भोपाल मास्टर प्लान पर सरकार की तैयारी तेज, लागू होने में लग सकते हैं 6 महीने; मिक्स्ड लैंड यूज में आने पर भी तुरंत नहीं मिलेगी राहत

भोपाल मास्टर प्लान पर सरकार की तैयारी तेज, लागू होने में लग सकते हैं 6 महीने; मिक्स्ड लैंड यूज में आने पर भी तुरंत नहीं मिलेगी राहत

2005 के मास्टर प्लान के आधार पर चल रहा शहर, आवासीय इलाकों में कमर्शियल गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले बढ़ी हलचल

भोपाल में आवासीय इलाकों में चल रही कमर्शियल गतिविधियों और नगर निगम की सीलिंग कार्रवाई के बीच अब शहर के नए मास्टर प्लान को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सरकार नए मास्टर प्लान को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सरकार मास्टर प्लान को मंजूरी देकर इसकी घोषणा करती है, तो क्या इससे आवासीय इलाकों में चल रही दुकानों, संस्थानों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों को तुरंत राहत मिल जाएगी?

शहर में इस समय मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 15 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग से जुड़े मामले की अहम सुनवाई होनी है। एक तरफ नगर निगम की कार्रवाई, रहवासियों की आपत्तियां और व्यापारियों का विरोध है, तो दूसरी ओर सरकार नए मास्टर प्लान के जरिए शहर के भविष्य का रोडमैप तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

अर्बन प्लानिंग एक्सपर्ट सुयश कुलश्रेष्ठ के मुताबिक, यदि सरकार अभी नए मास्टर प्लान की घोषणा करती है, तो उसे जमीन पर लागू होने में कम से कम करीब 6 महीने लग सकते हैं। इसके अलावा किसी आवासीय क्षेत्र को मिक्स्ड लैंड यूज में शामिल किए जाने के बाद भी वहां संचालित व्यावसायिक गतिविधियों को नियमों के मुताबिक वैध कराने की प्रक्रिया अलग होगी।

21 साल पुराने मास्टर प्लान पर चल रहा भोपाल

भोपाल में फिलहाल साल 2005 के मास्टर प्लान के आधार पर ही विकास और भूमि उपयोग से जुड़े फैसले लिए जा रहे हैं। यानी शहर का मौजूदा प्लान करीब 21 साल पुराना हो चुका है। इस दौरान भोपाल की आबादी, सड़कें, कॉलोनियां, बाजार और व्यावसायिक गतिविधियां काफी बढ़ चुकी हैं।

एक्सपर्ट के अनुसार, मास्टर प्लान किसी भी शहर के सुनियोजित विकास का आधार होता है। इसमें यह तय किया जाता है कि किस इलाके में आवासीय उपयोग होगा, कहां व्यावसायिक गतिविधियां होंगी, कहां संस्थागत क्षेत्र विकसित होंगे और भविष्य में सड़कों, पानी, बिजली, सीवेज तथा अन्य सुविधाओं की जरूरत कितनी होगी।

पुराने मास्टर प्लान के कारण शहर में कई ऐसे इलाके विकसित हो गए हैं, जहां आवासीय उपयोग वाली जमीन और व्यावसायिक गतिविधियां एक-दूसरे के साथ आ गई हैं। यही स्थिति अब विवाद का बड़ा कारण बन रही है।

नया मास्टर प्लान होता तो कमर्शियल क्षेत्रों की पहले से होती प्लानिंग

अर्बन प्लानिंग एक्सपर्ट का कहना है कि अगर समय पर नया मास्टर प्लान तैयार और लागू हो जाता, तो शहर में बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की पहचान की जा सकती थी। उसी हिसाब से सड़कों की चौड़ाई, पार्किंग, सीवेज नेटवर्क, पानी की लाइन और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं की योजना बनाई जाती।

लेकिन जब किसी आवासीय इलाके में धीरे-धीरे दुकानें, कार्यालय, संस्थान या अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान बढ़ते हैं, तो वहां की मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ जाता है। कई कॉलोनियों में पार्किंग की समस्या और ट्रैफिक बढ़ने का एक कारण अनियोजित व्यावसायिक गतिविधियां भी मानी जाती हैं।

अरेरा कॉलोनी से शुरू हुआ विवाद इसी बड़े सवाल का हिस्सा है कि आवासीय क्षेत्रों में किस सीमा तक व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति हो और शहर की बदलती जरूरतों के हिसाब से जमीन के उपयोग में बदलाव कैसे किया जाए।

मिक्स्ड लैंड यूज में आने से क्या तुरंत खुल जाएंगी बंद दुकानें?

