जीएसटी ट्रिब्यूनल में हिंदी नामंजूर, सिर्फ अंग्रेजी चलेगी जिससे आम व्यापारी परेशान
जीएसटी ट्रिब्यूनल ने हिंदी को अमान्य कर दिया है और अब केवल अंग्रेजी में दस्तावेज स्वीकार किए जाएंगे। इस फैसले से व्यापारी समुदाय में असंतोष फैल गया है और न्यायिक प्रक्रिया को महंगा और जटिल बनाने का आरोप लगाया जा रहा है।
जीएसटी ट्रिब्यूनल ने एक विवादास्पद निर्णय में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को कार्यवाही में मान्यता देने से इनकार कर दिया है, जिसके तहत केवल अंग्रेजी को ही आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया जाएगा। इस फैसले से देशभर के छोटे और मझोले व्यापारियों में रोष फैल गया है, जो मुख्य रूप से हिंदी या अपनी मातृभाषा में कारोबार करते हैं।
कई व्यापारी संगठनों ने इस निर्णय को "अनुचित" और "भेदभावपूर्ण" करार देते हुए कहा कि अंग्रेजी में कानूनी कार्यवाही समझना और उसका पालन करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण है। दिल्ली के एक व्यापारी, रमेश कुमार ने कहा, "हमारे लिए जीएसटी नियम पहले ही जटिल हैं, और अब अंग्रेजी की बाध्यता ने हमारी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।"
विशेषज्ञों का कहना है कि इस कदम से ग्रामीण और छोटे शहरों के व्यापारियों को विशेष रूप से नुकसान होगा, जो अंग्रेजी में पारंगत नहीं हैं। कुछ वकीलों ने सुझाव दिया है कि ट्रिब्यूनल को कम से कम अनुवाद सेवाएं प्रदान करनी चाहिए।
सरकार ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन व्यापारी संगठन इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन और कानूनी कार्रवाई की योजना बना रहे हैं।
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