पुणे रेप-मर्डर केस: 55 दिन में आया फैसला, 4 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के दोषी भीमराव कांबले को फांसी; वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर सुनाया गया मृत्युदंड
महाराष्ट्र के पुणे जिले के नसरापुर में चार वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के बहुचर्चित मामले में विशेष फास्ट-ट्रैक POCSO अदालत ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए 65 वर्षीय आरोपी भीमराव कांबले को मृत्युदंड की सजा सुनाई। अपराध के सामने आने से लेकर सजा सुनाए जाने तक पूरी न्यायिक प्रक्रिया महज 55 दिनों में पूरी हुई, जिसे महाराष्ट्र के हालिया वर्षों के सबसे तेज गति से निपटाए गए जघन्य आपराधिक मामलों में से एक माना जा रहा है।
विशेष न्यायाधीश एस.आर. सालुंखे की अदालत ने इससे पहले आरोपी को अपहरण, दुष्कर्म और हत्या का दोषी ठहराया था। सजा पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि उपलब्ध वैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्य आरोपी के अपराध को संदेह से परे सिद्ध करते हैं। अदालत ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' श्रेणी में मानते हुए मृत्युदंड को उपयुक्त सजा माना।
हालांकि भारतीय कानून के तहत किसी भी मृत्युदंड को लागू करने से पहले संबंधित बॉम्बे हाई कोर्ट से उसकी पुष्टि (Confirmation) आवश्यक होती है। इसके बाद दोषी के पास उच्च न्यायालय, सुप्रीम कोर्ट, पुनर्विचार याचिका, क्यूरेटिव याचिका तथा राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने का संवैधानिक अधिकार भी उपलब्ध रहेगा।
1 मई को हुई थी दिल दहला देने वाली घटना
मामला 1 मई 2026 का है। पुलिस जांच के अनुसार, पुणे जिले की भोर तहसील के नसरापुर गांव में चार वर्षीय बच्ची अपनी दादी के घर के बाहर खेल रही थी। आरोप है कि आरोपी भीमराव कांबले बच्ची को बहला-फुसलाकर पास स्थित एक गौशाला में ले गया, जहां उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई।
घटना के बाद इलाके में हड़कंप मच गया। स्थानीय लोगों और पुलिस ने संयुक्त रूप से बच्ची की तलाश शुरू की। जांच के दौरान घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, प्रत्यक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और अन्य प्रारंभिक जांच के आधार पर आरोपी की पहचान हुई। ग्रामीणों ने आरोपी को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया, जिसके बाद उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया।
जनआक्रोश के बाद गठित हुई विशेष जांच टीम
घटना के बाद पूरे क्षेत्र में भारी आक्रोश फैल गया। स्थानीय लोगों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किए और दोषी को शीघ्र कठोर सजा देने की मांग की। विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ स्थानों पर यातायात भी प्रभावित हुआ।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए महाराष्ट्र पुलिस ने जांच की निगरानी और त्वरित कार्रवाई के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। राज्य सरकार ने भी जांच और अभियोजन को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए ताकि समयबद्ध तरीके से अदालत में मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकें।
15 दिन में दाखिल हुई 1,200 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट
जांच एजेंसियों ने रिकॉर्ड समय में साक्ष्य जुटाते हुए 16 मई 2026 को अदालत में लगभग 1,200 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की।
चार्जशीट में शामिल प्रमुख साक्ष्यों में—
डीएनए प्रोफाइलिंग रिपोर्ट
फोरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट
पोस्टमार्टम एवं मेडिकल परीक्षण रिपोर्ट
घटनास्थल से एकत्र वैज्ञानिक साक्ष्य
सीसीटीवी फुटेज
इलेक्ट्रॉनिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्य
प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष गवाहों के बयान
अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि वैज्ञानिक साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला आरोपी की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से स्थापित करती है और मामले में किसी अन्य संभावना की गुंजाइश नहीं छोड़ती।
फास्ट-ट्रैक कोर्ट में रोजाना हुई इन-कैमरा सुनवाई
28 मई को विशेष POCSO अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा POCSO Act की संबंधित धाराओं के तहत आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए।
पीड़िता की पहचान और गरिमा की रक्षा के लिए मुकदमे की सुनवाई इन-कैमरा की गई। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए लगभग प्रतिदिन सुनवाई की, जिससे मुकदमे का निस्तारण तेज गति से हो सका।
सुनवाई के दौरान 55 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इनमें पुलिस अधिकारी, जांच अधिकारी, मेडिकल विशेषज्ञ, फोरेंसिक विशेषज्ञ तथा अन्य महत्वपूर्ण गवाह शामिल थे। अदालत ने प्रत्येक वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य का विस्तार से परीक्षण किया।
अभियोजन ने 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' मानते हुए मांगी थी मृत्युदंड
विशेष लोक अभियोजक अजय मिसर ने अदालत के समक्ष दलील दी कि चार वर्षीय बच्ची के साथ किया गया अपराध अत्यंत क्रूर, अमानवीय और समाज की सामूहिक चेतना को झकझोरने वाला है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' सिद्धांत का हवाला देते हुए मृत्युदंड की मांग की।
बचाव पक्ष ने आरोपी की आयु तथा अन्य परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए सजा में नरमी की अपील की, लेकिन अदालत ने माना कि अपराध की प्रकृति, पीड़िता की कम उम्र तथा उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य मृत्युदंड देने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं।
25 जून को दोषी, 29 जून को सुनाई गई फांसी
लगातार चली सुनवाई के बाद 25 जून 2026 को अदालत ने भीमराव कांबले को अपहरण, दुष्कर्म और हत्या का दोषी करार दिया। इसके बाद सजा के प्रश्न पर दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनी गईं।
29 जून 2026 को अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए आरोपी को मृत्युदंड की सजा दी। फैसले में अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की श्रृंखला पूर्ण, विश्वसनीय और निर्विवाद है तथा अपराध की गंभीरता इसे दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में रखती है।
55 दिन की न्यायिक प्रक्रिया बनी मिसाल
यह मामला केवल अपराध की गंभीरता ही नहीं, बल्कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया की गति के कारण भी चर्चा में रहा। पुलिस ने कम समय में वैज्ञानिक जांच पूरी की, SIT ने साक्ष्य एकत्र कर समयबद्ध चार्जशीट दाखिल की और विशेष अदालत ने लगातार सुनवाई कर मुकदमे को प्राथमिकता दी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों, डीएनए विश्लेषण, फोरेंसिक जांच, समयबद्ध अभियोजन और फास्ट-ट्रैक अदालतों के प्रभावी समन्वय से संवेदनशील मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है। यह मामला उसी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है।
हालांकि, मृत्युदंड पर अंतिम मुहर अब बॉम्बे हाई कोर्ट की पुष्टि और उसके बाद उपलब्ध सभी वैधानिक अपीलों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लगेगी।
news desk MPcg