बांग्लादेशियों के फर्जी पासपोर्ट का बड़ा नेटवर्क बेनकाब, 12 अफसरों की भूमिका जांच के घेरे में; मास्टरमाइंड के खुद के 4 पासपोर्ट भी फर्जी

बांग्लादेशियों के फर्जी पासपोर्ट का बड़ा नेटवर्क बेनकाब, 12 अफसरों की भूमिका जांच के घेरे में; मास्टरमाइंड के खुद के 4 पासपोर्ट भी फर्जी

डबरा से भोपाल तक फैला नेटवर्क, एक ही पते और मोबाइल नंबर से बने कई दस्तावेज; आवेदन थाने पहुंचने से पहले आता था ‘अर्जेंट’ का फोन

मध्य प्रदेश में बांग्लादेशी नागरिकों के लिए कथित तौर पर फर्जी भारतीय दस्तावेज और पासपोर्ट तैयार करने वाले अंतरराज्यीय नेटवर्क की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे सिस्टम की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्पेशल टास्क फोर्स यानी STF की जांच में भोपाल, ग्वालियर, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बैतूल से जुड़े करीब 12 पुलिस अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और अन्य विभागों के कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में आई है। STF अब यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले लोगों को सरकारी प्रक्रिया में किस स्तर पर मदद मिली और सत्यापन के दौरान इन गड़बड़ियों की पहचान क्यों नहीं हो सकी।

जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क की गतिविधियां वर्ष 2021 के आसपास ग्वालियर के डबरा से भी जुड़ी थीं। यहां एक ही पते, एक ही गवाह और एक ही मोबाइल नंबर के आधार पर कई पासपोर्ट तैयार होने की जानकारी सामने आई है। शुरुआती जांच के मुताबिक 17 संदिग्ध पासपोर्ट में समान जानकारी होने के बावजूद सत्यापन प्रक्रिया से दस्तावेज आगे बढ़ गए। STF अब उस समय डबरा थाने में तैनात अधिकारियों और पासपोर्ट वेरिफिकेशन से जुड़े पुलिसकर्मियों से पूछताछ की तैयारी में है।

विदेश मंत्रालय की चेतावनी के बावजूद सवालों के घेरे में सिस्टम

इस मामले में एक अहम तथ्य यह भी सामने आया है कि विदेश मंत्रालय की ओर से वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय को फर्जी पासपोर्ट से जुड़े मामलों को लेकर सूचना दी गई थी। इसके बावजूद प्रदेश स्तर पर इस नेटवर्क को रोकने के लिए क्या कार्रवाई की गई, इसकी भी जांच की जा रही है। STF अब पुराने रिकॉर्ड, पासपोर्ट आवेदन, पुलिस सत्यापन और संबंधित विभागों के दस्तावेजों को खंगाल रही है। जांच एजेंसी को आशंका है कि संदिग्ध दस्तावेजों की संख्या अभी सामने आए मामलों से ज्यादा हो सकती है।

100 से ज्यादा फर्जी पासपोर्ट होने की आशंका

STF की जांच का दायरा अब केवल सामने आए मामलों तक सीमित नहीं है। वर्ष 2021-22 और उसके बाद के वर्षों में डबरा सहित उन जिलों से जारी हुए पासपोर्ट और उनके पुलिस वेरिफिकेशन रिकॉर्ड की जांच की जा रही है, जहां संदिग्ध दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ। जांच एजेंसी को आशंका है कि फर्जी तरीके से तैयार किए गए पासपोर्ट की संख्या 100 से अधिक भी हो सकती है। पुराने आवेदनों और दस्तावेजों की जांच के बाद ही वास्तविक संख्या स्पष्ट होने की संभावना है।

भोपाल का गोविंदपुरा और ग्वालियर का डबरा बने नेटवर्क के अहम केंद्र

जांच में भोपाल और ग्वालियर इस नेटवर्क के प्रमुख केंद्र के तौर पर सामने आए हैं। भोपाल के गोविंदपुरा क्षेत्र के एक पते का इस्तेमाल बड़ी संख्या में पासपोर्ट आवेदनों में किए जाने की बात सामने आई है। इसी तरह ग्वालियर के डबरा स्थित एक बौद्ध विहार के पते से भी कई बांग्लादेशी नागरिकों के भारतीय दस्तावेज और पासपोर्ट तैयार किए जाने की जानकारी मिली है। एक ही पते का बार-बार इस्तेमाल होने के बावजूद सत्यापन प्रक्रिया में इन मामलों की जांच किस स्तर पर हुई, अब STF इसी सवाल का जवाब तलाश रही है।