सरकार अगर अरेरा कॉलोनी, बावड़ियाकलां, रोहित नगर जैसे बड़े इलाकों को मिक्स्ड लैंड यूज में शामिल करती है, तब भी इसका मतलब यह नहीं होगा कि वहां मौजूद हर व्यावसायिक गतिविधि स्वतः वैध हो जाएगी।

एक्सपर्ट के मुताबिक मिक्स्ड लैंड यूज लागू करने के लिए भी निर्धारित नियम और प्रक्रिया होती है। ऐसे क्षेत्रों में यह देखना होगा कि सड़क, पार्किंग, पानी, बिजली और सीवेज जैसी सुविधाएं बढ़ी हुई व्यावसायिक गतिविधियों का भार उठा सकती हैं या नहीं।

इसके अलावा जिन भवनों को व्यावसायिक उपयोग के दायरे में लाया जाएगा, उनके भूमि उपयोग में बदलाव यानी डायवर्सन की प्रक्रिया भी करनी पड़ सकती है। इसके लिए संबंधित भवन मालिकों को निर्धारित शुल्क चुकाना पड़ सकता है। यह राशि कितनी होगी, इसका निर्धारण सरकार की नीति और नियमों के आधार पर किया जाएगा।

डायवर्सन की प्रक्रिया में भी लग सकता है 4 से 6 महीने का समय

मास्टर प्लान में किसी इलाके को मिक्स्ड लैंड यूज का दर्जा मिलना और व्यक्तिगत भवनों का उपयोग बदलना दो अलग प्रक्रियाएं हो सकती हैं। एक्सपर्ट के अनुसार, संबंधित भवनों को नियमों के तहत डायवर्ट करने की प्रक्रिया में भी करीब 4 से 6 महीने तक का समय लग सकता है।

यानी नए मास्टर प्लान की घोषणा होने के बाद भी व्यावसायिक गतिविधियां संचालित कर रहे लोगों को तत्काल राहत मिलने की गारंटी नहीं होगी। उन्हें सरकार द्वारा तय नियमों, शुल्क और अन्य शर्तों को पूरा करना पड़ सकता है।

यही वजह है कि व्यापारियों के लिए मास्टर प्लान की घोषणा जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि उसमें भूमि उपयोग और मिक्स्ड लैंड यूज को लेकर क्या प्रावधान किए जाते हैं।

पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी जुड़ा

भोपाल में आवासीय भवनों के व्यावसायिक इस्तेमाल और कथित अवैध निर्माण से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अगस्त के पहले सप्ताह में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से गठित 10 सदस्यीय जांच समिति की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।

साथ ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से दुकान संचालकों को मिली राहत से जुड़े आदेशों को भी निरस्त किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में चल रही जांच में हस्तक्षेप को लेकर भी स्पष्ट रुख अपनाया था।

अब 15 सितंबर को मामले की अगली सुनवाई होनी है। इससे पहले नगर निगम को अपनी कार्रवाई और स्थिति से संबंधित रिपोर्ट पेश करनी है। इसी प्रक्रिया के तहत राजधानी में बड़ी संख्या में नोटिस जारी किए गए और कई प्रतिष्ठानों पर सीलिंग की कार्रवाई की गई।

62 हजार नोटिस का लक्ष्य, शुरुआती चरण में 8 हजार से ज्यादा नोटिस

नगर निगम की कार्रवाई के तहत भोपाल में करीब 62 हजार नोटिस दिए जाने की बात सामने आई है। शुरुआती चरण में ही 8 हजार से ज्यादा नोटिस जारी किए गए। इसके बाद कार्रवाई को लेकर व्यापारियों और स्थानीय लोगों में विरोध बढ़ गया।

