15 साल की मेहनत रंग लाई: मध्य प्रदेश में तैयार हुई भारत की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग, अब नर्मदा का पानी पहुंचेगा सोन बेसिन तक

15 साल की मेहनत रंग लाई: मध्य प्रदेश में तैयार हुई भारत की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग, अब नर्मदा का पानी पहुंचेगा सोन बेसिन तक

मध्य प्रदेश के जल संसाधन इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। कटनी जिले के स्लीमनाबाद क्षेत्र में विंध्य पर्वतमाला के भीतर बनाई गई लगभग 11.95 किलोमीटर लंबी भूमिगत सिंचाई जल सुरंग (Water Tunnel) का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। यह सुरंग नर्मदा दायीं तट नहर परियोजना का हिस्सा है और इसे देश की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग माना जा रहा है।

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के पूरा होने के बाद नर्मदा नदी का पानी प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण (Gravity Flow) के माध्यम से सोन बेसिन तक पहुंच सकेगा। परियोजना से मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में सिंचाई क्षमता बढ़ने के साथ-साथ जल प्रबंधन को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

14 जुलाई को पूरा हुआ अहम चरण

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NBDA) के अधिकारियों के अनुसार, 14 जुलाई 2026 को सुरंग निर्माण में लगी टनल बोरिंग मशीन (TBM) निर्धारित सीमेंटेड रिसीविंग शाफ्ट (कुएं) तक सफलतापूर्वक पहुंच गई। इसके साथ ही सुरंग की खुदाई का सबसे चुनौतीपूर्ण चरण पूरा हो गया।

एनबीडीए के अधिकारियों ने बताया कि अब केवल मशीनों को सुरंग से निकालने और अंतिम तकनीकी कार्य शेष हैं। अनुमान है कि अगले डेढ़ महीने में मशीनों को पूरी तरह बाहर निकाल लिया जाएगा। इसके बाद परीक्षण प्रक्रिया पूरी कर नहर प्रणाली में पानी छोड़ा जाएगा।

2011 में शुरू हुई थी परियोजना

इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 2011 में की गई थी। उस समय इसका उद्देश्य विंध्य पर्वत श्रृंखला के कारण बाधित नर्मदा के जल को सुरंग के माध्यम से सोन बेसिन तक पहुंचाना था।

सुरंग का निर्माण कटनी जिले के सलैया फाटक से खिरहनी गांव के बीच किया गया। परियोजना के डाउनस्ट्रीम हिस्से का निर्माण पहले ही पूरा हो चुका था, जबकि अपस्ट्रीम हिस्से का कार्य तकनीकी चुनौतियों के कारण निर्धारित समय से आगे बढ़ा। अंततः लगभग 15 वर्षों की मेहनत के बाद यह ऐतिहासिक परियोजना अपने अंतिम चरण में पहुंच गई।

शुरुआती लागत 799 करोड़, अब करीब 1500 करोड़ रुपये

जब परियोजना को मंजूरी मिली थी तब इसकी अनुमानित लागत 799 करोड़ रुपये थी, लेकिन लंबे निर्माण काल, तकनीकी बदलाव, महंगी मशीनरी और भू-वैज्ञानिक चुनौतियों के कारण लागत बढ़कर लगभग 1500 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार की विशाल भूमिगत जल सुरंग परियोजनाओं में समय और लागत बढ़ना असामान्य नहीं माना जाता, क्योंकि निर्माण पूरी तरह भूगर्भीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

सुरंग की प्रमुख विशेषताएं

इस परियोजना की कुछ प्रमुख तकनीकी विशेषताएं इस प्रकार हैं—

लंबाई लगभग 11.952 किलोमीटर
आंतरिक व्यास लगभग 10.14 मीटर
उद्देश्य – नर्मदा का जल सोन बेसिन तक पहुंचाना
प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण प्रवाह से पानी का परिवहन
पंपिंग की आवश्यकता नहीं
नर्मदा दायीं तट नहर परियोजना का हिस्सा
निर्माण स्थल – स्लीमनाबाद, जिला कटनी (मध्य प्रदेश)

विशेषज्ञों के अनुसार इतनी लंबी जल सुरंग का निर्माण भारतीय सिंचाई इंजीनियरिंग की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाएगा।

पहाड़ों के भीतर काम करना आसान नहीं था

सुरंग निर्माण के दौरान इंजीनियरों और श्रमिकों को अनेक तकनीकी और प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

