, यात्रियों की नींद से लेकर सुरक्षा तक खतरे में; 13 साल से जारी समस्या पर रेलवे की व्यवस्था सवालों में
कभी नाक कुतर रहे चूहे तो कभी यात्रियों के बैग-कपड़े बना रहे निशाना, फर्स्ट AC तक पहुंची परेशानी; CAG रिपोर्ट में भी रेलवे की कीट नियंत्रण व्यवस्था पर उठ चुके हैं सवाल
फर्स्ट AC में बुजुर्ग की नाक कुतरी
ट्रेन में चूहों की मौजूदगी अब केवल गंदगी और असुविधा का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह यात्रियों की सुरक्षा से भी जुड़ता जा रहा है। हाल ही में ऊना-इंदौर एक्सप्रेस के फर्स्ट AC कोच में सफर कर रहे 78 वर्षीय सेवानिवृत्त असिस्टेंट कमांडेंट एचपी करण को चूहे ने घायल कर दिया। 24 अगस्त की इस घटना में आरोप है कि रात के समय चूहे ने सो रहे बुजुर्ग की नाक कुतर दी। परिवार की ओर से पहले ही कोच में चूहा दिखाई देने और गंदगी की शिकायत किए जाने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद घटना होने से रेलवे की सफाई और कीट नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए।
शिकायत के बाद भी नहीं हुआ प्रभावी कीट नियंत्रण
परिजनों के मुताबिक कोच में चूहा नजर आने के बाद रेलवे कर्मचारियों को इसकी जानकारी दी गई थी। शिकायत के बाद सफाई तो कर दी गई, लेकिन चूहों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं होने का आरोप है। रात में बुजुर्ग के घायल होने के बाद मामला गंभीर हो गया। इंदौर पहुंचने पर उन्हें उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। घटना सामने आने के बाद रेलवे ने भी कार्रवाई की और इंदौर कोचिंग डिपो के एसएसई निशित सिंह को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई। सफाई और कीट नियंत्रण का काम करने वाली कंपनी पर जुर्माना लगाए जाने की बात भी रेलवे की ओर से कही गई।
AC डक्ट से निकलते रहे चूहे और कॉकरोच
समस्या केवल एक ट्रेन या एक यात्री तक सीमित नहीं है। 1 सितंबर को इंदौर-दौंड एक्सप्रेस के फर्स्ट AC कोच में सफर कर रही एक यात्री ने एसी डक्ट से बार-बार चूहों के बाहर आने की शिकायत की। यात्री अपने साथ पांच महीने की बच्ची को लेकर सफर कर रही थीं। करीब 16 घंटे के सफर के दौरान चूहों के साथ कॉकरोच दिखाई देने की शिकायत भी की गई। यात्रियों के मुताबिक ऐसी स्थिति में रात को सीट पर आराम से सोना और सामान को सुरक्षित रखना मुश्किल हो जाता है। सवाल यह है कि प्रीमियम AC कोच में अगर चूहे डक्ट तक पहुंच रहे हैं तो नियमित जांच और कीट नियंत्रण व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
चूहे सिर्फ खाने तक सीमित नहीं, सामान भी कर रहे खराब
चूहों से परेशान यात्रियों की शिकायतों में सामान खराब होने के मामले भी सामने आते रहे हैं। कटनी के एक यात्री ने 2020 में थर्ड AC कोच में सफर के दौरान बैग और उसमें रखे कपड़ों को चूहों द्वारा कुतरे जाने की शिकायत की थी। मामला जिला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा। आयोग ने इसे रेलवे की सेवा में कमी मानते हुए यात्री को कुल 15 हजार रुपए क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया था। इसमें सामान के नुकसान, मानसिक परेशानी और मुकदमे के खर्च के लिए अलग-अलग राशि शामिल थी। यह मामला दिखाता है कि ट्रेन में चूहों की समस्या सिर्फ यात्रियों की परेशानी नहीं, बल्कि उनके निजी सामान के नुकसान तक पहुंच सकती है।
13 साल पहले भी CAG ने उठाए थे सवाल
ट्रेनों में चूहे और कॉकरोच मिलने की समस्या नई नहीं है। 2013 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट में रेलवे की कीट नियंत्रण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट के लिए बड़ी संख्या में ट्रेनों और यात्रियों का निरीक्षण व सर्वे किया गया था। सर्वे में यात्रियों के एक हिस्से ने ट्रेन के अंदर चूहे या कॉकरोच देखे जाने की जानकारी दी थी। CAG ने कीट नियंत्रण व्यवस्था में सुधार की जरूरत की ओर इशारा किया था। इसके बावजूद वर्षों बाद भी ऐसी शिकायतों का सामने आना रेलवे की व्यवस्था की लगातार निगरानी पर सवाल खड़ा करता है।
रेलवे के पास है कीट नियंत्रण का तय सिस्टम
रेलवे के पास ट्रेनों में चूहों को नियंत्रित करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया मौजूद है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक AC कोच और पेंट्री कार में नियमित रखरखाव के दौरान कीट नियंत्रण किया जाना चाहिए, जबकि आरक्षित गैर-AC कोच में भी निर्धारित अंतराल पर यह प्रक्रिया अपनाने का प्रावधान है। इसके लिए चूहे मारने वाली दवा, गोंद वाले बोर्ड, फंदे और अन्य उपाय इस्तेमाल किए जाते हैं। लापरवाही या शिकायत के मामलों में जुर्माने का भी प्रावधान बताया गया है। इसके बावजूद यदि चूहे लगातार कोच में दिखाई दे रहे हैं तो सवाल यह है कि व्यवस्था कागज पर ज्यादा मजबूत है या जमीन पर?
