शरद पवार बनाम इंदिरा गांधी से लेकर शिवसेना तक महाराष्ट्र की राजनीति में बगावत और दल-बदल की पूरी इनसाइड स्टोरी
महाराष्ट्र की राजनीति को अगर किसी एक शब्द में समझना हो, तो वह है—अस्थिरता। यहां सत्ता कभी स्थायी नहीं रही और गठबंधन कभी अंतिम नहीं माने गए। पिछले छह दशकों में राज्य ने ऐसे कई राजनीतिक भूचाल देखे हैं, जिनमें कांग्रेस का विभाजन, शरद पवार का उदय, शिवसेना का उभार और हालिया दल-बदल की लहर शामिल है।
यह कहानी सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसने महाराष्ट्र को भारतीय राजनीति का सबसे गतिशील राज्य बना दिया।
1969: इंदिरा गांधी बनाम संगठनात्मक कांग्रेस का ऐतिहासिक टकराव
महाराष्ट्र की राजनीतिक कहानी को समझने के लिए 1969 का वर्ष निर्णायक माना जाता है। इसी समय इंदिरा गांधी और कांग्रेस संगठन के बीच ऐतिहासिक टकराव हुआ, जिसने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया।
राष्ट्रपति चुनाव के बाद उपजे मतभेदों ने इतना गहरा रूप ले लिया कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित करने तक का निर्णय ले लिया। इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने अपने समर्थकों के साथ अलग गुट बनाकर संगठनात्मक कांग्रेस को चुनौती दी।
यहीं से भारतीय राजनीति में “नेतृत्व बनाम संगठन” की नई परंपरा शुरू हुई, जिसका असर आने वाले दशकों तक महाराष्ट्र की राजनीति पर दिखता रहा।
शरद पवार का पहला राजनीतिक विद्रोह
इसी दौर में महाराष्ट्र में एक युवा नेता का उदय हुआ—शरद पवार।
1970 और 80 के दशक में पवार ने कांग्रेस की गुटीय राजनीति को नजदीक से देखा और धीरे-धीरे खुद को एक मजबूत क्षेत्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
1978 में उन्होंने एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया—कांग्रेस से अलग होकर प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाना और मात्र 38 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन जाना। यह कदम महाराष्ट्र की राजनीति में “युवा विद्रोह” का प्रतीक बन गया।
हालांकि कुछ समय बाद केंद्र सरकार द्वारा उनकी सरकार गिरा दी गई, लेकिन पवार ने यह साबित कर दिया कि महाराष्ट्र में सत्ता समीकरण हमेशा स्थिर नहीं रहते।
1966 में शिवसेना का उदय और मराठी अस्मिता की राजनीति
इसी बीच महाराष्ट्र में एक और बड़ी राजनीतिक शक्ति उभर रही थी—शिवसेना।
1966 में बाल ठाकरे ने मराठी अस्मिता और स्थानीय अधिकारों के मुद्दे पर इस संगठन की नींव रखी।
शुरुआत में एक आंदोलन के रूप में शुरू हुई शिवसेना जल्द ही मुंबई की सड़कों पर मजबूत राजनीतिक शक्ति बन गई। इसके कार्यकर्ता संगठनात्मक अनुशासन और आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाते थे।
बाद में शिवसेना ने भाजपा के साथ लंबा गठबंधन किया, जिसने राज्य की राजनीति को नया आकार दिया।
1995: पहली शिवसेना-भाजपा सरकार
महाराष्ट्र में 1995 का वर्ष ऐतिहासिक रहा जब पहली बार शिवसेना और भाजपा की सरकार बनी।
इस गठबंधन ने राज्य की सत्ता में नई राजनीतिक धुरी तैयार की, जिसमें मराठी क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रीय विचारधारा का मिश्रण था।
हालांकि यह गठबंधन स्थायी नहीं रहा, लेकिन इसने यह साबित कर दिया कि महाराष्ट्र में राजनीति हमेशा समीकरणों पर आधारित रहती है, विचारधारा पर नहीं।
1999: कांग्रेस से अलग होकर NCP का गठन
1999 में एक और बड़ा राजनीतिक भूकंप आया जब शरद पवार ने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाई—राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी। यह कदम सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर असहमति के बाद लिया गया था। इसके बाद महाराष्ट्र में नए गठबंधन बने, जहां कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर सरकार बनाई, जबकि शिवसेना-भाजपा विपक्ष में बैठी।
2014 और 2019: गठबंधन टूटने और नई सरकारों का दौर
2014 के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में तेजी से बदलाव देखने को मिले। भाजपा और शिवसेना के बीच रिश्ते कमजोर होने लगे और 2019 के चुनाव के बाद यह गठबंधन टूट गया।
इसके बाद जो हुआ वह महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे नाटकीय घटनाक्रम था।
23 नवंबर 2019 को अचानक सरकार गठन की कोशिश हुई जिसमें देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने सुबह-सुबह शपथ ली।
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