जिस अफसर की पहचान कुर्सी से नहीं, काम से बनी—तुकाराम मुंढे
सख्त प्रशासन, मौके पर जाकर कार्रवाई और नियमों के पालन की शैली ने बनाई अलग पहचान; अब महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा पर बड़ा फोकस
सरकारी व्यवस्था में किसी अधिकारी की पहचान अक्सर उसके पद और जिम्मेदारी से होती है, लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं जिनका नाम उनकी कार्यशैली से पहचाना जाता है। तुकाराम मुंढे भी ऐसे ही अधिकारियों में गिने जाते हैं। सख्त प्रशासन, नियमों का पालन, फील्ड में जाकर स्थिति का जायजा लेना और गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई करने की शैली ने उन्हें महाराष्ट्र के चर्चित IAS अधिकारियों में शामिल किया है।
2026 में महाराष्ट्र के Food and Drug Administration (FDA) Commissioner के तौर पर उनकी गतिविधियां एक बार फिर चर्चा में हैं। खाद्य सुरक्षा, मिलावट, अस्वच्छता और नियमों के उल्लंघन के मामलों में FDA की कार्रवाई को लेकर मुंढे का नाम लगातार सुर्खियों में आया है।
हालांकि, मुंढे की पहचान केवल मौजूदा कार्रवाई से नहीं बनी। करीब दो दशक के प्रशासनिक करियर में उन्होंने महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और अपनी अलग कार्यशैली के कारण चर्चा में रहे।
गांव से शुरू हुआ सफर
तुकाराम मुंढे का जन्म 3 जून 1975 को महाराष्ट्र के बीड जिले के ताडसोना गांव में हुआ। उनका शुरुआती जीवन ग्रामीण परिवेश में बीता। परिवार की पृष्ठभूमि कृषि से जुड़ी रही और शुरुआती शिक्षा जिला परिषद स्कूल से हुई।
ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल UPSC के जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा तक पहुंचना उनके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में माना जाता है।
उनका प्रशासनिक करियर 2005 बैच के IAS अधिकारी के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद महाराष्ट्र में अलग-अलग पदों पर काम करते हुए उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था, स्थानीय समस्याओं, सार्वजनिक सेवाओं और नियमन से जुड़े मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई।
तबादलों ने भी बनाया चर्चा का विषय
मुंढे के करियर की चर्चा उनके काम के साथ-साथ उनके लगातार तबादलों को लेकर भी होती रही है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में उनके करीब 25 बार तबादले होने का उल्लेख मिलता है।
हालांकि तबादलों की संख्या और उनके पीछे के कारणों को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग-अलग दावे रहे हैं, लेकिन इतना जरूर है कि उनका प्रशासनिक करियर कई बार विवादों और चर्चाओं में रहा।
उनकी कार्यशैली को लेकर समर्थक उन्हें नियमों को सख्ती से लागू करने वाला अधिकारी मानते हैं, जबकि आलोचक कई बार उनके फैसलों को जरूरत से ज्यादा सख्त बताते रहे हैं।
यही विरोधाभास उनके व्यक्तित्व को दूसरे अधिकारियों से अलग बनाता है।
पानी की समस्या से लेकर प्रशासनिक सुधार तक
तुकाराम मुंढे ने अपने करियर में केवल कानून-व्यवस्था या कार्यालयी प्रशासन तक खुद को सीमित नहीं रखा। सोलापुर कलेक्टर के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान पानी की समस्या और टैंकरों पर निर्भरता जैसे मुद्दों पर भी काम किया गया।
स्थानीय स्तर की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय करने की उनकी शैली कई जगह दिखाई दी।
उनसे जुड़े पुराने प्रशासनिक कार्यों की रिपोर्टों में अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गड़बड़ियों को रोकने के प्रयासों का भी उल्लेख मिलता है।
यानी उनकी कार्यशैली में एक बात लगातार दिखाई देती रही—सिर्फ कार्यालय से आदेश जारी करने के बजाय मौके पर जाकर स्थिति को समझना और उसके आधार पर कार्रवाई करना।
PMPML में भी लिए कड़े फैसले
पुणे की सार्वजनिक परिवहन संस्था PMPML में जिम्मेदारी संभालने के दौरान भी मुंढे की कार्यशैली चर्चा में रही।
