जनजातीय समाज गीली मिट्टी की तरह, जैसा संस्कार देंगे वैसा भविष्य बनेगा राष्ट्रपति मुर्मु का विकसित भारत 2047 का आह्वान
मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में आयोजित 'आध्यात्मिक जागृति द्वारा आदिवासी समाज का सशक्तीकरण महासम्मेलन' में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जनजातीय समाज के विकास, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदाय गीली मिट्टी की तरह होता है, जिसे जैसे संस्कार और दिशा मिलती है, उसका भविष्य भी उसी अनुरूप आकार लेता है।
राष्ट्रपति ने कहा कि आदिवासी समाज को आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास और डिजिटल सशक्तीकरण से जोड़ना समय की सबसे बड़ी जरूरत है, लेकिन इसके साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक विरासत को भी सुरक्षित रखना उतना ही आवश्यक है।
2047 तक विकसित भारत का संकल्प
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का संकल्प दोहराते हुए कहा कि यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब देश का हर वर्ग, विशेषकर जनजातीय समाज, विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता, आध्यात्मिक मूल्यों और पर्यावरण संरक्षण के आधार पर ही आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण संभव है। उन्होंने युवाओं से शिक्षा और तकनीक को अपनाने के साथ-साथ अपनी परंपराओं और मूल्यों को भी सहेजकर रखने का आह्वान किया।
प्रकृति से जुड़ा है जनजातीय जीवन
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि जनजातीय समाज सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीता आया है। उनकी संस्कृति धरती, जल, वायु, आकाश, सूर्य और चंद्रमा जैसे पंचतत्वों के सम्मान पर आधारित है। यही जीवनशैली पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास का सबसे बड़ा उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास की दौड़ में प्रकृति और संस्कृति के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है और आदिवासी समाज इस दिशा में पूरे देश के लिए प्रेरणा बन सकता है।
प्राकृतिक खेती और पर्यावरण संरक्षण पर दिया जोर
राष्ट्रपति ने प्राकृतिक खेती को स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी बताते हुए इसके व्यापक विस्तार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जैविक और प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण भी सुनिश्चित करती है।
युवाओं के लिए दिया प्रेरक संदेश
राष्ट्रपति ने आदिवासी युवाओं से अपील की कि वे शिक्षा, तकनीक और डिजिटल दुनिया से जुड़कर नए अवसरों का लाभ उठाएं, लेकिन अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को कभी न भूलें। उन्होंने कहा कि विकास तभी सार्थक होगा जब आधुनिकता और सांस्कृतिक विरासत साथ-साथ आगे बढ़ें।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जनजातीय समाज के प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और ब्रह्मकुमारी संस्था के सदस्य मौजूद रहे। राष्ट्रपति के संबोधन ने शिक्षा, संस्कृति और आत्मनिर्भर भारत के संदेश को एक नई दिशा देने का प्रयास किया।
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