करीब 190 प्रतिष्ठान या तो स्वेच्छा से बंद हुए या फिर उन्हें सील किया गया। जैसे-जैसे कार्रवाई आगे बढ़ी, व्यापारियों की ओर से विरोध प्रदर्शन भी तेज होने लगा।

व्यापारियों का तर्क है कि कई प्रतिष्ठान लंबे समय से संचालित हो रहे हैं और अचानक कार्रवाई होने से कारोबार, रोजगार और निवेश पर असर पड़ेगा। वहीं रहवासियों का एक वर्ग आवासीय इलाकों में बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों से ट्रैफिक, पार्किंग और अन्य नागरिक सुविधाओं पर पड़ रहे दबाव को लेकर कार्रवाई के पक्ष में है।

चार बार सड़कों पर उतरे व्यापारी

नगर निगम की कार्रवाई के विरोध में व्यापारियों ने अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन किए। रोशनपुरा-न्यू मार्केट क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में व्यापारी सड़क पर उतरे। प्रदर्शन के दौरान करीब चार घंटे तक विरोध चला और स्थिति तनावपूर्ण होने की नौबत भी बनी।

व्यापारियों के प्रदर्शन के कारण रोशनपुरा चौराहे पर यातायात प्रभावित हुआ। इसके बाद कोलार व्यापारी महासंघ के आह्वान पर कोलार रोड का बाजार भी बंद रखा गया। इस दौरान बड़ी संख्या में दुकानों के साथ अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी बंद रहे।

अवधपुरी और रायसेन रोड समेत शहर के दूसरे इलाकों में भी व्यापारियों ने रैली और प्रदर्शन कर नगर निगम की कार्रवाई पर सवाल उठाए।

विरोध के बाद फिलहाल रुकी सीलिंग की कार्रवाई

लगातार विरोध के बाद नगर निगम ने फिलहाल सीलिंग की कार्रवाई रोक दी है। इसके बाद नए नोटिस और सीलिंग की कार्रवाई को लेकर भी स्थिति में बदलाव आया।

इसी बीच जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात कर पूरे मामले में समाधान की मांग रखी। दूसरी ओर अधिकारी और रहवासी भी अपना पक्ष सामने रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।

अब सरकार के सामने चुनौती यह है कि एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन हो और दूसरी तरफ शहर की मौजूदा जरूरतों तथा हजारों व्यापारियों और रहवासियों से जुड़े विवाद का समाधान भी निकले।

मुख्यमंत्री ने भी सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में मामला लाने के निर्देश दिए

नए मास्टर प्लान को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी अधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा है कि पूरे विषय को सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाया जाए और कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आगे की प्रक्रिया तय की जाए।

ऐसे में 15 सितंबर की सुनवाई काफी अहम मानी जा रही है। कोर्ट में सरकार की ओर से नए मास्टर प्लान, भविष्य की योजना और आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर क्या रुख रखा जाता है, इस पर भी नजर रहेगी।

भोपाल के लिए असली सवाल सिर्फ मास्टर प्लान नहीं, उसका अमल है

भोपाल के मौजूदा विवाद से यह साफ है कि केवल नया मास्टर प्लान तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। शहर में जिस तरह आबादी और व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ी हैं, उसके मुताबिक सड़क, पार्किंग, सीवेज, पानी और बिजली जैसी सुविधाओं की भी समानांतर योजना बनानी होगी।

यदि किसी क्षेत्र को मिक्स्ड लैंड यूज में शामिल किया जाता है, तो वहां पहले से संचालित प्रतिष्ठानों को किस प्रक्रिया से वैधता मिलेगी, कितना शुल्क देना होगा और कितने समय में डायवर्सन होगा—इन सवालों का स्पष्ट जवाब भी जरूरी होगा।

इसलिए फिलहाल व्यापारियों और रहवासियों दोनों की नजर सरकार के अगले कदम और सुप्रीम कोर्ट की 15 सितंबर की सुनवाई पर है। नए मास्टर प्लान से भोपाल के भविष्य की तस्वीर बदल सकती है, लेकिन इसका असर जमीन पर कब और किस तरह दिखाई देगा, यह उसके लागू होने और नियमों के क्रियान्वयन के बाद ही स्पष्ट होगा।