46 साल बाद इतिहास दोहराने की तैयारी: ISRO के लॉन्चपैड से उड़ान भरेगा स्काईरूट का विक्रम-1, भारत के निजी अंतरिक्ष युग की सबसे बड़ी छलांग
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में 18 जुलाई की तारीख एक बार फिर सुनहरे अक्षरों में दर्ज होने जा रही है। वर्ष 1980 में इसी दिन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने SLV-3 के जरिए देश का पहला स्वदेशी उपग्रह रोहिणी RS-1 सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित कर भारत को उपग्रह प्रक्षेपण करने वाले चुनिंदा देशों की सूची में शामिल किया था। अब ठीक 46 वर्ष बाद, उसी ऐतिहासिक लॉन्च परिसर से भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट 'विक्रम-1' उड़ान भरने के लिए तैयार है।
हैदराबाद स्थित निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) का यह मिशन केवल एक रॉकेट लॉन्च नहीं, बल्कि भारत के तेजी से उभरते निजी अंतरिक्ष उद्योग की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है। यदि यह मिशन सफल रहता है, तो भारत वैश्विक निजी लॉन्च सेवाओं के बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाएगा।
'आगमन' मिशन से शुरू होगा नया अंतरिक्ष अध्याय
स्काईरूट ने अपनी पहली ऑर्बिटल टेस्ट फ्लाइट को 'आगमन (Agniban Mission/Agaman)' नाम दिया है। यह मिशन पूरी तरह तकनीकी प्रदर्शन (Technology Demonstration Mission) पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य रॉकेट के सभी प्रमुख सिस्टम, प्रोपल्शन, नेविगेशन, एवियोनिक्स, स्टेज सेपरेशन और फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम का वास्तविक उड़ान के दौरान परीक्षण करना है।
इस मिशन का लक्ष्य लगभग 450 किलोमीटर ऊंची लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) तक पहुंचना है। पूरी उड़ान लगभग 16 मिनट तक चलने की उम्मीद है। इस दौरान एकत्र होने वाला फ्लाइट डेटा भविष्य के व्यावसायिक मिशनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
क्यों ऐतिहासिक है 18 जुलाई?
18 जुलाई 1980 को ISRO ने SLV-3E2 रॉकेट के माध्यम से रोहिणी RS-1 उपग्रह को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया था। यह भारत की पहली पूर्ण स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च सफलता थी। इस उपलब्धि के बाद भारत दुनिया का छठा देश बना जिसने अपनी तकनीक से उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया।
दिलचस्प बात यह है कि SLV-3 और विक्रम-1 दोनों की ऊंचाई लगभग 22 मीटर है। दोनों मिशनों के बीच 46 वर्षों का अंतर जरूर है, लेकिन दोनों ही भारतीय अंतरिक्ष इतिहास में नए युग की शुरुआत का प्रतीक हैं। जहां SLV-3 ने सरकारी अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव मजबूत की थी, वहीं विक्रम-1 निजी अंतरिक्ष उद्योग के नए दौर का प्रतिनिधित्व करेगा।
भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट
अब तक भारत में निजी कंपनियां रॉकेट के विभिन्न हिस्सों का निर्माण करती रही हैं, लेकिन विक्रम-1 पहला ऐसा पूर्ण विकसित निजी ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है जिसे एक भारतीय निजी कंपनी ने डिजाइन, विकसित और लॉन्च के लिए तैयार किया है।
रॉकेट की प्रमुख विशेषताएं:
ऊंचाई लगभग 22 मीटर
मल्टी-स्टेज लॉन्च व्हीकल
पूरी तरह कार्बन-कंपोजिट संरचना
हाई-थ्रस्ट सॉलिड फ्यूल बूस्टर
3D-प्रिंटेड इंजन तकनीक
इन-हाउस विकसित प्रोपल्शन सिस्टम
लगभग 350 किलोग्राम तक पेलोड को लो-अर्थ ऑर्बिट में स्थापित करने की क्षमता
इन तकनीकों का उद्देश्य लॉन्च लागत कम करना, निर्माण समय घटाना और छोटे उपग्रहों के लिए तेज व किफायती लॉन्च सेवाएं उपलब्ध कराना है।
