मध्य प्रदेश के दमोह में फर्जी डॉक्टर का खुलासा: ब्रिटिश डॉक्टर की चुराई पहचान, दर्जनों सर्जरी और 7 मौतों का सनसनीखेज मामला
दमोह, मध्य प्रदेश (8 अप्रैल 2025): मध्य प्रदेश के दमोह जिले में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक शख्स ने ब्रिटिश कार्डियोलॉजिस्ट की पहचान चुराकर मिशन हॉस्पिटल में नकली डॉक्टर के तौर पर काम किया और दर्जनों हृदय सर्जरी को अंजाम दिया। इस फर्जीवाड़े के चलते कम से कम 7 मरीजों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य मामले अभी जांच के दायरे में हैं। इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही और फर्जीवाड़े की गहरी खाई को उजागर किया है। आइए, इस मामले की पूरी कहानी और अब तक की कार्रवाई पर नजर डालते हैं।
फर्जी डॉक्टर की असली पहचान और उसका तरीका
जांच में पता चला कि यह शख्स, जिसका असली नाम नरेंद्र विक्रमादित्य यादव है, ने खुद को लंदन के मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. एन जॉन केम के नाम से पेश किया। उसने जाली दस्तावेजों के जरिए दमोह के मिशन हॉस्पिटल में नौकरी हासिल की और दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच कम से कम 15 हृदय सर्जरी कीं, जिनमें एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी जैसी जटिल प्रक्रियाएं शामिल थीं। उसका तरीका बेहद सुनियोजित था—वह विदेशी डॉक्टर की पहचान और कथित अनुभव का दावा कर मरीजों और अस्पताल प्रशासन का भरोसा जीतता था। उसने अपने जाली दस्तावेजों में आंध्र प्रदेश मेडिकल काउंसिल से कथित पंजीकरण का हवाला दिया, जो बाद में जांच में फर्जी पाया गया।
नरेंद्र यादव का व्यवहार भी एक अनुभवी डॉक्टर जैसा था। मिशन हॉस्पिटल की प्रभारी मैनेजर पुष्पा खरे के मुताबिक, "कोई भी उसे फर्जी डॉक्टर होने का शक नहीं कर सकता था। वह अपने काम में कुशल लगता था और बड़े प्रोफेसर की तरह व्यवहार करता था।" उसकी नियुक्ति एक एजेंसी IWUS के जरिए हुई थी, जो मध्य प्रदेश सरकार के साथ पंजीकृत है। हालांकि, एजेंसी और अस्पताल दोनों ने उसके दस्तावेजों की गहन जांच नहीं की, जो इस पूरे फर्जीवाड़े की नींव बनी।
कैसे खुला राज?
यह सनसनीखेज मामला तब सामने आया जब दमोह चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष और वकील दीपक तिवारी को कुछ मरीजों के परिजनों ने शिकायत की। तिवारी के मुताबिक, कुछ मरीजों के परिजनों ने बताया कि सर्जरी के बाद उनके मरीजों की हालत बिगड़ गई और कई की मौत हो गई। एक परिवार ने अपने पिता को ऑपरेशन से पहले संदेह होने पर जबलपुर ले जाकर जांच कराई, जहां पता चला कि दमोह में काम करने वाला "डॉ. एन जॉन केम" फर्जी है। तिवारी ने फरवरी में इसकी शिकायत जिला प्रशासन से की, जिसके बाद जांच शुरू हुई।
जांच में सामने आया कि असली डॉ. एन जॉन केम ब्रिटेन में एक प्रतिष्ठित कार्डियोलॉजिस्ट हैं, जबकि नरेंद्र यादव ने उनकी पहचान चुराकर यह खेल रचा। दीपक तिवारी का दावा है कि आधिकारिक तौर पर 7 मौतें दर्ज की गई हैं, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है।
इससे जुड़े अन्य मामले
नरेंद्र यादव का आपराधिक इतिहास भी चौंकाने वाला है। जांच में पता चला कि वह पहले भी कई राज्यों में इसी तरह के फर्जीवाड़े में शामिल रहा है। साल 2006 में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में अपोलो हॉस्पिटल में उसने सर्जरी की थी, जिसमें तत्कालीन विधानसभा स्पीकर राजेंद्र प्रसाद शुक्ल की मौत हो गई थी। इसके अलावा, 2019 में तेलंगाना पुलिस ने उसे चेन्नई के पास से गिरफ्तार किया था, जहां उसने एक निजी अस्पताल के 100 से ज्यादा कर्मचारियों की सैलरी हड़पने का आरोप लगाया गया था। इतना ही नहीं, वह हैदराबाद में भी फर्जी डॉक्टर के तौर पर पकड़ा जा चुका है। दमोह के पुलिस अधीक्षक श्रुत किर्ति सोमवंशी ने बताया कि उसका एमबीएस डिग्री और मेडिकल काउंसिल पंजीकरण भी जांच में फर्जी पाया गया है।
प्रशासन की कार्रवाई
इस मामले के उजागर होने के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई शुरू की। 7 अप्रैल 2025 को नरेंद्र यादव को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से गिरफ्तार कर लिया गया। दमोह पुलिस ने उसके खिलाफ कोतवाली थाने में धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप में एफआईआर दर्ज की है। साथ ही मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम, 1987 के तहत भी कार्रवाई की जा रही है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. एमके जैन की शिकायत के आधार पर यह जांच शुरू हुई, जिसमें पाया गया कि नरेंद्र यादव का मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल में कोई पंजीकरण नहीं था। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने भी इस मामले में संज्ञान लिया है और 7 से 9 अप्रैल तक दमोह में एक टीम भेजकर जांच कर रही है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सख्त कार्रवाई का आश्वासन देते हुए कहा, "ऐसे मामलों में हमारी सरकार कोई ढिलाई नहीं बरतेगी। स्वास्थ्य विभाग को राज्य में अन्य संदिग्ध मामलों की जांच के निर्देश दिए गए हैं।"
मिशन हॉस्पिटल और आयुष्मान भारत योजना का कोण
यह भी खुलासा हुआ कि मिशन हॉस्पिटल आयुष्मान भारत योजना के तहत सरकार से धन ले रहा था। एनएचआरसी सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा कि इस योजना के तहत लाखों रुपये का फर्जीवाड़ा संभव है, जिसकी जांच की जा रही है। मृतकों के परिजनों का आरोप है कि अस्पताल ने मौतों को छिपाने के लिए पोस्टमॉर्टम से बचने की कोशिश की और इसे "दिल का दौरा" बताकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की।
निष्कर्ष
दमोह का यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं में विश्वास की कमी और सिस्टम की नाकामी को उजागर करता है। नरेंद्र यादव जैसे फर्जी डॉक्टर ने न सिर्फ मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ किया, बल्कि अस्पताल प्रशासन और नियुक्ति एजेंसियों की लापरवाही को भी सामने लाया। प्रशासन अब इस मामले की गहराई से जांच कर रहा है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। मृतकों के परिवार अब इंसाफ की मांग कर रहे हैं, और यह देखना बाकी है कि इस फर्जीवाड़े के पीछे और कौन-कौन जिम्मेदार ठहराया जाएगा।