रांची रथ मेला 2026: आस्था, आदिवासी संस्कृति और आधुनिक मनोरंजन का भव्य संगम, ₹35 हजार का तोता से लेकर ₹99 की साड़ी तक बना आकर्षण
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के साथ शुरू हुआ रांची का 10 दिवसीय ऐतिहासिक रथ मेला इन दिनों पूरे झारखंड ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। रथ यात्रा के धार्मिक महत्व के साथ यह मेला राज्य की लोक संस्कृति, आदिवासी परंपराओं, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यापार, स्वादिष्ट व्यंजनों और आधुनिक मनोरंजन का अनूठा संगम प्रस्तुत कर रहा है। हर दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन करने पहुंच रहे हैं, जबकि परिवार और युवा मेले में खरीदारी, झूलों और सांस्कृतिक गतिविधियों का आनंद ले रहे हैं।
आस्था के साथ संस्कृति का उत्सव
रांची रथ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव भी है। मेले में आने वाले श्रद्धालु पहले भगवान जगन्नाथ के रथ का दर्शन और पूजा-अर्चना करते हैं, इसके बाद पूरा परिवार मेले की रंगीन दुनिया में घूमता है। पारंपरिक लोक संस्कृति और आधुनिक मनोरंजन का यह संतुलन रांची रथ मेले को देश के प्रमुख धार्मिक मेलों में अलग पहचान दिलाता है।
मेले के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और ग्रामीण जीवन की झलक भी देखने को मिल रही है। यही वजह है कि यह आयोजन हर आयु वर्ग के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
360 डिग्री झूले से लेकर 'मौत का कुआं' तक, बच्चों और युवाओं की पहली पसंद
इस बार मेले में मनोरंजन के साधनों का दायरा पहले से अधिक बड़ा दिखाई दे रहा है। बच्चों के लिए ट्रैंपोलीन, जंपिंग जोन, मिनी ट्रेन, इलेक्ट्रॉनिक झूले और छोटे राइड्स लगाए गए हैं, जबकि युवाओं में 360 डिग्री झूला और विशाल राइड्स सबसे अधिक लोकप्रिय हैं।
इसके अलावा 'मौत का कुआं' देखने के लिए भी लोगों की लंबी कतारें लग रही हैं। शाम होते ही इन झूलों और राइड्स के आसपास भारी भीड़ देखने को मिलती है। रंग-बिरंगी रोशनी और तेज संगीत पूरे मेले के माहौल को उत्सव में बदल देते हैं।
₹35 हजार तक का तोता बना चर्चा का विषय
इस वर्ष मेले का सबसे चर्चित आकर्षण पक्षियों और पालतू जानवरों की दुकानें बनी हुई हैं। यहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
व्यापारियों के अनुसार—
बड़ा तोता ₹3,000 से ₹35,000 तक में उपलब्ध है।
छोटा तोता ₹500 से ₹600 प्रति पक्षी बेचा जा रहा है।
ललमुनिया पक्षी ₹250 से ₹300 प्रति जोड़ा के हिसाब से उपलब्ध है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कई देशी पक्षियों का व्यापार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत प्रतिबंधित है। इसलिए किसी भी पक्षी की खरीद से पहले उसकी प्रजाति और कानूनी स्थिति की जांच करना आवश्यक है। बिना अनुमति संरक्षित पक्षियों की खरीद-बिक्री कानूनन अपराध हो सकती है।
आदिवासी संस्कृति का सबसे बड़ा बाजार
रथ मेले की सबसे बड़ी विशेषता झारखंड की आदिवासी संस्कृति से जुड़ा विशेष बाजार है। यहां ग्रामीण जीवन और पारंपरिक कला से जुड़े अनेक उत्पाद बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।
दुकानों पर मांदर, नगाड़ा, ढोल, तीर-धनुष, फरसा, दौली, कुदाल, कुमनी (बांस से बनी मछली पकड़ने की पारंपरिक जाल), मछली पकड़ने के जाल, पैईला और अन्य कृषि एवं पारंपरिक उपकरण बड़ी संख्या में खरीदे जा रहे हैं।
इन वस्तुओं को बनाने वाले अधिकांश कारीगर झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों से आते हैं। उनके लिए यह मेला अपनी कला और उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है।
मांदर और नगाड़े की गूंज से जीवंत हुआ मेला
मेले में मंडल नायक के नगाड़ा स्टॉल के आसपास पूरे दिन लोगों की भीड़ लगी रहती है। मांदर और नगाड़े की थाप पर लोग रुककर वीडियो बना रहे हैं और सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं।
बसिया से आए एक मांदर निर्माता ने बताया कि एक गुणवत्तापूर्ण मांदर तैयार करने में लगभग 72 घंटे का समय लगता है। इस बार वे 17 मांदर लेकर रांची पहुंचे हैं।
