PM मोदी से मिले सुखबीर बादल, पंजाब में फिर साथ आ सकते हैं अकाली-BJP: गठबंधन की अटकलें तेज, AAP और कांग्रेस ने साधा निशाना
विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली में मोदी-सुखबीर मुलाकात से बदले पंजाब के सियासी समीकरण; 25 साल पुराना गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों के दोबारा साथ आने की चर्चा
पंजाब की राजनीति में एक बार फिर पुराने सियासी समीकरणों की वापसी के संकेत मिलने लगे हैं। शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने शुक्रवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। दोनों नेताओं की बैठक के बाद पंजाब में अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच दोबारा गठबंधन की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब पंजाब विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने का समय बचा है। हालांकि अभी तक दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
संसद भवन में हुई मोदी-सुखबीर की मुलाकात
जानकारी के मुताबिक, सुखबीर सिंह बादल शुक्रवार सुबह दिल्ली पहुंचे और संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।
मुलाकात के बाद राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गईं कि क्या पंजाब में एक बार फिर अकाली दल और भाजपा पुराने सहयोगी के रूप में चुनाव मैदान में उतर सकते हैं।
दोनों दलों के बीच गठबंधन पहले करीब ढाई दशक तक चला था और पंजाब की राजनीति में इसे सबसे मजबूत राजनीतिक गठबंधनों में से एक माना जाता रहा है।
AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कसा तंज
मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात पर आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया के जरिए निशाना साधा।
केजरीवाल ने तंज करते हुए लिखा—
“ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे… तो क्या चंदा चोर पार्टी और बेअदबी पार्टी का गठबंधन हो रहा है?”
केजरीवाल के इस बयान में उन्होंने भाजपा और अकाली दल पर पुराने विवादों को लेकर हमला बोला।
सुखबीर बादल ने केजरीवाल को दिया जवाब
केजरीवाल के बयान पर सुखबीर सिंह बादल ने भी पलटवार किया।
उन्होंने आम आदमी पार्टी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले AAP ने पंजाब में अवैध खनन को रोकने का दावा किया था, लेकिन अब हालात इसके उलट हैं।
सुखबीर बादल ने कहा कि आम आदमी पार्टी की कई घोषणाएं और गारंटी जमीन पर पूरी नहीं हुई हैं।
कांग्रेस ने भी गठबंधन की संभावनाओं पर प्रतिक्रिया दी
पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा ने भी भाजपा-अकाली दल की संभावित नजदीकियों पर प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से अंदाजा था कि दोनों दल दोबारा साथ आ सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इससे पंजाब की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा।
कांग्रेस का कहना है कि दोनों दलों की पुरानी छवि और पिछले विवादों के कारण मतदाताओं पर इसका सीमित असर पड़ेगा।
25 साल चला था अकाली-BJP गठबंधन
पंजाब की राजनीति में अकाली दल और भाजपा का गठबंधन काफी पुराना रहा है।
दोनों दलों के बीच वर्ष 1996 में गठबंधन हुआ था, जो करीब 25 वर्षों तक चला।
इस गठबंधन ने पंजाब में तीन बार सरकार बनाई:
1997 में पहली बार गठबंधन सरकार बनी
2007 में दोबारा सत्ता में वापसी हुई
2012 में लगातार दूसरी बार सरकार बनाई
पूर्व मुख्यमंत्री और अकाली दल के दिग्गज नेता प्रकाश सिंह बादल इस गठबंधन को कई बार “नाखून और मांस” जैसा रिश्ता बताते थे।
इसका मतलब था कि दोनों पार्टियां लंबे समय तक एक-दूसरे की राजनीतिक ताकत बनी रहीं।
क्यों सफल रहा था अकाली-BJP गठबंधन?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, अकाली दल और भाजपा गठबंधन की सफलता के पीछे कई कारण थे।
1. अलग-अलग वोट बैंक पर मजबूत पकड़
अकाली दल की ग्रामीण पंजाब, किसानों और सिख समुदाय के बड़े हिस्से में मजबूत पकड़ थी।
वहीं भाजपा का आधार पंजाब के शहरी क्षेत्रों और हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत माना जाता था।
दोनों दलों के वोट बैंक अलग होने के कारण गठबंधन को चुनावों में फायदा मिलता था।
2. सीट शेयरिंग का मजबूत फॉर्मूला
गठबंधन के दौरान दोनों दलों के बीच सीटों का एक तय समीकरण था।
अकाली दल आमतौर पर ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ता था, जबकि भाजपा शहरी प्रभाव वाली सीटों पर मैदान में उतरती थी।
इस व्यवस्था से दोनों दल अपने मजबूत क्षेत्रों में चुनाव लड़ते थे और कार्यकर्ताओं का सहयोग भी मिलता था।
3. 2012 में बनाया था इतिहास
2012 का विधानसभा चुनाव अकाली-BJP गठबंधन के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है।
गठबंधन ने उस चुनाव में 68 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी।
पंजाब के राजनीतिक इतिहास में इससे पहले कोई भी पार्टी या गठबंधन लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं कर पाया था।
2020 में क्यों टूटा था गठबंधन?
अकाली दल और भाजपा का गठबंधन वर्ष 2020 में टूट गया था।
इसकी बड़ी वजह कृषि कानूनों को लेकर विवाद था।
किसान आंदोलन के दौरान अकाली दल ने भाजपा से अलग होने का फैसला लिया था। इसके बाद दोनों पार्टियों ने 2022 का विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ा।
गठबंधन टूटने का 2022 चुनाव पर असर
2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में भाजपा और अकाली दल के अलग-अलग चुनाव लड़ने का असर दोनों दलों के प्रदर्शन पर दिखाई दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार:
दोनों दलों का पारंपरिक वोट बैंक बंट गया।
आम आदमी पार्टी को इसका बड़ा फायदा मिला।
AAP ने खुद को कांग्रेस और अकाली-BJP गठबंधन के विकल्प के रूप में स्थापित किया।
कांग्रेस का भी पारंपरिक वोट प्रभावित हुआ।
2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बड़ी जीत हासिल कर पंजाब में सरकार बनाई।
अगर दोबारा गठबंधन हुआ तो क्या बदलेगा समीकरण?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भाजपा और अकाली दल आगामी विधानसभा चुनाव में साथ आते हैं तो पंजाब की राजनीति का मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है।
संभावित असर:
AAP के लिए चुनौती बढ़ सकती है
सत्ता में मौजूद आम आदमी पार्टी को दो बड़े राजनीतिक दलों के संयुक्त मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है।
कांग्रेस की रणनीति प्रभावित हो सकती है
कांग्रेस को भाजपा-अकाली गठबंधन के खिलाफ अपनी चुनावी रणनीति नए सिरे से तैयार करनी होगी।
वोट बैंक का पुनर्गठन संभव
दोनों दलों के पुराने समर्थक दोबारा एकजुट हो सकते हैं।
अभी गठबंधन पर अंतिम फैसला नहीं
हालांकि मोदी-सुखबीर मुलाकात के बाद चर्चाएं तेज हैं, लेकिन भाजपा और अकाली दल की ओर से अभी तक गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
दोनों दल आने वाले दिनों में राजनीतिक परिस्थितियों, सीटों के समीकरण और चुनावी रणनीति को देखते हुए फैसला ले सकते हैं।
पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले यह मुलाकात राज्य की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है।
news desk MPcg