E-20 और पेट्रोल फ्यूल की एंट्री में अंतर से फंसा 40 वाहनों का रजिस्ट्रेशन, सिस्टम अपडेट के बाद नोएडा में बढ़ी परेशानी; 10-15 दिन तक लग रहा अतिरिक्त समय

E-20 और पेट्रोल फ्यूल की एंट्री में अंतर से फंसा 40 वाहनों का रजिस्ट्रेशन, सिस्टम अपडेट के बाद नोएडा में बढ़ी परेशानी; 10-15 दिन तक लग रहा अतिरिक्त समय

केंद्र सरकार द्वारा स्वच्छ ईंधन और एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E-20) को बढ़ावा देने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के बीच उत्तर प्रदेश के नोएडा में वाहन पंजीकरण (Vehicle Registration) से जुड़ी एक तकनीकी समस्या सामने आई है। परिवहन विभाग के रिकॉर्ड और स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, E-20 और पेट्रोल फ्यूल संबंधी दस्तावेजों में दर्ज अलग-अलग जानकारी के कारण करीब 40 नए वाहनों का पंजीकरण अटक गया है।

इस समस्या के चलते वाहन खरीदारों को डीलरशिप और परिवहन विभाग के बीच कई बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। दस्तावेजों में त्रुटि सुधारने और निर्माता कंपनी से स्पष्टीकरण (Clarification) आने के बाद ही वाहनों का रजिस्ट्रेशन पूरा हो पा रहा है। पूरी प्रक्रिया में सामान्य समय की तुलना में 10 से 15 दिन अतिरिक्त लग रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

हर नए वाहन के पंजीकरण के लिए निर्माता कंपनी द्वारा फॉर्म-22 (Form 22) जारी किया जाता है। यह दस्तावेज वाहन के निर्माण, तकनीकी मानकों और ईंधन (Fuel Type) से संबंधित प्रमाण देता है। इसके साथ डीलर द्वारा भी वाहन से संबंधित विवरण परिवहन विभाग के पोर्टल पर अपलोड किया जाता है।

नोएडा में सामने आए मामलों में समस्या तब उत्पन्न हुई जब—

निर्माता कंपनी के फॉर्म-22 में वाहन का ईंधन "Petrol" दर्ज था।
वहीं डीलर द्वारा तैयार दस्तावेज या सिस्टम में उसी वाहन के लिए "E-20 Compatible" या E-20 से संबंधित विवरण दर्ज किया गया।

दोनों दस्तावेजों में ईंधन संबंधी जानकारी अलग होने के कारण परिवहन विभाग का सॉफ्टवेयर उन्हें स्वीकार नहीं कर पा रहा है। परिणामस्वरूप वाहन का रजिस्ट्रेशन लंबित हो जा रहा है।

1 अप्रैल से लागू हुई नई व्यवस्था के बाद बढ़ी दिक्कत

ऑटोमोबाइल उद्योग में 1 अप्रैल से लागू नए मानकों के तहत कई नए दोपहिया और चारपहिया वाहन E-20 पेट्रोल के अनुकूल (E20 Fuel Compatible) बनाए जा रहे हैं।

E-20 ऐसा ईंधन है जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल का मिश्रण होता है। भारत सरकार ने आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने, किसानों को लाभ पहुंचाने और कार्बन उत्सर्जन घटाने के उद्देश्य से इस ईंधन को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है।

हालांकि, नई व्यवस्था लागू होने के दौरान कुछ वाहन निर्माताओं और डीलरशिप के दस्तावेजों में ईंधन संबंधी विवरण एक समान अपडेट नहीं हो सके। यही विसंगति अब पंजीकरण प्रक्रिया में बाधा बन रही है।

वाहन मालिकों की बढ़ी परेशानी

इस तकनीकी गड़बड़ी का सबसे अधिक असर नए वाहन खरीदने वाले ग्राहकों पर पड़ रहा है।

पीड़ित वाहन मालिकों का कहना है कि—

वाहन की पूरी कीमत जमा करने के बाद भी रजिस्ट्रेशन नहीं हो रहा।
बिना पंजीकरण के वाहन का स्थायी नंबर नहीं मिल पा रहा।
बीमा, आरसी और अन्य औपचारिकताएं भी प्रभावित हो रही हैं।
डीलर और परिवहन विभाग के बीच बार-बार जाना पड़ रहा है।
समस्या का समाधान होने में एक से दो सप्ताह तक का समय लग रहा है।

कुछ वाहन मालिकों ने बताया कि बुकिंग और डिलीवरी के समय उन्हें इस समस्या की जानकारी नहीं थी। वाहन मिलने के बाद पता चला कि दस्तावेजों में फ्यूल एंट्री अलग होने के कारण रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।

कैसे दूर की जा रही है समस्या?

