राज्यसभा में NDA की बढ़ी ताकत, दो-तिहाई बहुमत से कुछ कदम दूर; लोकसभा में अभी भी चुनौती बरकरार

राज्यसभा में NDA की बढ़ी ताकत, दो-तिहाई बहुमत से कुछ कदम दूर; लोकसभा में अभी भी चुनौती बरकरार

संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संसदीय स्थिति और मजबूत होती नजर आ रही है। राज्यसभा में नवनिर्वाचित सदस्यों के शपथ ग्रहण के बाद एनडीए उच्च सदन में दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंच गया है। हालांकि, लोकसभा में संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा हासिल करना अभी भी गठबंधन के लिए चुनौती बना हुआ है।

राज्यसभा अध्यक्ष सी.पी. राधाकृष्णन ने सोमवार को नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाई, जिसके बाद सदन में दलों की संख्या में बदलाव देखने को मिला। मौजूदा स्थिति में 245 सदस्यीय राज्यसभा में एनडीए के पास 141 सांसद हैं, जो साधारण बहुमत से काफी आगे है और दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंच चुका है।

राज्यसभा में कैसे मजबूत हुई NDA की स्थिति?

वर्तमान संख्या बल के अनुसार एनडीए के पास 141 सदस्य हैं। यदि मनोनीत और निर्दलीय सांसदों में से लगभग 10 सदस्यों का समर्थन सरकार को मिलता है, तो यह संख्या बढ़कर 151 तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, बीजू जनता दल (BJD) के पांच और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के चार सांसद कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर पहले भी केंद्र सरकार का समर्थन करते रहे हैं। इन दलों का समर्थन मिलने की स्थिति में एनडीए का आंकड़ा 160 तक पहुंच सकता है।

245 सदस्यीय राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 सदस्यों का समर्थन आवश्यक माना जाता है। ऐसे में सरकार इस लक्ष्य से केवल चार सीट दूर रह जाएगी।

बंगाल की रिक्त सीटों से मिल सकती है बढ़त

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर पश्चिम बंगाल की तीन रिक्त राज्यसभा सीटों पर भी टिकी हुई है। भविष्य में इन सीटों पर उपचुनाव होने की स्थिति में भाजपा को लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो एनडीए की संख्या 163 तक पहुंच सकती है, जो दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े 164 से केवल एक सीट कम होगी।

संविधान संशोधन विधेयकों के लिए अहम है संख्या बल

भारतीय संविधान में संशोधन से जुड़े किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ कुल सदस्य संख्या के बहुमत की आवश्यकता होती है।

सरकार भविष्य में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण, परिसीमन (Delimitation) और अन्य संवैधानिक सुधारों से जुड़े विधेयकों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि सरकार ने आगामी मानसून सत्र के लिए अभी तक ऐसे किसी विधेयक को आधिकारिक रूप से सूचीबद्ध नहीं किया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस संबंध में चर्चाएं तेज हैं।

महिला आरक्षण और परिसीमन पर जारी है राजनीतिक बहस

संसद के पिछले सत्र के दौरान महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक पर भी व्यापक चर्चा हुई थी। इस दौरान बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक ने महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्ट रोडमैप पेश करने की मांग की थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार भविष्य में इस प्रकार का कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक लाती है, तो उसे क्षेत्रीय दलों का सहयोग निर्णायक रूप से प्रभावित करेगा।

लोकसभा में अभी भी आसान नहीं है राह

जहां राज्यसभा में एनडीए की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है, वहीं लोकसभा में समीकरण अभी भी सरकार के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। वर्तमान में लोकसभा की तीन सीटें रिक्त हैं। यदि इन सभी सीटों पर भी एनडीए जीत दर्ज कर लेता है, तब भी संविधान संशोधन के लिए आवश्यक लगभग 360 सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन के आंकड़े तक पहुंचना आसान नहीं होगा।

यानी उच्च सदन की तुलना में सरकार के सामने वास्तविक चुनौती अभी भी लोकसभा में ही बनी हुई है।

क्षेत्रीय दलों की भूमिका रहेगी निर्णायक

संसदीय गणित को देखते हुए बीजू जनता दल (BJD), वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) और अन्य गैर-एनडीए तथा गैर-इंडिया गठबंधन के दल आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कई मौकों पर इन दलों ने मुद्दों के आधार पर सरकार का समर्थन किया है।

इसके अलावा, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कुछ बागी नेताओं द्वारा पार्टी के भीतर संभावित राजनीतिक बदलाव और भविष्य में राज्यसभा सदस्यों के इस्तीफों को लेकर दिए गए बयानों ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी है। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

मानसून सत्र पर रहेगी नजर

संसद का मानसून सत्र जल्द शुरू होने वाला है। ऐसे में सरकार की विधायी प्राथमिकताओं, संभावित संवैधानिक संशोधनों और दोनों सदनों में संख्या बल की राजनीति पर सभी राजनीतिक दलों की नजर रहेगी। राज्यसभा में एनडीए पहले से कहीं अधिक मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है, लेकिन किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए लोकसभा में आवश्यक समर्थन जुटाना अभी भी सरकार के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बना हुआ है।