शेखपुरा की सड़कों पर मौत का कहर 5 महीने में 30 लोगों की जान गई, फिर भी नहीं मिला एक भी ब्लैक स्पॉट

शेखपुरा की सड़कों पर मौत का कहर 5 महीने में 30 लोगों की जान गई, फिर भी नहीं मिला एक भी ब्लैक स्पॉट

बिहार के शेखपुरा जिले में सड़क हादसे लगातार लोगों की जान ले रहे हैं। चालू वर्ष 2026 के पहले पांच महीनों में जिले में 32 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 30 लोगों की मौत हो चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि जिले में औसतन हर महीने छह लोगों की जान सड़क हादसों में जा रही है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि परिवहन विभाग के रिकॉर्ड में जिले में एक भी ब्लैक स्पॉट दर्ज नहीं है।

जिला सड़क सुरक्षा समिति की हाल ही में हुई बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार जनवरी में 6, फरवरी में 7, मार्च में 4, अप्रैल में 9 और मई में 4 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई। पिछले वर्ष 2025 में जिले में 81 सड़क हादसों में 70 लोगों की जान गई थी।

हालांकि विभागीय रिकॉर्ड में कोई ब्लैक स्पॉट नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर ऐसे करीब एक दर्जन स्थान चिन्हित किए गए हैं जहां बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं। इनमें से 11 स्थान बरबीघा से चेवाड़ा तक 26 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग-333ए पर स्थित हैं। इसके अलावा शेखपुरा-कुसुंभा सड़क पर भी एक खतरनाक स्थान चिन्हित किया गया है।

दुर्घटना संभावित स्थानों में एकसारी बीघा, चेवाड़ा चौक, एकाढ़ा मोड़, अंदौली मोड़, बसंत, चकंदरा मोड़, शेखपुरा तीनमुहानी, टाटी पुल और बरबीघा का श्रीकृष्ण चौक प्रमुख हैं। इन स्थानों पर हादसों को रोकने के लिए गति अवरोधक और अन्य सुरक्षा उपाय भी किए गए हैं, लेकिन दुर्घटनाओं का सिलसिला थम नहीं रहा।

परिवहन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ब्लैक स्पॉट घोषित करने के लिए तय मानकों को पूरा होना जरूरी है। नियमों के अनुसार शहरी क्षेत्र में 200 मीटर, शहर से सटे क्षेत्र में 400 मीटर और ग्रामीण क्षेत्र में 600 मीटर के दायरे में लगातार सड़क हादसे होने पर ही उस स्थान को ब्लैक स्पॉट माना जाता है। विभाग का दावा है कि जिले का कोई भी स्थान इन मानकों पर खरा नहीं उतरता।

हालांकि लगातार हो रही मौतों ने सड़क सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि तकनीकी मानकों से अलग हटकर जमीनी हकीकत को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, ताकि समय रहते प्रभावी कदम उठाकर लोगों की जान बचाई जा सके।

सवाल यह है कि जब पांच महीनों में 30 लोगों की जान जा चुकी है और कई स्थानों पर बार-बार हादसे हो रहे हैं, तो क्या केवल मानकों की बाध्यता के कारण उन्हें ब्लैक स्पॉट घोषित नहीं किया जाना चाहिए? यह मुद्दा अब सड़क सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।