उनके कार्यकाल में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई प्रशासनिक फैसले लिए गए। इनमें किराया और परिवहन व्यवस्था से जुड़े बदलाव भी शामिल थे।
इन फैसलों को लेकर विवाद और विरोध भी हुआ। करीब नौ महीने बाद उनका तबादला कर दिया गया।
मुंढे के करियर में इस तरह के घटनाक्रम कई बार देखने को मिले। वे ऐसे अधिकारी के तौर पर सामने आए जो फैसले लेने से पीछे नहीं हटते, लेकिन उन फैसलों के बाद होने वाले राजनीतिक, सामाजिक या प्रशासनिक विरोध का सामना भी करते हैं।
अब खाद्य सुरक्षा पर सबसे बड़ा फोकस
2026 में महाराष्ट्र के Food and Drug Administration Commissioner की जिम्मेदारी संभालने के बाद उनका फोकस खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर दिखाई दे रहा है।
FDA की टीमों ने होटल, रेस्टोरेंट, खाद्य निर्माता, दुकानदार, गोदाम और अन्य खाद्य प्रतिष्ठानों में निरीक्षण और कार्रवाई तेज की है।
खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, स्वच्छता, लाइसेंस और खाद्य सुरक्षा नियमों के पालन की जांच की जा रही है। अस्वच्छ किचन, खराब या एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर नोटिस, जब्ती और लाइसेंस संबंधी कार्रवाई की जा रही है।
इस अभियान का दायरा पारंपरिक बाजारों से आगे बढ़कर तेजी से बदलते क्विक-कॉमर्स और ऑनलाइन खाद्य सप्लाई नेटवर्क तक भी पहुंचता दिखाई दे रहा है।
छोटे कारोबारियों के साथ बड़े नाम भी जांच के दायरे में
मुंढे के मौजूदा अभियान की एक खास बात यह है कि खाद्य सुरक्षा की जांच को केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित रखने के बजाय बड़े प्रतिष्ठानों और ब्रांड्स को भी नियामकीय दायरे में लाया जा रहा है।
FDA की कार्रवाई का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाले खाद्य पदार्थ निर्धारित सुरक्षा मानकों पर खरे उतरें।
हाल के मामलों में खाद्य नियमों के उल्लंघन को लेकर नोटिस और अन्य नियामकीय कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं। वहीं कुछ चर्चित चेहरों को ऐसे पान मसाला विज्ञापनों के संबंध में नोटिस दिए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई, जिनके उत्पादों को लेकर महाराष्ट्र में प्रतिबंध और खाद्य नियमों से जुड़े सवाल उठे हैं।
इससे यह संदेश देने की कोशिश दिखाई देती है कि खाद्य सुरक्षा के मामले में नियामकीय कार्रवाई प्रतिष्ठान के आकार या पहचान के आधार पर अलग नहीं होनी चाहिए।
हजारों निरीक्षणों से बढ़ा अभियान का दायरा
FDA के अभियान में बड़ी संख्या में निरीक्षण किए जाने की जानकारी सामने आई है। जांच के दौरान नियमों का उल्लंघन मिलने पर संबंधित प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी करने, खाद्य नमूने लेने, संदिग्ध सामग्री जब्त करने और लाइसेंस के खिलाफ कार्रवाई जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।
खाद्य सुरक्षा के लिहाज से यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मिलावट या अस्वच्छ खाद्य पदार्थों का सीधा असर आम उपभोक्ता के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
हालांकि किसी भी नियामकीय कार्रवाई का प्रभाव तभी लंबे समय तक रहेगा, जब निरीक्षण और छापों के साथ-साथ कारोबारियों को नियमों के पालन के लिए स्पष्ट व्यवस्था और नियमित निगरानी भी उपलब्ध हो।
आलोचना भी, समर्थन भी
तुकाराम मुंढे की कार्यशैली को लेकर हमेशा एक जैसी राय नहीं रही है। उनके कई फैसलों को लेकर व्यापारिक संगठनों और राजनीतिक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं।
दूसरी ओर, सख्त कार्रवाई के समर्थकों का तर्क है कि यदि कोई कारोबारी नियमों का उल्लंघन कर रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई जरूरी है। विशेषकर खाद्य सुरक्षा के मामले में आम उपभोक्ता के हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
यही वजह है कि मुंढे की कार्यशैली को लेकर राय भले ही अलग-अलग हो, लेकिन उनके फैसले अक्सर सार्वजनिक बहस का विषय बन जाते हैं।
'मुंढे मॉडल' की असली पहचान क्या?