निर्माण के दौरान सामने आई प्रमुख समस्याएं—

अत्यधिक कठोर चट्टानें
भूजल का लगातार रिसाव
सिंकहोल बनने का खतरा
वायु गुणवत्ता बनाए रखने की चुनौती
कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन
टनल बोरिंग मशीन के कटर हेड का बार-बार क्षतिग्रस्त होना
भारी मात्रा में मलबा हटाना
भूमिगत सुरक्षा सुनिश्चित करना

सुरंग के भीतर कई किलोमीटर तक लगातार कार्य करने वाले श्रमिकों के लिए दिन और रात का अंतर लगभग समाप्त हो जाता था। मशीनों के माध्यम से लगातार ऑक्सीजन और गैसों की निगरानी की जाती रही, जबकि पानी निकालने के लिए पंप लगातार संचालित किए गए।

अमेरिका और जर्मनी से मंगाई गई आधुनिक मशीनें

इस परियोजना में अत्याधुनिक टनल बोरिंग मशीन (TBM) का उपयोग किया गया, जिन्हें अमेरिका और जर्मनी की तकनीक के आधार पर परियोजना में लगाया गया था।

अब इन विशाल मशीनों को बाहर निकालने के लिए लगभग 100 फीट गहरा सीमेंटेड शाफ्ट तैयार किया गया है। मशीनों को हिस्सों में खोलकर भारी क्रेन की सहायता से बाहर निकाला जाएगा।

गुरुत्वाकर्षण से बहेगा पानी

इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सुरंग से गुजरने वाला पानी किसी पंपिंग स्टेशन पर निर्भर नहीं रहेगा।

इंजीनियरों ने सुरंग की ढाल (Gradient) इस प्रकार तैयार की है कि नर्मदा का पानी प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण के कारण स्वयं आगे बढ़ेगा। इससे ऊर्जा की बचत होगी और संचालन लागत भी कम रहेगी।

किसानों को होगा बड़ा लाभ

परियोजना पूरी तरह चालू होने के बाद सोन बेसिन क्षेत्र के सिंचाई नेटवर्क को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

संभावित लाभ—

सिंचाई के लिए अधिक जल उपलब्धता
सूखा प्रभावित क्षेत्रों को राहत
कृषि उत्पादकता में वृद्धि
जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन
दीर्घकालीन सिंचाई क्षमता का विस्तार

हालांकि, प्रभावित क्षेत्र और सिंचाई क्षमता से जुड़े विस्तृत आधिकारिक आंकड़े परियोजना के पूर्ण संचालन के बाद जारी किए जाने की संभावना है।

लोककथा से जुड़ता है परियोजना का प्रतीकात्मक महत्व

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में प्रचलित एक लोककथा के अनुसार नर्मदा और सोनभद्र का विवाह होना तय था, लेकिन परिस्थितियों के कारण दोनों नदियां विपरीत दिशाओं में बह निकलीं। नर्मदा पश्चिम की ओर अरब सागर की तरफ और सोन पूर्व की ओर गंगा बेसिन की दिशा में प्रवाहित हुई।

यद्यपि यह केवल लोककथा है और इसका वैज्ञानिक आधार नहीं है, लेकिन इस परियोजना के पूरा होने के बाद कई लोग प्रतीकात्मक रूप से इसे "नर्मदा और सोन का मिलन" भी कह रहे हैं।

आधिकारिक स्थिति

एनबीडीए अधिकारियों के अनुसार—

सुरंग की खुदाई पूरी हो चुकी है।
टनल बोरिंग मशीन रिसीविंग शाफ्ट तक पहुंच चुकी है।
मशीनों को हटाने और अंतिम तकनीकी कार्य जारी हैं।
परीक्षण पूरा होने के बाद नहर प्रणाली में पानी छोड़ा जाएगा।
इंजीनियरिंग की बड़ी उपलब्धि

करीब 15 वर्षों तक चले इस निर्माण कार्य ने भारतीय इंजीनियरिंग, भू-तकनीकी विशेषज्ञता और श्रमिकों की मेहनत का अनूठा उदाहरण पेश किया है। विंध्य पर्वत श्रृंखला के भीतर लगभग 12 किलोमीटर लंबी जल सुरंग तैयार करना तकनीकी दृष्टि से अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य माना जाता है। परियोजना के पूर्ण संचालन के बाद यह मध्य प्रदेश की सिंचाई व्यवस्था और जल संसाधन प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है।