भारतीय ज्ञान परंपरा को प्रमाण और प्रयोग के साथ दुनिया के सामने लाना जरूरी: डॉ. अतुल वैद्य

भारतीय ज्ञान परंपरा को प्रमाण और प्रयोग के साथ दुनिया के सामने लाना जरूरी: डॉ. अतुल वैद्य


संस्कृत महोत्सव 2026 में ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा का स्थान’ विषय पर संगोष्ठी, विद्वानों ने रखे विचार
संस्कृत और ज्ञान परंपरा पर मंथन

कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय के अभिनवभारती शैक्षणिक परिसर एवं विस्तार सेवा मंडल के संयुक्त तत्वावधान में संस्कृत महोत्सव 2026 के तहत ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा का स्थान’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चार और दीप प्रज्वलन के साथ हुई। संगोष्ठी के संयोजक एवं वारंगा परिसर के निदेशक प्रो. प्रसाद गोखले ने कहा कि कुलपति डॉ. अतुल वैद्य के मार्गदर्शन में अभिनवभारती परिसर का विस्तार ‘नालंदा से वारंगा’ की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।

प्रमाण के बिना अधूरा रह जाता है ज्ञान

अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति डॉ. अतुल वैद्य ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल संस्कृत भाषा तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। प्राचीन ज्ञान का बड़ा हिस्सा संस्कृत ग्रंथों में उपलब्ध है, लेकिन उसका विस्तार भाषा की सीमाओं से कहीं आगे है। उन्होंने कहा कि संस्कृत ग्रंथों का जितना व्यापक और गहन अध्ययन होना चाहिए था, वह अभी अपेक्षित स्तर तक नहीं हुआ है। इसी वजह से कई बार भारतीय ज्ञान से जुड़े विचारों और सिद्धांतों को पर्याप्त प्रमाण एवं साक्ष्यों के साथ दुनिया के सामने रखने में कठिनाई होती है।

मूल भाषा की समझ जरूरी

डॉ. वैद्य ने कहा कि पश्चिमी विद्वान किसी विषय का अध्ययन करते समय प्रमाणों और शोध के आधार पर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। वहीं, मूल संस्कृत भाषा की पर्याप्त समझ नहीं होने पर प्राचीन ग्रंथों के अर्थ को समझने में गलतियां हो सकती हैं। इससे कई बार मूल विचार का स्वरूप बदल जाता है और वही बदला हुआ अर्थ भारतीय ज्ञान परंपरा के रूप में आगे प्रचारित होने लगता है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति को दूर करने के लिए संस्कृत के मूल ग्रंथों का गंभीर और प्रमाण आधारित अध्ययन जरूरी है।

प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संबंध

कुलपति ने कहा कि विमानशास्त्र से लेकर यज्ञविधि तक भारतीय परंपरा में मौजूद विषयों के अंतर्निहित अर्थ, प्रक्रियाओं और उनके आधुनिक विज्ञान से संभावित संबंधों को प्रमाण एवं प्रयोग के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि संगोष्ठी में होने वाला विमर्श भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन और प्रस्तुतीकरण के लिए एक प्रभावी दिशा तय करने में मदद करेगा। उन्होंने ऐसी संगोष्ठियों का नियमित और व्यापक स्तर पर आयोजन किए जाने की आवश्यकता भी बताई।

सम्मान समारोह में विद्वानों का अभिनंदन

कार्यक्रम में महाराष्ट्र राज्य संस्कृत साधना पुरस्कार से सम्मानित प्रो. कविता होले, डॉ. चंद्रगुप्त वर्णेकर और श्रीमती श्वेता पवनीकर का अभिनंदन किया गया। जे. पी. नाईक आदर्श राज्य शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित प्रो. पराग जोशी को भी सम्मानित किया गया। इसके अलावा विश्वविद्यालय स्तर पर ‘संवार्ता’ नामक संस्कृत वार्तापत्र शुरू करने और उसके सफल एक वर्ष पूरे होने पर संपादिका डॉ. रेणुका बोकारे का विशेष सम्मान हुआ। कार्यक्रम में संस्कृत भारती विदर्भ प्रांत अध्यक्ष डॉ. मोहन खेडकर, मंत्री डॉ. श्रीनिवास वर्णेकर सहित नागपुर के विभिन्न स्कूलों और महाविद्यालयों के संस्कृत शिक्षक एवं प्राध्यापक मौजूद रहे। उद्घाटन सत्र के बाद आयोजित संगोष्ठी में डॉ. चंद्रगुप्त वर्णेकर, डॉ. मोहन खेडकर, डॉ. श्रीनिवास वर्णेकर, श्रद्धा तेलंग, डॉ. विभा क्षीरसागर, डॉ. वीणा गानू, प्रो. नंदा पुरी, प्रो. हरेकृष्ण अगस्ती, प्रो. कलापिनी अगस्ती, प्रो. कविता होले और डॉ. अरुण पवार ने विचार रखे। संचालन डॉ. रेणुका करंदीकर ने किया, जबकि आभार विस्तार सेवा निदेशक प्रो. पराग जोशी ने माना।