चंदौली में सौ साल पुरानी परंपरा: यूपी–बिहार सीमा पर ताजियों का मिलन, कर्मनाशा नदी पुल पर दिखा भाईचारे का अद्भुत दृश्य
यूपी-बिहार सीमा पर ऐतिहासिक ताजिया मिलन
चंदौली जिले में मोहर्रम के अवसर पर शुक्रवार को एक बार फिर सौ साल पुरानी परंपरा को पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया गया। उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर स्थित कर्मनाशा नदी पुल पर यूपी और बिहार के ताजियों का पारंपरिक मिलन कराया गया।
यह अनूठी परंपरा पिछले लगभग 100 वर्षों से लगातार जारी है और इसे दोनों राज्यों के बीच सामाजिक सद्भाव, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
नौबतपुर, खजुरा और सरैया के ताजियों का संगम
इस वर्ष मोहर्रम के अवसर पर उत्तर प्रदेश के नौबतपुर तथा बिहार के दुर्गावती प्रखंड के खजुरा और सरैया गांवों के ताजिए अपने-अपने चौकों से जुलूस के रूप में रवाना हुए। नौवीं मोहर्रम की रात शुरू हुआ यह जुलूस निर्धारित समय पर कर्मनाशा नदी पुल पर पहुंचा, जहां तीनों ताजियों का पारंपरिक मिलन कराया गया।
जैसे ही ताजिए आमने-सामने आए, पूरा क्षेत्र “या अली” और “या हुसैन” के नारों से गूंज उठा। अकीदतमंदों ने एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए धार्मिक आस्था और भावनात्मक जुड़ाव का प्रदर्शन किया।
सामाजिक सौहार्द और भाईचारे का संदेश
ताजियों के मिलन के दौरान दोनों राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे से गले मिलकर सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इस परंपरा को धार्मिक आस्था के साथ-साथ आपसी भाईचारे और एकता का प्रतीक बताया।
बिहार से आए श्रद्धालुओं ने नौबतपुर के ताजिए को सम्मानपूर्वक उसके चौक तक पहुंचाया, जहां स्थानीय लोगों ने उनका स्वागत किया और पारंपरिक रूप से मुंह मीठा कराकर अतिथियों का सम्मान किया।
हजरत अंजान शहीद बाबा की दरगाह पर हुआ विशेष आयोजन
दोपहर के समय तीनों ताजिए बिहार के खजुरा पड़ाव स्थित हजरत अंजान शहीद बाबा की दरगाह के पास पहुंचे। यहां पारंपरिक रूप से लकड़ी, गदका और अन्य पारंपरिक युद्धक कलाओं का प्रदर्शन किया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे।
इस दौरान युवाओं और खिलाड़ियों ने अपने कौशल का प्रदर्शन किया, जिससे माहौल और भी उत्साहपूर्ण हो गया।
अंतिम मिलन के बाद ताजियों का विसर्जन
शाम के समय तीनों ताजिए एक बार फिर कर्मनाशा नदी के समीप पहुंचे, जहां अंतिम बार उनका पारंपरिक मिलन कराया गया। इसके बाद सभी ताजिए अपने-अपने कर्बला की ओर रवाना हो गए।
पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मौजूद रही और देर शाम तक कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।
100 साल पुरानी परंपरा बनी सामाजिक एकता की मिसाल
स्थानीय लोगों के अनुसार यह परंपरा लगभग एक शताब्दी से निरंतर जारी है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के बीच सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक जुड़ाव और भाईचारे को भी मजबूत करता है।
निष्कर्ष
चंदौली का यह ताजिया मिलन कार्यक्रम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि दो राज्यों के बीच साझा संस्कृति और सद्भाव का जीवंत उदाहरण है। हर वर्ष की तरह इस बार भी यह परंपरा शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुई और लोगों के बीच एकता का संदेश देकर समाप्त हुई।
news desk MPcg