लॉन्च से पहले पूरी हुई सभी तैयारियां
स्काईरूट और ISRO के अधिकारियों के अनुसार विक्रम-1 को लॉन्च पैड पर स्थापित कर दिया गया है। अंतिम इंटीग्रेटेड सिस्टम जांच, ग्राउंड स्टेशन, टेलीमेट्री नेटवर्क, ट्रैकिंग रडार और कमांड सिस्टम का परीक्षण पूरा हो चुका है।
लॉन्च से पहले भारतीय अंतरिक्ष एजेंसियों ने एयरस्पेस और समुद्री क्षेत्रों के लिए आवश्यक NOTAM (Notice to Air Missions) और समुद्री चेतावनी भी जारी कर दी है ताकि रॉकेट के संभावित उड़ान मार्ग और स्टेज गिरने वाले क्षेत्रों में सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
प्रधानमंत्री मोदी ने दी शुभकामनाएं
लॉन्च से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्काईरूट एयरोस्पेस की पूरी टीम को शुभकामनाएं देते हुए इसे भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक अवसर बताया। उन्होंने कहा कि निजी कंपनियों की भागीदारी भारत के स्पेस सेक्टर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
स्काईरूट के CEO ने बताया ऐतिहासिक क्षण
स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक और CEO पवन कुमार चंदाना ने कहा कि पहली बार किसी निजी भारतीय कंपनी का ऑर्बिटल रॉकेट ISRO के लॉन्च पैड पर खड़ा है। उनके अनुसार यह उपलब्धि केवल कंपनी की नहीं बल्कि पूरे भारतीय निजी स्पेस इकोसिस्टम की सफलता है।
उन्होंने कहा कि विक्रम-1 भविष्य के कई व्यावसायिक लॉन्च मिशनों का आधार बनेगा और भारत को वैश्विक लॉन्च मार्केट में प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
IN-SPACe सुधारों का बड़ा परिणाम
विशेषज्ञों का मानना है कि विक्रम-1 की उड़ान भारत सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र में किए गए सुधारों का प्रत्यक्ष परिणाम है। वर्ष 2020 के बाद निजी कंपनियों को ISRO के इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉन्च सुविधाओं तक पहुंच देने, IN-SPACe की स्थापना तथा निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलने से भारतीय स्पेस स्टार्टअप तेजी से आगे बढ़े हैं।
आज भारत में 200 से अधिक स्पेस स्टार्टअप सक्रिय हैं और स्काईरूट उनमें सबसे अग्रणी कंपनियों में शामिल है।
वैश्विक स्पेस मार्केट में भारत की नई दावेदारी
दुनिया में छोटे उपग्रहों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। संचार, इंटरनेट, मौसम, रक्षा, कृषि, नेविगेशन और पृथ्वी अवलोकन जैसे क्षेत्रों में हजारों नए उपग्रह लॉन्च होने हैं। ऐसे में कम लागत वाले लॉन्च वाहनों की मांग लगातार बढ़ रही है।
यदि विक्रम-1 सफल होता है तो भारत अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों की निजी लॉन्च कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की दिशा में मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है। इससे विदेशी ग्राहकों को आकर्षित करने, अंतरराष्ट्रीय लॉन्च अनुबंध प्राप्त करने और भारतीय स्पेस अर्थव्यवस्था को कई गुना बढ़ाने में मदद मिलेगी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मिशन?
विक्रम-1 की पहली उड़ान केवल एक परीक्षण मिशन नहीं है। इसकी सफलता यह तय करेगी कि भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग वैश्विक स्तर पर कितनी तेजी से आगे बढ़ सकता है। 1980 में SLV-3 ने भारत को अंतरिक्ष महाशक्तियों की सूची में पहुंचाया था, वहीं 2026 में विक्रम-1 भारत को निजी स्पेस लॉन्च सेवाओं के नए युग में प्रवेश दिलाने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक समुदाय, उद्योग जगत और पूरी दुनिया की नजरें आज श्रीहरिकोटा से होने वाले इस ऐतिहासिक प्रक्षेपण पर टिकी हुई हैं।
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