रोहित रावत अमर रहे' के नारों से गूंजा टिहरी, वीर सपूत की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब

रोहित रावत अमर रहे' के नारों से गूंजा टिहरी, वीर सपूत की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब

उत्तराखंड के टिहरी जिले का वीर सपूत अग्निवीर रोहित रावत शुक्रवार को पूरे सैन्य सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन हो गया। जम्मू में ड्यूटी के दौरान शहीद हुए रोहित के पार्थिव शरीर को जब उनके पैतृक गांव लाया गया तो हर आंख नम हो गई। तिरंगे में लिपटे बेटे को अंतिम विदाई देने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा और वातावरण "रोहित रावत अमर रहे" के नारों से गूंज उठा।

टिहरी जिले के घनसाली क्षेत्र स्थित मेंदू सिंधवाल गांव के रहने वाले रोहित रावत ने देश सेवा का सपना देखा था और एक वर्ष पहले भारतीय सेना में अग्निवीर के रूप में भर्ती हुए थे। कठिन सैन्य प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनकी पहली तैनाती जम्मू में 20 गढ़वाल राइफल्स के साथ हुई थी।

ड्यूटी के दौरान हुआ दर्दनाक हादसा

जानकारी के अनुसार, 10 जून की सुबह ड्यूटी के दौरान रोहित को उनकी सर्विस राइफल से गोली लग गई। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया। घटना के बाद सेना ने मामले की जांच शुरू कर दी है कि गोली किन परिस्थितियों में चली और हादसा कैसे हुआ।

तिरंगे में लिपटे बेटे को देख फूट-फूटकर रोए परिजन

शुक्रवार सुबह जब रोहित का पार्थिव शरीर उनके गांव पहुंचा तो परिवार और ग्रामीणों का दर्द छलक उठा। माता-पिता, परिजन और गांव के लोगों ने नम आंखों से अपने लाल को अंतिम विदाई दी। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण, जनप्रतिनिधि और सेना के अधिकारी शामिल हुए।

सैन्य सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार

पैतृक घाट बिनपुला में सेना के जवानों ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ रोहित रावत को अंतिम सलामी दी। राष्ट्रध्वज में लिपटे वीर सपूत को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं।

'स्मृति द्वार' बनाने की घोषणा

अंतिम संस्कार के दौरान क्षेत्रीय विधायक ने रोहित रावत की शहादत को नमन करते हुए उनके पैतृक गांव में 'स्मृति द्वार' बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि रोहित का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और सेवा की प्रेरणा देता रहेगा।

देश सेवा का सपना अधूरा, लेकिन अमर हो गई शहादत

महज एक साल पहले सेना की वर्दी पहनकर देश की रक्षा का संकल्प लेने वाले रोहित रावत आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा। गांव के लोगों का कहना है कि रोहित ने कम उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर पूरे उत्तराखंड का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।

वीर सपूत की अंतिम विदाई के समय हर जुबान पर सिर्फ एक ही नारा था—
"जब तक सूरज चांद रहेगा, रोहित रावत तेरा नाम रहेगा।"