आपातकाल की 51वीं बरसी: जब लोकतंत्र पर लगा था ताला, जेल की सलाखों से निकलीं आज भी प्रासंगिक सीखें

आपातकाल की 51वीं बरसी: जब लोकतंत्र पर लगा था ताला, जेल की सलाखों से निकलीं आज भी प्रासंगिक सीखें

25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह तारीख है, जिसे देश आज भी एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक झटके के रूप में याद करता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल को 51 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन उस दौर की यादें आज भी हजारों परिवारों, आंदोलनकारियों, पत्रकारों और लोकतंत्र सेनानियों के मन में ताजा हैं।

आपातकाल के दौरान देशभर में नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए, विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे जेलों में बंद किया गया, प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू हुई और सरकार की आलोचना को अपराध की तरह देखा जाने लगा। यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इस कालखंड को सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिना जाता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा

25 जून 1975 की रात लागू हुए आपातकाल के बाद देश में राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण स्थापित कर दिया गया। हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्र नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों को मीसा (MISA) और अन्य कानूनों के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

लोकतंत्र समर्थकों का मानना है कि यह केवल राजनीतिक संकट नहीं था, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी बड़ी परीक्षा थी। पांच दशक बाद भी उस दौर के प्रत्यक्षदर्शी इसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए दी गई एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखते हैं।

भूमिगत प्रेस ने बचाई लोकतंत्र की आवाज

पठानकोट के एसएमडीआरएसडी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. समरेन्द्र शर्मा उस दौर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के गुरदासपुर जिला अध्यक्ष थे। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के दौरान उन्होंने भूमिगत प्रेस के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाई।

उनके अनुसार जम्मू में साइक्लोस्टाइल मशीनों के जरिए तैयार किए गए समाचार पत्रों और पर्चों को गुप्त रूप से विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता था ताकि सरकारी सेंसरशिप के बीच जनता तक वास्तविक सूचनाएं पहुंच सकें। आपातकाल लागू होने के बाद उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और करीब 19 महीने जेल में बिताने पड़े।

डॉ. शर्मा का कहना है कि उस दौर ने उन्हें सिखाया कि स्वतंत्र पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा हैं। इन्हें दबाया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता।

जेल बनी जीवन बदलने वाली पाठशाला

पटना के जयप्रकाश महंथ ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान 13 महीने भागलपुर सेंट्रल जेल में बिताए। वे बताते हैं कि जेल उनके लिए केवल दमन का प्रतीक नहीं थी, बल्कि जीवन की दिशा बदलने वाला अनुभव साबित हुई।

जेल में रहते हुए उन्होंने अधिवक्ता बनने और समाज के कमजोर वर्गों के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया। उनका मानना है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचार और संपूर्ण क्रांति का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1970 के दशक में था।

आंदोलनकारियों को घर में दी शरण

पश्चिम बंगाल के 98 वर्षीय वरिष्ठ भाजपा नेता माखनलाल सरकार भी आपातकाल के प्रत्यक्षदर्शियों में शामिल हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कश्मीर आंदोलन में भाग लेने वाले माखनलाल सरकार ने आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी से बच रहे आंदोलनकारियों को अपने घर में शरण दी।

वे बताते हैं कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए उस समय जो भी संभव था, उन्होंने किया। उनके अनुसार आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक था, जिसने यह साबित किया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती कितनी महत्वपूर्ण है।

पूरा गांव घेरकर हुई गिरफ्तारी

लोकतंत्र सेनानी समिति उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता बृजकिशोर मिश्र उस समय लखनऊ विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई कर रहे थे। वे भी जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े हुए थे।

12 जुलाई 1975 की रात पुलिस ने उनके गांव महोई (वर्तमान कन्नौज) को घेर लिया और उन्हें हिरासत में ले लिया। ग्रामीणों द्वारा विरोध किए जाने पर पुलिस ने बल प्रयोग किया। बाद में उन्हें जिला कारागार भेजा गया और फिर केंद्रीय कारागार फतेहगढ़ स्थानांतरित कर दिया गया।

बृजकिशोर मिश्र बताते हैं कि जब उन्होंने जेल में रहते हुए अपनी विधि परीक्षा देने की अनुमति मांगी, तो उन्हें फांसी वार्ड में रख दिया गया। यह अनुभव आज भी उनके मन में गहरी छाप छोड़ता है।

“आओ, अभी तुम्हें जयप्रकाश नारायण बनाता हूं”

कानपुर के लोकतंत्र सेनानी रामदेव शुक्ल आज भी 26 नवंबर 1975 की घटना को नहीं भूल पाए हैं। डीएवी कॉलेज में सत्याग्रह के दौरान जब उन्होंने और उनके साथियों ने “लोकनायक जयप्रकाश जिंदाबाद” और “इंदिरा की तानाशाही नहीं चलेगी” जैसे नारे लगाए, तब पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया।

रामदेव शुक्ल के अनुसार एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें पकड़ते हुए कहा था, “आओ, अभी तुम्हें जयप्रकाश नारायण बनाता हूं।” इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और लगभग नौ महीने बाद रिहाई मिली।

इतिहास से मिली सीख आज भी प्रासंगिक

आपातकाल पर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन अधिकांश इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस कालखंड ने लोकतांत्रिक संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष मीडिया और नागरिक अधिकारों की अहमियत को और अधिक स्पष्ट किया।

51 वर्ष बाद भी उस दौर के गवाह मानते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति के सम्मान, स्वतंत्र मीडिया और नागरिक अधिकारों की रक्षा से मजबूत होता है।

लोकतंत्र का संदेश

आपातकाल की 51वीं बरसी केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की रक्षा, संवैधानिक मूल्यों के सम्मान और नागरिक स्वतंत्रताओं की अहमियत को समझने का भी अवसर है। इतिहास के इस अध्याय से मिली सीख यही है कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है, जब सत्ता और नागरिकों के बीच संतुलन बना रहे और असहमति को लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा माना जाए।