उन्होंने बताया कि—
रांची आने-जाने में लगभग ₹4,000 का खर्च हुआ।
दुकान लगाने के लिए प्रतिदिन ₹400 किराया देना पड़ रहा है।
इसके अलावा ठेकेदार को अलग शुल्क भी देना पड़ता है।
कारीगरों का कहना है कि बढ़ती लागत के बावजूद वे अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखने के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं।
₹99 की साड़ी से लेकर हजारों रुपये के वाद्ययंत्र तक
रथ मेले में हर बजट के खरीदारों के लिए सामान उपलब्ध है। यही वजह है कि यहां बड़ी संख्या में परिवार खरीदारी करने पहुंच रहे हैं।
मेले में उपलब्ध प्रमुख वस्तुओं की कीमतें इस प्रकार हैं—
साड़ी – ₹99 से ₹150
पैर पोछना (चार पीस) – ₹100
मोर पंख – ₹10
मोर पंखा – ₹60 से ₹80
छाता – ₹100
गमछा – ₹50 से ₹100
चकला-बेलन – ₹100 से ₹150
मछली पकड़ने की बंशी – ₹100 से ₹250
मछली का जाल – ₹800 से ₹1,000
छोटा मांदर – ₹3,000
बड़ा मांदर – ₹4,000
नगाड़ा – ₹3,500
तीर-धनुष (सेट) – ₹500
फरसा – ₹450 से ₹500
दौली – ₹400
कुमनी (बांस की जाल) – ₹250 से शुरू
घरेलू सामान, कपड़े, खिलौने और पारंपरिक हस्तशिल्प की दुकानों पर पूरे दिन खरीदारों की भीड़ बनी रहती है।
महिलाओं और फूड लवर्स के लिए भी आकर्षण का केंद्र
मेले में महिलाओं के लिए रसोई के उपकरण, स्टील और प्लास्टिक के घरेलू सामान, श्रृंगार सामग्री, कपड़े, सजावटी वस्तुएं और बच्चों के खिलौनों की बड़ी संख्या में दुकानें लगाई गई हैं।
वहीं खानपान के शौकीनों के लिए चाउमीन, गोलगप्पे, चाट, जलेबी, मिठाइयां, स्थानीय व्यंजन, स्नैक्स और पेय पदार्थों के स्टॉल आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। शाम के समय इन स्टॉलों पर सबसे अधिक भीड़ देखने को मिल रही है।
मौर पूजा में उमड़ रही श्रद्धा
रथ मेले के दौरान आयोजित होने वाली मौर पूजा भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा कर मौर स्थापित कर रहे हैं। मालाकार श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना करवा रहे हैं और श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक दक्षिणा अर्पित कर रहे हैं। मेले के विभिन्न स्थानों पर मौर पूजा का आयोजन पूरे धार्मिक उत्साह के साथ किया जा रहा है।
बढ़ती लागत से दुकानदारों की चिंता भी बढ़ी
मेले में जहां एक ओर ग्राहकों की अच्छी भीड़ दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर दुकानदार बढ़ती लागत से परेशान हैं। कई व्यापारियों का कहना है कि हर साल दुकान लगाने का खर्च बढ़ता जा रहा है।
मिठाई व्यापारियों के अनुसार अधिकांश मिठाइयां लगभग ₹100 प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही हैं, लेकिन दुकान लगाने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इस वर्ष 25 फीट दुकान के लिए लगभग ₹77 हजार तक शुल्क देना पड़ा, जबकि पिछले वर्ष यही शुल्क करीब ₹75 हजार था। व्यापारियों का कहना है कि किराया, बिजली, परिवहन और अन्य शुल्क बढ़ने से मुनाफा लगातार घट रहा है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिल रहा बड़ा सहारा
रथ मेला धार्मिक महत्व के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है। हजारों छोटे व्यापारी, हस्तशिल्प कलाकार, आदिवासी कारीगर, खिलौना विक्रेता, खाद्य व्यवसायी और ग्रामीण उद्यमी इस मेले के माध्यम से अपनी आजीविका कमाते हैं। बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों से स्थानीय व्यापार को भी अच्छा लाभ मिलता है।
तथ्य जांच (Fact Check)
इस रिपोर्ट में उल्लिखित वस्तुओं की कीमतें, व्यापारियों के बयान और मेले के आकर्षण स्थानीय व्यापारियों एवं आयोजन स्थल पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित हैं। ₹35 हजार तक के तोते की कीमत विक्रेताओं का दावा है। साथ ही, भारत में कई देशी पक्षियों का व्यापार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत प्रतिबंधित है। इसलिए किसी भी पक्षी की खरीद-बिक्री से पहले उसकी कानूनी स्थिति और आवश्यक अनुमति की पुष्टि करना आवश्यक है।
news desk MPcg