जब किसी वाहन के दस्तावेजों में फ्यूल संबंधी अंतर सामने आता है, तब—

डीलर निर्माता कंपनी से संपर्क करता है।
निर्माता कंपनी ई-मेल के माध्यम से स्पष्टीकरण जारी करती है।
आवश्यक होने पर दस्तावेजों में संशोधन किया जाता है।
इसके बाद परिवहन विभाग रिकॉर्ड का मिलान करता है।
सभी जानकारी एक समान होने पर वाहन का पंजीकरण पूरा किया जाता है।

यही अतिरिक्त प्रक्रिया 10 से 15 दिन का अतिरिक्त समय ले रही है।

परिवहन विभाग ने क्या कहा?

नोएडा के एआरटीओ (प्रशासन) नंद कुमार ने स्वीकार किया है कि कुछ वाहनों के पंजीकरण में फ्यूल प्रकार से संबंधित दस्तावेजों के अंतर के कारण समस्या आई है।

उन्होंने बताया कि—

डीलर और वाहन निर्माता कंपनी के दस्तावेजों में समान जानकारी होना आवश्यक है।
जहां विसंगति मिली है, वहां सुधार के बाद ही रजिस्ट्रेशन किया जा रहा है।
शिकायतों की संख्या पहले की तुलना में कम हुई है।
उम्मीद है कि जल्द ही सभी लंबित मामलों का समाधान कर दिया जाएगा।
Form-22 क्या होता है?

फॉर्म-22 मोटर वाहन अधिनियम के तहत निर्माता कंपनी द्वारा जारी किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण प्रमाणपत्र है।

इसमें शामिल होते हैं—

वाहन का मॉडल
इंजन और चेसिस नंबर
निर्माण वर्ष
उत्सर्जन मानक
ईंधन का प्रकार
सुरक्षा मानकों का अनुपालन

इसी दस्तावेज के आधार पर परिवहन विभाग वाहन का स्थायी पंजीकरण करता है।

E-20 पेट्रोल क्या है?

E-20 एक मिश्रित ईंधन है जिसमें—

20 प्रतिशत एथेनॉल
80 प्रतिशत पेट्रोल

शामिल होता है।

सरकार का लक्ष्य है कि देश में चरणबद्ध तरीके से E-20 ईंधन के उपयोग को बढ़ाया जाए, ताकि—

पेट्रोल आयात पर निर्भरता कम हो,
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटे,
गन्ना और अन्य फसलों से जुड़े किसानों की आय बढ़े,
स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा मिले।
क्या सभी पेट्रोल वाहन E-20 पर चल सकते हैं?

नहीं।

सभी पुराने वाहन E-20 के लिए उपयुक्त नहीं हैं। कई वाहन निर्माता कंपनियों ने 2023 के बाद से ऐसे मॉडल बाजार में उतारे हैं जो E-20 ईंधन के अनुकूल बनाए गए हैं।

वाहन खरीदते समय ग्राहक को यह देखना चाहिए कि निर्माता ने वाहन को E-20 Compatible घोषित किया है या नहीं।

विशेषज्ञ क्या मानते हैं?

ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का कहना है कि नई तकनीक या नए ईंधन मानकों को लागू करते समय डिजिटल रिकॉर्ड, वाहन निर्माता, डीलर और परिवहन विभाग के सॉफ्टवेयर के बीच पूर्ण समन्वय होना जरूरी है।

यदि सभी प्लेटफॉर्म पर एक जैसी जानकारी अपडेट नहीं होती, तो इस तरह की तकनीकी समस्याएं सामने आ सकती हैं। हालांकि यह प्रशासनिक और तकनीकी समन्वय का मुद्दा है, न कि वाहन की गुणवत्ता या E-20 ईंधन की क्षमता से जुड़ी समस्या।

निष्कर्ष

नोएडा में सामने आया यह मामला बताता है कि नई ईंधन नीति और डिजिटल पंजीकरण प्रणाली के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता है। फिलहाल समस्या सीमित संख्या के वाहनों तक है और परिवहन विभाग का कहना है कि दस्तावेजों में सुधार के बाद पंजीकरण किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि निर्माता कंपनियों, डीलरशिप और सरकारी पोर्टलों के बीच डेटा का पूर्ण समन्वय होने पर ऐसी तकनीकी अड़चनें भविष्य में काफी हद तक समाप्त हो सकती हैं।