आवेदन थाने पहुंचने से पहले आता था फोन, ‘अर्जेंट है’ कहकर तेजी से होता था वेरिफिकेशन

STF की जांच में कथित तौर पर यह भी सामने आया है कि कुछ पासपोर्ट आवेदन पुलिस सत्यापन के लिए थाने पहुंचने से पहले ही संबंधित पुलिसकर्मियों को उनके बारे में जानकारी मिल जाती थी। जांच एजेंसी के मुताबिक, फोन पर आवेदन को ‘अर्जेंट’ बताते हुए उसे जल्द क्लियर करने के लिए कहा जाता था। इसके बाद सत्यापन की प्रक्रिया तेजी से पूरी होने की बात सामने आई है। STF अब यह पता लगा रही है कि फोन कौन करता था, उसे आवेदनों की जानकारी पहले कैसे मिलती थी और पुलिस स्तर पर किसने सत्यापन प्रक्रिया को प्रभावित किया।

डबरा के तत्कालीन TI और पासपोर्ट सेल से जुड़े पुलिसकर्मी भी जांच में

जिन वर्षों में डबरा से संदिग्ध पासपोर्ट का सत्यापन हुआ, उस दौरान विनायक शुक्ला थाना प्रभारी के तौर पर पदस्थ थे। वर्तमान में वे दतिया में DSP के पद पर बताए जा रहे हैं। वहीं थाने की पासपोर्ट वेरिफिकेशन सेल से प्रधान आरक्षक भूपेंद्र गुर्जर जुड़े हुए थे। कुछ समय के लिए सुरेंद्र सिंह के थाना प्रभारी रहने की जानकारी भी सामने आई है। STF इन अधिकारियों और कर्मचारियों से यह जानने की कोशिश करेगी कि पासपोर्ट आवेदनों की जांच किस प्रक्रिया के तहत हुई और एक जैसे पते व अन्य जानकारियों के बावजूद सत्यापन में आपत्ति क्यों नहीं उठाई गई।

मास्टरमाइंड रियाल चौधरी के नाम पर ही मिले चार संदिग्ध पासपोर्ट

पूछताछ में नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड रियाल चौधरी से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। जांच एजेंसी के अनुसार रियाल चौधरी के नाम पर ही चार पासपोर्ट तैयार किए गए थे और इन सभी में कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि डबरा के स्थानीय बिचौलियों की मदद से उसके लिए दस्तावेज तैयार कराए गए। STF अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन दस्तावेजों की तैयारी से लेकर आवेदन और पुलिस सत्यापन तक कौन-कौन लोग जुड़े थे।

रियाल चौधरी से पूछताछ के आधार पर STF ने संभावित ठिकानों पर कार्रवाई के लिए अलग-अलग टीमें भेजी हैं। एजेंसी को उम्मीद है कि आगे की जांच में दस्तावेज तैयार करने वाले बिचौलियों और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों तक पहुंच बनाई जा सकेगी।

अब तक चार आरोपी गिरफ्तार, कई संदिग्धों की तलाश जारी

फर्जी पासपोर्ट नेटवर्क की जांच में अब तक रियाल चौधरी, जाय चौधरी बरुआ, महाराष्ट्र के उल्हासनगर से पकड़े गए प्रियान राय और दक्षिण दिल्ली से गिरफ्तार विप्लव अधिकारी के नाम सामने आए हैं। इनसे पूछताछ के आधार पर नेटवर्क के दूसरे सदस्यों और फर्जी दस्तावेज तैयार कराने वालों की जानकारी जुटाई जा रही है। STF की कई टीमें मध्य प्रदेश के बाहर भी संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं।

