Jagannath Rath Yatra 2026: अहमदाबाद में हाथियों के पैरों में बांधी गई जंजीरें, पुरी में सोने की झाड़ू से हुई रथों की सफाई; लाखों श्रद्धालुओं ने खींचे भगवान के रथ

Jagannath Rath Yatra 2026: अहमदाबाद में हाथियों के पैरों में बांधी गई जंजीरें, पुरी में सोने की झाड़ू से हुई रथों की सफाई; लाखों श्रद्धालुओं ने खींचे भगवान के रथ

देशभर में भगवान जगन्नाथ की भक्ति और आस्था का महापर्व जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 धूमधाम से मनाया जा रहा है। ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से लेकर गुजरात के अहमदाबाद तक श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। पुरी में विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को परंपरागत अनुष्ठानों के बाद तीन भव्य रथों पर विराजमान कराया गया, वहीं अहमदाबाद में सुरक्षा के मद्देनजर इस बार हाथियों को विशेष निगरानी के साथ यात्रा में शामिल किया गया।

अहमदाबाद रथ यात्रा में पिछले साल हाथियों के बेकाबू होने की घटना के बाद प्रशासन ने इस बार अतिरिक्त सावधानी बरती। हाथियों के पैरों को जंजीरों से बांधकर नियंत्रित तरीके से यात्रा में शामिल किया गया। वहीं पुरी में गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने परंपरा के अनुसार सोने की झाड़ू से रथों की सफाई कर 'छेरा पहरा' रस्म निभाई।

अहमदाबाद रथ यात्रा: हाथियों के पैरों में जंजीर, कैमरों से निगरानी

गुजरात के अहमदाबाद में भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथ यात्रा सुबह मंगला आरती के साथ शुरू हुई। जमालपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर में तड़के करीब 4 बजे विशेष पूजा-अर्चना की गई।

इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अपने परिवार के साथ मंदिर पहुंचे और मंगला आरती में शामिल हुए।

इसके बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने भगवान के रथ के आगे सोने की झाड़ू लगाकर यात्रा को रवाना किया।

पिछले साल हाथियों के बेकाबू होने के बाद बदली व्यवस्था

अहमदाबाद रथ यात्रा में हर साल सजे-धजे हाथी आकर्षण का केंद्र रहते हैं। लेकिन पिछले वर्ष यात्रा के दौरान तीन हाथी अचानक बेकाबू हो गए थे।

तेज आवाज और भीड़ के कारण हाथियों के घबराने की घटना के बाद खड़िया क्षेत्र में अफरा-तफरी की स्थिति बन गई थी। इस दौरान कुछ लोग घायल भी हुए थे।

इसी घटना को देखते हुए इस बार प्रशासन ने कई बदलाव किए—

हाथियों के पैरों को नियंत्रित करने के लिए जंजीर लगाई गई।
हर हाथी पर निगरानी के लिए कैमरे लगाए गए।
संवेदनशील इलाकों में लोगों को सड़क से हटाया गया।
हाथियों के आसपास सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई।
यात्रा मार्ग पर अतिरिक्त निगरानी रखी गई।
अहमदाबाद में 38 से ज्यादा ट्रकों में निकलीं झांकियां

अहमदाबाद रथ यात्रा में इस बार सामाजिक संदेश देने वाली कई झांकियां शामिल की गईं।

इनमें प्रमुख रूप से—

ईरान-अमेरिका तनाव और विश्व शांति का संदेश
अंगदान महादान अभियान
स्वच्छता अभियान
भारतीय क्रिकेट टीम से जुड़ी झांकी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात विकास कार्यों पर आधारित झांकी

शामिल रहीं।

हजारों श्रद्धालुओं ने सड़क किनारे खड़े होकर भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए।

पुरी में बारिश के बीच उमड़ा आस्था का सैलाब

ओडिशा के पुरी में विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के लिए देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचे। बारिश के बावजूद भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखाई दी।

सुबह से ही पुरी का ग्रैंड रोड (बड़ा डांडा) श्रद्धालुओं से भर गया। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन के लिए लोग घंटों इंतजार करते नजर आए।

रथ यात्रा से पहले तीनों रथों—

भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष
भगवान बलभद्र का तालध्वज
देवी सुभद्रा का दर्पदलन

