स्नान यात्रा 2026: पुरी में भगवान जगन्नाथ के दिव्य महाअभिषेक की तैयारियां पूरी, 108 कलशों से होगा स्नान; रथ यात्रा से पहले शुरू होगा 'अनासरा' काल

स्नान यात्रा 2026: पुरी में भगवान जगन्नाथ के दिव्य महाअभिषेक की तैयारियां पूरी, 108 कलशों से होगा स्नान; रथ यात्रा से पहले शुरू होगा 'अनासरा' काल

 विश्व प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ रथ यात्रा से पहले आयोजित होने वाले सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में से एक देब स्नान पूर्णिमा (Snana Yatra/Deva Snana Purnima) के लिए ओडिशा का तीर्थनगरी पुरी पूरी तरह तैयार है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित इस वार्षिक अनुष्ठान में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्र का सार्वजनिक रूप से भव्य महाअभिषेक किया जाएगा। यह पर्व जगन्नाथ संस्कृति में रथ यात्रा की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक माना जाता है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इसके दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं।

श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) और जिला प्रशासन ने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा, यातायात, चिकित्सा, भीड़ नियंत्रण और दर्शन व्यवस्था के विशेष इंतजाम किए हैं। प्रशासन का लक्ष्य सभी धार्मिक अनुष्ठानों को निर्धारित समय पर और परंपराओं के अनुरूप संपन्न कराना है।

क्या है स्नान यात्रा?

स्नान यात्रा, जिसे देब स्नान पूर्णिमा भी कहा जाता है, भगवान जगन्नाथ के प्रमुख वार्षिक उत्सवों में शामिल है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह भगवान जगन्नाथ का प्रकटोत्सव (जन्मोत्सव) भी माना जाता है। इसी दिन वर्ष में पहली बार भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा, सुदर्शन चक्र और अन्य विग्रहों को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाकर स्नान मंडप (Snana Mandap) पर विराजमान किया जाता है, जहां लाखों श्रद्धालु सार्वजनिक दर्शन करते हैं।

108 स्वर्ण कलशों के पवित्र जल से होगा महाअभिषेक

इस अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण भाग भगवान का दिव्य स्नान है। परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र का 108 पवित्र कलशों के जल से अभिषेक किया जाता है।

यह जल मंदिर परिसर के उत्तर दिशा में स्थित 'सुना कुआं' (Golden Well) से विशेष धार्मिक विधि के तहत निकाला जाता है। इस कुएं का जल पूरे वर्ष केवल इसी एक अवसर पर भगवान के स्नान के लिए उपयोग किया जाता है। जल निकालने से पहले वैदिक मंत्रोच्चार, शुद्धिकरण और पारंपरिक पूजा की जाती है। इसके बाद सेवायत निर्धारित विधि से भगवान का महाअभिषेक संपन्न कराते हैं।

हाथी वेश (हाटी बेशा) के दर्शन का विशेष महत्व

महाअभिषेक के बाद भगवान जगन्नाथ और भगवान बलभद्र को विशेष रूप से 'हाटी बेशा' (गज बेशा/हाथी वेश) में सजाया जाता है। इस अलंकरण में भगवान गणेश के स्वरूप की झलक मानी जाती है। श्रद्धालुओं के लिए यह वर्ष के सबसे दुर्लभ और आकर्षक दर्शनों में से एक होता है।

मान्यता है कि इस स्वरूप के दर्शन से भक्तों को विशेष आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है। इसी कारण स्नान यात्रा के दिन लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।

स्नान के बाद शुरू होगा 15 दिन का 'अनासरा' काल

जगन्नाथ परंपरा के अनुसार 108 कलशों से स्नान के बाद भगवान को प्रतीकात्मक रूप से ज्वर (दिव्य अस्वस्थता) हो जाता है। इसके बाद भगवान लगभग 15 दिनों तक 'अनासरा' (Anasara) में विश्राम करते हैं।

इस अवधि में मंदिर के मुख्य विग्रहों के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं। परंपरा के अनुसार भगवान का उपचार विशेष आयुर्वेदिक औषधियों और पारंपरिक सेवाओं के माध्यम से किया जाता है। इस दौरान श्रद्धालु मुख्य विग्रहों के स्थान पर अनासरा पत्ती (पट्टचित्र शैली में निर्मित विशेष चित्र) के दर्शन करते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में भगवान का स्वरूप ब्रह्मगिरि स्थित अलारनाथ मंदिर में विराजमान माना जाता है, इसलिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु वहां भी दर्शन के लिए जाते हैं।

नवयौवन दर्शन के बाद निकलेगी विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा

अनासरा अवधि समाप्त होने के बाद भगवान नए और दिव्य स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे 'नवयौवन दर्शन' (Nabajaubana Darshan) कहा जाता है। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान होकर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यही विश्व प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ रथ यात्रा है, जिसका आयोजन इस वर्ष 16 जुलाई 2026 को होना प्रस्तावित है।

रथ निर्माण अंतिम चरण में

अक्षय तृतीया से शुरू हुआ भगवान के तीनों विशाल रथों—नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन—का निर्माण कार्य अंतिम चरण में पहुंच चुका है। पारंपरिक विश्वकर्मा परिवारों के कारीगर सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार विशेष लकड़ी से इन रथों का निर्माण करते हैं। प्रत्येक रथ का आकार, रंग, पहियों की संख्या और ध्वज धार्मिक परंपराओं के अनुसार निर्धारित होता है।

सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा पर विशेष जोर

लाखों श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए पुरी प्रशासन और श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था लागू की है। मंदिर परिसर और शहर में अतिरिक्त पुलिस बल, सीसीटीवी निगरानी, ड्रोन मॉनिटरिंग, बैरिकेडिंग, मेडिकल कैंप, एम्बुलेंस, आपदा प्रबंधन दल और यातायात नियंत्रण व्यवस्था तैनात की गई है।

श्रद्धालुओं की सुगम आवाजाही के लिए अलग-अलग प्रवेश और निकास मार्ग बनाए गए हैं तथा सेवायतों और प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित किया गया है ताकि सभी धार्मिक अनुष्ठान समय पर संपन्न हो सकें।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों और जगन्नाथ परंपरा के अनुसार स्नान यात्रा केवल एक स्नान अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान और भक्तों के बीच प्रत्यक्ष मिलन का उत्सव है। यह वर्ष का पहला अवसर होता है जब भगवान के सार्वजनिक दर्शन होते हैं। स्कंद पुराण में भी इस अनुष्ठान का उल्लेख मिलता है और मान्यता है कि इस दिन भगवान के दर्शन करने से भक्तों को आध्यात्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है।

स्नान यात्रा, अनासरा, नवयौवन दर्शन और रथ यात्रा—ये चारों चरण जगन्नाथ परंपरा की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक कड़ियां मानी जाती हैं। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इन आयोजनों में भाग लेने पुरी पहुंचते हैं, जिससे यह केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का भी एक प्रमुख उत्सव बन जाता है।