बौद्ध विहार के पते पर बने दस्तावेज, भिक्षु की पहचान को लेकर भी सवाल

डबरा स्थित जिस बौद्ध विहार के पते का इस्तेमाल कई पासपोर्ट के लिए किया गया, वहां की पहचान से जुड़ी जानकारी भी जांच में सामने आई है। एक भिक्षु के दस्तावेजों में अलग-अलग नाम दर्ज होने की बात कही जा रही है। आधार कार्ड में नाम रामेश्वर जाटव, जबकि वोटर आईडी में भंते संघप्रिय दर्ज बताया गया है। वहीं मठ की दीवार पर एक अन्य नाम लिखे होने की जानकारी सामने आई है।

भिक्षु की ओर से बताया गया है कि उन्होंने कुछ समय पहले बौद्ध धर्म अपनाया था और इसके बाद नया नाम रखा गया। हालांकि, STF अब यह जांच कर रही है कि अलग-अलग दस्तावेजों में दर्ज नाम और पहचान संबंधी जानकारी किस प्रक्रिया के तहत बनी और क्या इसका फर्जी पासपोर्ट नेटवर्क से कोई संबंध है। केवल नाम अलग होने के आधार पर किसी व्यक्ति की संलिप्तता तय नहीं की जा सकती; इसकी पुष्टि जांच के बाद ही होगी।

मठों में आने-जाने वालों का रिकॉर्ड नहीं, STF कर रही जांच

जांच के दौरान बौद्ध मठों में आने-जाने वाले लोगों के रिकॉर्ड को लेकर भी सवाल उठे हैं। STF को कथित तौर पर ऐसे स्थानों पर आगंतुकों का व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं मिला, जिससे यह पता लगाना मुश्किल हो रहा है कि कौन व्यक्ति कब आया, कितने समय तक रुका और कब वहां से गया। इसी वजह से जांच एजेंसी मठों से जुड़े रिकॉर्ड और वहां मौजूद लोगों की जानकारी भी खंगाल रही है। फिलहाल मठों की भूमिका को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

पांच साल के दस्तावेजों की जांच, कई विभाग STF के दायरे में

STF अब केवल पासपोर्ट जारी होने की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि उससे पहले तैयार किए गए भारतीय पहचान दस्तावेजों की पूरी श्रृंखला की जांच कर रही है। इसमें आधार, वोटर आईडी, निवास संबंधी प्रमाण, पुलिस सत्यापन और पासपोर्ट आवेदन से जुड़े रिकॉर्ड शामिल हैं। जांच एजेंसी यह भी देख रही है कि इन दस्तावेजों को तैयार कराने में किन सरकारी विभागों के स्तर पर प्रक्रिया पूरी हुई और कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं की गई।

STF के अनुसार पिछले करीब पांच वर्षों में फर्जी तरीके से भारतीय दस्तावेज तैयार करने और पासपोर्ट सत्यापन से जुड़े मामलों में जिन पुलिस अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और अन्य विभागीय कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध लग रही है, उनकी सूची तैयार की गई है। जरूरत के अनुसार इन सभी से पूछताछ की जाएगी।

STF की पांच टीमें मध्य प्रदेश के बाहर कर रही कार्रवाई

STF SP राजेश सिंह भदौरिया के मुताबिक, मामले में पांच टीमें मध्य प्रदेश के बाहर संभावित ठिकानों पर कार्रवाई कर रही हैं। जांच में ऐसे दस्तावेज भी मिले हैं, जिनमें कुछ आरोपियों के दो से तीन अलग-अलग दस्तावेज होने की जानकारी सामने आई है। एजेंसी अब पूरे नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास कर रही है।

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि एक ही पते, समान गवाह और समान मोबाइल नंबर जैसी जानकारियां कई आवेदनों में मौजूद थीं, तो सत्यापन के दौरान इन्हें क्यों नहीं पकड़ा गया। STF की जांच अब फर्जी दस्तावेज बनाने वालों के साथ-साथ उस पूरी सरकारी प्रक्रिया पर केंद्रित है, जिसके जरिए ये दस्तावेज और पासपोर्ट तैयार होकर सिस्टम से बाहर निकले। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे और सरकारी तंत्र के किस स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई।

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