चूहे ट्रेन के अंदर पहुंचते कैसे हैं?
चूहों की समस्या केवल कोच की सफाई से जुड़ी नहीं होती। रेलवे के यार्ड, कोचिंग डिपो, पिट लाइन और स्टेबलिंग लाइन जैसे स्थान भी चूहों के लिए अनुकूल हो सकते हैं। यहां चूहों के बिल और उनके छिपने की जगहों को खत्म करना जरूरी होता है। ट्रेन के लंबे समय तक खड़े रहने के दौरान चूहे कोच के नीचे मौजूद हिस्सों, छोटे गैप और अन्य स्थानों से अंदर प्रवेश कर सकते हैं। इसके बाद भोजन की उपलब्धता और कचरा उन्हें कोच में टिके रहने का मौका देता है। इसलिए केवल कोच के अंदर सफाई करने के बजाय पूरी व्यवस्था में नियमित pest control जरूरी है।
यात्रियों के अनुभव ने बढ़ाई चिंता
ट्रेन यात्रियों के बीच भी चूहों और कॉकरोच को लेकर चिंता सामने आती रही है। यात्रियों का कहना है कि AC कोच के लिए अधिक किराया देने के पीछे साफ-सफाई और बेहतर यात्रा अनुभव की उम्मीद रहती है। ऐसे में यदि रात के समय सीट या बर्थ के आसपास चूहे घूमते दिखाई दें तो यात्री आराम से सफर नहीं कर पाता। कुछ यात्रियों ने तो चूहों के डर से ट्रेन में खाना खाने तक में परेशानी होने की बात कही। खासकर बुजुर्गों, बच्चों और परिवार के साथ यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए यह स्थिति और ज्यादा परेशान करने वाली हो सकती है।
प्रीमियम कोच में ऐसी स्थिति पर सबसे बड़ा सवाल
फर्स्ट AC और अन्य AC कोच में यात्रियों से सामान्य कोच की तुलना में ज्यादा किराया लिया जाता है। ऐसे में यात्रियों की अपेक्षा रहती है कि उन्हें साफ-सुथरा और सुरक्षित वातावरण मिले। यदि इन्हीं कोचों में चूहे और कॉकरोच दिखाई दें और वे यात्रियों या उनके सामान को नुकसान पहुंचाने लगें, तो रेलवे की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हाल की घटनाओं ने इस समस्या को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
कार्रवाई के बाद भी स्थायी समाधान जरूरी
ऊना-इंदौर एक्सप्रेस की घटना के बाद रेलवे की ओर से जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई और संबंधित कंपनी पर जुर्माने की बात सामने आई है। लेकिन यात्रियों के लिए केवल किसी एक घटना के बाद कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि रेलवे चूहों की समस्या के मूल कारणों पर लगातार काम करे। कोचिंग डिपो, यार्ड और ट्रेनों के अंदर नियमित निरीक्षण, भोजन और कचरे की बेहतर व्यवस्था, छोटे गैप की सीलिंग और समयबद्ध pest control जैसे उपायों की लगातार निगरानी होनी चाहिए।
सवाल 13 साल पुराना, समाधान आज भी अधूरा क्यों?
CAG की रिपोर्ट से लेकर हाल की ट्रेनों में सामने आई शिकायतों तक एक बात साफ दिखाई देती है कि चूहों की समस्या रेलवे के लिए पुरानी चुनौती है। सवाल यह नहीं है कि किसी एक ट्रेन में चूहा कैसे पहुंच गया, बल्कि सवाल यह है कि लंबे समय से मौजूद समस्या के बावजूद इसे स्थायी रूप से नियंत्रित क्यों नहीं किया जा सका। एक यात्री की नाक पर चोट या दूसरे यात्री के सामान को नुकसान पहुंचने के बाद कार्रवाई करने के बजाय क्या रेलवे ऐसी व्यवस्था बना सकता है जिससे शिकायत की नौबत ही न आए? यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के लिहाज से अब इस सवाल का जवाब जरूरी है।
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