को मंदिर के सिंहद्वार के सामने स्थापित किया गया।

सोने की झाड़ू से हुई रथों की सफाई, निभाई गई छेरा पहरा रस्म

पुरी रथ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान 'छेरा पहरा' है।

इस परंपरा में पुरी के गजपति महाराजा भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक के रूप में तीनों रथों की सोने की झाड़ू से सफाई करते हैं।

इस बार भी गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने—

सोने की झाड़ू से रथों की सफाई की।
चंदन मिश्रित जल का छिड़काव किया।
भगवान की सेवा की परंपरा निभाई।

धार्मिक मान्यता है कि यह रस्म संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं।

तीनों रथों की अपनी अलग पहचान

पुरी रथ यात्रा में हर साल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के लिए नए रथ तैयार किए जाते हैं।

नंदीघोष रथ – भगवान जगन्नाथ
लाल और पीले रंग का रथ
16 पहिए
सबसे बड़ा रथ
इसमें 832 लकड़ी के हिस्सों का उपयोग होता है
तालध्वज रथ – भगवान बलभद्र
लाल और हरे रंग का रथ
14 पहिए
763 लकड़ी के हिस्सों से निर्माण
दर्पदलन रथ – देवी सुभद्रा
लाल और काले रंग का रथ
12 पहिए
593 लकड़ी के हिस्सों से तैयार

इन रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से शुरू होता है और विशेष कारीगरों द्वारा पारंपरिक तरीके से किया जाता है।

रथ यात्रा में पहले कौन निकलता है?

धार्मिक परंपरा के अनुसार रथ यात्रा में एक विशेष क्रम होता है।

सबसे पहले—

भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ
देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ
भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ

निकलता है।

मान्यता है कि बड़े भाई बलभद्र मार्ग दिखाते हैं, उनके पीछे बहन सुभद्रा चलती हैं और अंत में भगवान जगन्नाथ भक्तों को दर्शन देते हुए आगे बढ़ते हैं।

पुरी में सुरक्षा के कड़े इंतजाम

लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए ओडिशा प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए।

व्यवस्था में शामिल हैं—

करीब 12 हजार पुलिस और सुरक्षा जवान
473 CCTV कैमरे
AI आधारित निगरानी व्यवस्था
ड्रोन कैमरे
8 अस्थायी अस्पताल
1700 बायो टॉयलेट
65 LED स्क्रीन
आपातकालीन चिकित्सा टीम

भीड़ नियंत्रण के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को विशेष जिम्मेदारी दी गई।

रेलवे ने चलाईं स्पेशल ट्रेनें

रथ यात्रा में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रेलवे ने विशेष इंतजाम किए।

300 से अधिक स्पेशल ट्रेनें चलाई गईं।
पुरी रेलवे स्टेशन पर अतिरिक्त व्यवस्था की गई।
यात्रियों के ठहरने और भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष इंतजाम किए गए।
19 जुलाई को खुलेगा जगन्नाथ मंदिर का रत्न भंडार

रथ यात्रा के दौरान जगन्नाथ मंदिर का ऐतिहासिक रत्न भंडार 19 जुलाई को एक दिन के लिए खोला जाएगा।

इस दौरान—

भगवान के आभूषणों की जांच
सोने-चांदी की वस्तुओं की गिनती
डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने

का काम किया जाएगा।

1100 साल पुरानी है पुरी रथ यात्रा की परंपरा

पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की परंपरा करीब 1100 वर्ष पुरानी मानी जाती है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ वर्ष में एक बार मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं और गुंडिचा मंदिर जाते हैं।

गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। यहां भगवान नौ दिनों तक रहते हैं और फिर बहुदा यात्रा के माध्यम से वापस श्री मंदिर लौटते हैं।

निष्कर्ष

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 में जहां पुरी में परंपरा, आस्था और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिला, वहीं अहमदाबाद में सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक सतर्कता चर्चा का विषय रही। हाथियों की सुरक्षा से लेकर लाखों श्रद्धालुओं की व्यवस्था तक प्रशासन ने कई विशेष कदम उठाए। सदियों पुरानी यह यात्रा आज भी भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है।