झारखंड राजनीति: कांग्रेस ने योगेंद्र साव का निष्कासन वापस लिया, JMM से बढ़ सकती है दूरी; राज्यसभा चुनाव के बाद महागठबंधन में बढ़ी सियासी हलचल

झारखंड राजनीति: कांग्रेस ने योगेंद्र साव का निष्कासन वापस लिया, JMM से बढ़ सकती है दूरी; राज्यसभा चुनाव के बाद महागठबंधन में बढ़ी सियासी हलचल

झारखंड की राजनीति में महागठबंधन के भीतर नई सियासी हलचल देखने को मिल रही है। कांग्रेस ने पूर्व विधायक योगेंद्र साव का निष्कासन महज तीन महीने के भीतर वापस लेकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संबंधों में खटास की चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह कदम केवल एक नेता की वापसी नहीं, बल्कि गठबंधन की आंतरिक राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत भी हो सकता है।

हालांकि कांग्रेस और झामुमो की ओर से गठबंधन टूटने जैसी कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने दोनों दलों के बीच समन्वय और राजनीतिक विश्वास को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

तीन महीने में बदला कांग्रेस का फैसला

कांग्रेस ने योगेंद्र साव को पहले पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में तीन वर्ष के लिए प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित किया था। लेकिन अब केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर उनका निष्कासन वापस ले लिया गया है।

दिलचस्प बात यह रही कि पार्टी की अनुशासन समिति ने योगेंद्र साव से लिखित माफीनामा देने को कहा था। सूत्रों के अनुसार उन्होंने माफी मांगने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश के बाद उनके निष्कासन को समाप्त कर दिया गया। इस निर्णय ने प्रदेश कांग्रेस की कार्यशैली और केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताओं को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

राज्यसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरण

कांग्रेस के भीतर यह धारणा मजबूत हुई है कि हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवार प्रणव झा को झामुमो से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।

सूत्रों के अनुसार शुरुआत में कांग्रेस प्रत्याशी के नाम को लेकर भी सहमति बनाने में समय लगा। बाद में शीर्ष स्तर पर बातचीत के बाद समर्थन तो मिला, लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि चुनाव के दौरान जीत सुनिश्चित करने के लिए अपेक्षित राजनीतिक सक्रियता दिखाई नहीं गई।

इसी घटनाक्रम को कांग्रेस के भीतर बढ़ती नाराजगी की एक बड़ी वजह माना जा रहा है।

निर्दलीय उम्मीदवार की एंट्री भी बनी चर्चा का विषय

राज्यसभा चुनाव के दौरान निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी के चुनाव मैदान में उतरने को लेकर भी कांग्रेस के कुछ नेताओं ने सवाल उठाए।

पार्टी के भीतर यह चर्चा रही कि नथवाणी ने नामांकन प्रक्रिया के दौरान मुख्यमंत्री आवास जाकर अपनी चुनावी रणनीति की जानकारी दी थी। कांग्रेस ने उनके नामांकन को चुनौती देने की भी कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी।

हालांकि इन घटनाओं को लेकर किसी भी दल ने सार्वजनिक रूप से गठबंधन पर सवाल नहीं उठाए, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे महागठबंधन के भीतर असहजता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

योगेंद्र साव और अंबा प्रसाद लगातार कर रहे थे प्रयास

पूर्व विधायक योगेंद्र साव और उनकी पुत्री, पूर्व विधायक अंबा प्रसाद, पिछले कई सप्ताह से पार्टी नेतृत्व के संपर्क में थे और निष्कासन वापस लेने की मांग कर रहे थे।

सूत्रों के अनुसार केंद्रीय नेतृत्व तक लगातार पैरवी की गई, जिसके बाद निष्कासन समाप्त करने का फैसला लिया गया। इससे यह भी संकेत मिलता है कि कांग्रेस संगठन कुछ प्रभावशाली नेताओं को दोबारा सक्रिय भूमिका में लाने की रणनीति पर काम कर रहा है।

अनुशासन समिति और केंद्रीय नेतृत्व के बीच अलग रुख

इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि प्रदेश अनुशासन समिति ने माफीनामा नहीं मिलने के कारण निष्कासन वापस लेने से इनकार कर दिया था।

इसके बावजूद केंद्रीय नेतृत्व ने अलग फैसला लेते हुए निष्कासन समाप्त करने के निर्देश जारी किए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि अंतिम निर्णय राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर लिया गया।

दूसरे नेताओं की वापसी अब भी लंबित

नगर निकाय चुनाव के दौरान पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए गए लगभग एक दर्जन नेताओं की वापसी का मामला अभी भी लंबित है।

इन नेताओं में कांग्रेस की केंद्रीय सचिव जेबा खान का नाम भी शामिल है। प्रदेश अनुशासन समिति ने इन नेताओं की वापसी की अनुशंसा कर दी है, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व से अब तक अंतिम स्वीकृति नहीं मिली है।

ऐसे में योगेंद्र साव की वापसी को विशेष राजनीतिक महत्व दिया जा रहा है।

क्या महागठबंधन में बढ़ रही है दूरी?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के हालिया फैसलों से यह संकेत जरूर मिलता है कि पार्टी अब अपने संगठनात्मक और राजनीतिक निर्णयों में पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्र रुख अपना रही है।

हालांकि अभी तक कांग्रेस और झामुमो दोनों ने सार्वजनिक रूप से गठबंधन जारी रहने की बात कही है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों दलों के रिश्तों में औपचारिक दरार आ गई है। लेकिन राज्यसभा चुनाव के बाद सामने आए घटनाक्रम ने गठबंधन के भीतर समन्वय को लेकर नई बहस जरूर शुरू कर दी है।

आगे की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है?

यदि कांग्रेस और झामुमो के बीच मतभेद बढ़ते हैं तो इसका असर आने वाले विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों की रणनीति पर पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि दोनों दल बातचीत के जरिए मतभेद दूर कर लेते हैं तो महागठबंधन पहले की तरह एकजुट भी रह सकता है।

फिलहाल सभी की नजर कांग्रेस और झामुमो नेतृत्व की आगामी बैठकों तथा राजनीतिक निर्णयों पर टिकी हुई है।

मुख्य बिंदु 
कांग्रेस ने पूर्व विधायक योगेंद्र साव का निष्कासन तीन महीने में वापस लिया।
राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और झामुमो के संबंधों को लेकर चर्चाएं तेज हुईं।
कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि राज्यसभा चुनाव में अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
अनुशासन समिति के अलग रुख के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व ने निष्कासन समाप्त किया।
अंबा प्रसाद और योगेंद्र साव लगातार पार्टी नेतृत्व के संपर्क में थे।
नगर निकाय चुनाव में निष्कासित कई अन्य नेताओं की वापसी अभी लंबित है।
महागठबंधन में औपचारिक टूट की कोई घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में बदलते समीकरणों पर चर्चा जारी है।