तुकाराम मुंढे के करीब दो दशक लंबे प्रशासनिक करियर को देखें तो उनकी कार्यशैली में कुछ बातें बार-बार दिखाई देती हैं।
फील्ड में जाना, अधिकारियों की जवाबदेही तय करना, नियमों का पालन कराना और व्यवस्था में मौजूद खामियों पर सीधे कार्रवाई करना उनकी प्रशासनिक पहचान का अहम हिस्सा माना जाता है।
उनकी शैली पारंपरिक नौकरशाही के उस तरीके से अलग दिखाई देती है, जिसमें अधिकारी अक्सर फाइल और कार्यालय तक सीमित रहते हैं। मुंढे का जोर मौके पर जाकर स्थिति देखने और कार्रवाई को जमीन पर लागू कराने पर रहा है।
सख्ती के साथ निष्पक्षता की चुनौती
हालांकि किसी भी प्रशासनिक अभियान की सफलता सिर्फ कार्रवाई की संख्या से तय नहीं होती। असली चुनौती यह होती है कि कार्रवाई निष्पक्ष, पारदर्शी और नियम आधारित हो और उसका असर लंबे समय तक दिखाई दे।
FDA Commissioner के रूप में मुंढे के सामने भी यही चुनौती है। खाद्य प्रतिष्ठानों पर छापे और निरीक्षण अभियान को स्थायी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में बदलना आसान काम नहीं है।
इसके लिए खाद्य कारोबारियों में नियमों के प्रति जागरूकता, नियमित निरीक्षण, आधुनिक जांच सुविधाएं और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई जरूरी होगी।
अगर अभियान व्यवस्था में बदला तो बड़ा असर
महाराष्ट्र देश के सबसे बड़े और व्यस्त बाजारों में शामिल है। यहां लाखों लोग रोजाना होटल, रेस्टोरेंट, स्ट्रीट फूड, पैकेज्ड फूड और ऑनलाइन डिलीवरी के जरिए खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने का सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं को मिल सकता है।
अगर मौजूदा अभियान केवल छापों और नोटिस तक सीमित न रहकर स्थायी अनुपालन, बेहतर निगरानी और खाद्य गुणवत्ता में सुधार की व्यवस्था में बदलता है, तो इसका असर बड़े स्तर पर दिखाई दे सकता है।
कुर्सी बदली, लेकिन कार्यशैली नहीं
तुकाराम मुंढे के करियर की सबसे खास बात यही रही है कि अलग-अलग पदों और विभागों में जिम्मेदारियां बदलने के बावजूद उनकी प्रशासनिक शैली की चर्चा लगातार होती रही।
चाहे पानी और स्थानीय प्रशासन का मामला हो, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था हो या अब खाद्य सुरक्षा—उनकी पहचान एक ऐसे अधिकारी के तौर पर बनी है जो नियमों को लागू कराने और व्यवस्था की जवाबदेही तय करने पर जोर देता है।
उनकी कार्यशैली से हर कोई सहमत हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि तुकाराम मुंढे उन अधिकारियों में हैं जिनकी पहचान सिर्फ उनकी कुर्सी से नहीं, बल्कि उनके फैसलों और काम करने के तरीके से बनी है।
अब महाराष्ट्र FDA Commissioner के रूप में उनका सबसे बड़ा इम्तिहान यही होगा कि सख्त कार्रवाई को किस तरह ऐसी स्थायी व्यवस्था में बदला जाता है, जिसमें खाद्य कारोबारियों के लिए नियम स्पष्ट हों और उपभोक्ताओं को सुरक्षित व गुणवत्तापूर्ण खाद्य सामग्री मिल सके।
City Today | विशेष रिपोर्ट
news desk MPcg