टैरिफ से रूसी तेल तक... भारतीयों की खरी-खरी से बैचेन हुए ट्रंप के सहयोगी नवारो, बोले- भूल नहीं सकता

टैरिफ से रूसी तेल तक... भारतीयों की खरी-खरी से बैचेन हुए ट्रंप के सहयोगी नवारो, बोले- भूल नहीं सकता

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार एवं मैन्युफैक्चरिंग मामलों के वरिष्ठ काउंसलर पीटर नवारो ने भारत और रूस के बीच तेल व्यापार को लेकर एक बार फिर अपनी प्रतिक्रिया दी है। हालांकि इस बार उनके बयान में पहले की तुलना में नरम रुख दिखाई दिया। नवारो ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बहुत अच्छे कामकाजी संबंध हैं और रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत-अमेरिका के बीच चल रहे टैरिफ विवाद को दोनों नेता आपस में सुलझा सकते हैं।

नवारो ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है, जब रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव बढ़ रहा है। अमेरिका में रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने के लिए नए प्रतिबंधों और टैरिफ संबंधी प्रावधानों को आगे बढ़ाया गया है। खास तौर पर अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त 2026 को रूस से जुड़े प्रतिबंधों वाले व्यापक विधेयक को 86-11 के भारी बहुमत से पारित किया। इस विधेयक में रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति को देने का प्रावधान है।

भारतीय यूजर्स की आलोचना का भी किया जिक्र

एएनआई को दिए इंटरव्यू में नवारो ने भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की ओर से मिली तीखी प्रतिक्रिया का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान उन्होंने भारत और रूस के तेल व्यापार को लेकर एक लेख लिखा था। उनका दावा था कि युद्ध शुरू होने से पहले भारत रूस के साथ इतनी बड़ी मात्रा में तेल व्यापार नहीं करता था।

नवारो के मुताबिक, बाद में भारत रूसी तेल खरीद में काफी बड़े स्तर पर शामिल हो गया और रूस से आने वाले कच्चे तेल से रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का व्यापार भी बढ़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे अप्रत्यक्ष रूप से रूस की युद्ध क्षमता को आर्थिक मदद मिलती है। हालांकि भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का मुख्य आधार देश की ऊर्जा सुरक्षा, उपलब्धता और कीमतों का संतुलन है।

नवारो ने कहा कि अपने उस लेख और बयानों के बाद उन्हें इंटरनेट पर भारतीयों की ओर से तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस प्रतिक्रिया को याद करते हुए कहा कि वह इसे भूल नहीं सकते। अमेरिकी अधिकारी ने भारतीय यूजर्स से इस तरह के व्यक्तिगत हमलों से बचने की अपील भी की।

अब नवारो ने मोदी-ट्रंप संबंधों पर जताया भरोसा

दिलचस्प बात यह है कि भारत को लेकर कड़े बयान देने वाले नवारो ने इस बार प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के रिश्तों को मजबूत बताया। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं के बीच अच्छे कामकाजी संबंध हैं और रूसी तेल तथा टैरिफ को लेकर पैदा हुए मतभेदों को दोनों अपने स्तर पर सुलझा लेंगे।

नवारो ने यह भी संकेत दिया कि इस मामले में हर मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी या किसी तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच सीधे संवाद से इस विवाद का समाधान निकाला जा सकता है।

100 फीसदी टैरिफ का मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?

अमेरिकी सीनेट से पारित Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाना है। विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल या गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच खरीदार देशों के सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। यह प्रावधान अपने आप भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लागू नहीं करता, बल्कि राष्ट्रपति को ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार देता है।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सीनेट से विधेयक पारित होने के बाद भी यह तत्काल कानून नहीं बन गया है। इसे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से भी मंजूरी मिलनी है और उसके बाद राष्ट्रपति की भूमिका होगी। रिपोर्टों के मुताबिक प्रतिनिधि सभा में इस विधेयक पर आगे की प्रक्रिया अगस्त अवकाश के बाद हो सकती है।

सीनेट में 86-11 से पास हुआ विधेयक

7 अगस्त को अमेरिकी सीनेट ने इस विधेयक को 86-11 के वोट से मंजूरी दी। यह विधेयक रूस पर नए प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस की ऊर्जा खरीद करने वाले देशों पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति का हिस्सा है।

विधेयक में रूस के अधिकारियों और अन्य संबंधित संस्थाओं पर प्रतिबंधों के अलावा रूस के तेल और गैस के प्रमुख खरीदारों पर संभावित टैरिफ की व्यवस्था शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, रूस से ऊर्जा खरीदने वाले शीर्ष देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की शक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति को मिल सकती है।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस प्रावधान के लागू होने के लिए आगे की विधायी प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि भारत पर 100 फीसदी अमेरिकी टैरिफ लागू हो चुका है।

भारत रूस से इतना तेल क्यों खरीद रहा है?

यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूसी ऊर्जा पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वैश्विक तेल व्यापार का ढांचा काफी बदल गया। रूस ने अपने कच्चे तेल को नए बाजारों में भेजना शुरू किया और भारत तथा चीन जैसे बड़े एशियाई खरीदारों ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई।

भारत के लिए रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्रतिस्पर्धी कीमत रही है। भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी क्रूड को खरीदकर उसे पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने का काम किया है। इससे भारत को घरेलू ईंधन जरूरतों के साथ-साथ रिफाइनिंग और निर्यात कारोबार में भी फायदा मिला है।

जून 2026 में रूसी कच्चे तेल की भारत के कुल क्रूड आयात में हिस्सेदारी करीब 52.4 फीसदी तक पहुंच गई थी। Kpler के आंकड़ों के अनुसार, जून में भारत ने रूस से करीब 2.61 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया, जो मई के मुकाबले करीब 39 फीसदी ज्यादा था।

भारत रूस का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार

ऊर्जा व्यापार पर नजर रखने वाली संस्था Centre for Research on Energy and Clean Air यानी CREA के आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में भारत रूस से जीवाश्म ईंधन खरीदने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार था। उस महीने भारत ने रूस से करीब 5.8 अरब यूरो मूल्य के जीवाश्म ईंधन खरीदे, जिसमें कच्चे तेल की हिस्सेदारी लगभग 83 फीसदी थी।

CREA के आंकड़ों के मुताबिक मई में रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार चीन और भारत थे। रूसी क्रूड के निर्यात में चीन की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी और भारत की करीब 36 फीसदी बताई गई थी।

यानी अमेरिकी दबाव केवल भारत पर केंद्रित नहीं है। रूस के ऊर्जा निर्यात के सबसे बड़े बाजारों में चीन भी शामिल है। यही वजह है कि अमेरिकी नीति के सामने सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और भू-राजनीति से जुड़े सवाल भी खड़े होते हैं।

अमेरिका के लिए भी आसान नहीं है भारत पर भारी टैरिफ

भारत पर संभावित 100 फीसदी टैरिफ का मुद्दा दोनों देशों के लिए संवेदनशील है। अमेरिका भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार है, जबकि भारत भी अमेरिका के साथ व्यापार और रणनीतिक संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है।

यदि रूस से तेल खरीदने के कारण भारत के अमेरिकी बाजार में जाने वाले सामान पर बहुत ऊंचा अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है। टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान, ऑटो कंपोनेंट्स, फार्मास्यूटिकल्स और अन्य क्षेत्रों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है। दूसरी तरफ, अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर भी महंगे आयात का असर पड़ने की आशंका रहेगी।

इसी वजह से सीनेट में विधेयक पारित होने के बावजूद अंतिम नीति में बातचीत, छूट और राष्ट्रपति के विवेक की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। अमेरिकी सांसदों के एक वर्ग ने पहले ही राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने को लेकर चिंता जताई है।

भारत-अमेरिका रिश्तों की परीक्षा

रूसी तेल का मुद्दा भारत-अमेरिका संबंधों में एक जटिल परीक्षा बन चुका है। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, व्यापार और रणनीतिक सहयोग लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है, लेकिन रूस के साथ भारत के पुराने और ऊर्जा-आधारित संबंध अमेरिकी प्रतिबंध नीति से टकरा रहे हैं।

यही कारण है कि नवारो का ताजा बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक तरफ अमेरिकी प्रशासन रूस से तेल खरीद को लेकर दबाव बना रहा है, तो दूसरी तरफ ट्रंप के वरिष्ठ सलाहकार प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच मजबूत कामकाजी रिश्तों पर भरोसा जता रहे हैं।

फिलहाल स्थिति साफ है—अमेरिकी सीनेट ने 100 फीसदी तक संभावित टैरिफ का रास्ता खोलने वाला विधेयक पास किया है, लेकिन भारत पर ऐसा टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। आगे की तस्वीर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की कार्रवाई, विधेयक के अंतिम स्वरूप और सबसे महत्वपूर्ण रूप से वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच होने वाली बातचीत से तय होगी।

ऐसे में पीटर नवारो का यह कहना कि ट्रंप और मोदी मिलकर इस मुद्दे को सुलझा सकते हैं, मौजूदा तनाव के बीच अमेरिका की ओर से बातचीत की गुंजाइश का संकेत भी माना जा रहा है।