मेकेदातु विवाद: ट्रिब्यूनल प्रस्ताव पर किसानों का विरोध तेज, तमिलनाडु में राजनीतिक तनाव बढ़ा
कावेरी जल विवाद से जुड़े मेकेदातु बांध मुद्दे पर तमिलनाडु में विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। राज्य विधानसभा द्वारा 19 जून 2026 को मेकेदातु बांध के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद अब इसमें शामिल नए ट्रिब्यूनल गठन के सुझाव को लेकर डेल्टा किसानों और कई संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है।
किसानों का कहना है कि मौजूदा कावेरी जल विवाद निपटान व्यवस्था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का 2018 का फैसला और कावेरी वाटर मैनेजमेंट अथॉरिटी (CWMA) शामिल है, पहले से ही लागू है और नया ट्रिब्यूनल राज्य के कानूनी अधिकारों को कमजोर कर सकता है।
विधानसभा प्रस्ताव के बाद बढ़ा विवाद
तमिलनाडु विधानसभा ने कर्नाटक के मेकेदातु बांध प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रस्ताव पारित करते हुए केंद्र सरकार से मंजूरी न देने की मांग की थी।
इसी प्रस्ताव में कावेरी विवाद के समाधान के लिए एक अलग ट्रिब्यूनल बनाने का सुझाव भी शामिल किया गया, जिसके बाद किसानों और विपक्षी दलों में असंतोष बढ़ गया।
किसान संगठनों का कहना है कि पहले से मौजूद कावेरी ट्रिब्यूनल अवार्ड (2007) और सुप्रीम कोर्ट का 2018 का अंतिम निर्णय जल बंटवारे को लेकर स्पष्ट ढांचा प्रदान करते हैं।
किसानों का विरोध और प्रमुख मांगें
तंजावुर और नागपट्टिनम डेल्टा क्षेत्रों में सक्रिय किसान संगठनों—जैसे तमिलनाडु विवसाइगल संघम और कावेरी अधिकार पुनर्प्राप्ति समिति—ने प्रस्ताव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
किसानों की प्रमुख आपत्तियाँ:
नया ट्रिब्यूनल “अनावश्यक और हानिकारक” बताया गया
मौजूदा कावेरी वाटर मैनेजमेंट सिस्टम को कमजोर करने का डर
डेल्टा सिंचाई और पेयजल आपूर्ति पर खतरा
केंद्र को भेजे जाने वाले प्रस्ताव से पहले संशोधन हटाने की मांग
किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने यह प्रावधान वापस नहीं लिया तो 27 जून को प्रस्ताव की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।
जमीनी स्तर पर प्रदर्शन
नागपट्टिनम जिले के मगिली गांव के पास किसानों ने खेतों में काले झंडे दिखाकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि कावेरी डेल्टा क्षेत्र पहले से ही जल संकट का सामना कर रहा है और किसी भी नए कानूनी बदलाव से स्थिति और बिगड़ सकती है।
कावेरी बेसिन में पानी की कमी और सिंचाई संकट लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रहा है, क्योंकि तमिलनाडु में लाखों किसानों की आजीविका इसी नदी पर निर्भर है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और विधानसभा में हंगामा
इस मुद्दे पर राज्य की राजनीति भी गरमा गई है। विधानसभा में संशोधित प्रस्ताव को लेकर विपक्षी दलों—खासतौर पर एआईएडीएमके और वाम दलों—ने कड़ा विरोध जताया।
एआईएडीएमके नेता एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने आरोप लगाया कि संशोधन को नियमों के अनुसार सदन में प्रस्तुत, चर्चा और मतदान के बिना शामिल किया गया, जिससे विधायी प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ।
विरोध के बाद विपक्षी विधायकों ने सदन से वॉकआउट भी किया।
कावेरी जल विवाद की पृष्ठभूमि
कावेरी जल विवाद दशकों पुराना है, जिसमें तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच जल बंटवारे को लेकर लगातार टकराव रहा है।
1990 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कावेरी ट्रिब्यूनल का गठन हुआ
2007 में ट्रिब्यूनल ने अंतिम जल बंटवारा तय किया
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित जल आवंटन आदेश दिया
इसके बाद CWMA और CWRC की स्थापना की गई
news desk MPcg