ओडिशा-आंध्र के बीच फिर भड़का कोटिया सीमा विवाद, 21 गांवों में ‘डेवलपमेंट पॉलिटिक्स’ की नई जंग
Odisha और Andhra Pradesh के बीच दशकों पुराना कोटिया सीमा विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। पूर्वी घाट की दुर्गम पहाड़ियों में बसे 21 गांवों को लेकर दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक, प्रशासनिक और विकास आधारित संघर्ष तेज हो गया है।
हाल के दिनों में आंध्र प्रदेश द्वारा विवादित गांवों में पुलिस सुरक्षा के बीच सौर पैनल लगाने, स्वास्थ्य शिविर आयोजित करने और प्रशासनिक गतिविधियां बढ़ाने के बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है। अब यह विवाद सिर्फ सीमांकन का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव, क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय लोगों के भविष्य की लड़ाई बनता जा रहा है।
21 गांवों पर दोनों राज्यों का दावा
Kotia पंचायत के अंतर्गत आने वाले 21 गांवों पर ओडिशा और आंध्र प्रदेश दोनों अपना दावा करते हैं। इनमें तलागंजईपदर, फगुणसेनेरी, ऊपरी सेम्बी, नरडीबाड़ा और धुलीपदार जैसे गांव शामिल हैं।
इन गांवों में रहने वाले हजारों आदिवासी परिवार वर्षों से दोहरी प्रशासनिक व्यवस्था के बीच जीवन बिता रहे हैं। कई परिवारों के पास दोनों राज्यों के दस्तावेज हैं। कुछ लोग ओडिशा से राशन लेते हैं, जबकि आंध्र प्रदेश से पेंशन और अन्य सुविधाएं प्राप्त करते हैं।
ब्रिटिश काल से जुड़ी है विवाद की जड़
विशेषज्ञों के अनुसार इस विवाद की शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल में खींची गई प्रशासनिक सीमाओं से हुई थी। वर्ष 1936 में ओडिशा राज्य के गठन और 1956 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दौरान सीमांकन स्पष्ट नहीं हो सका।
यही अस्पष्टता धीरे-धीरे बड़े अंतरराज्यीय विवाद में बदल गई। ओडिशा का दावा है कि ये गांव ऐतिहासिक रूप से कोरापुट प्रशासन का हिस्सा रहे हैं, जबकि आंध्र प्रदेश तेलुगु भाषी आबादी और सामाजिक संबंधों के आधार पर अपना अधिकार जताता है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला
वर्ष 1968 में ओडिशा सरकार ने इस विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। मामला आज भी लंबित है, लेकिन दोनों राज्यों ने जमीन पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने के प्रयास कभी बंद नहीं किए।
पिछले कई वर्षों में दोनों राज्यों ने गांवों में सड़क, राशन कार्ड, स्वास्थ्य सेवाएं, पंचायत चुनाव, छात्रवृत्ति और अन्य योजनाओं के जरिए स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की है।
विकास योजनाओं के जरिए बढ़ रही राजनीतिक पकड़
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोटिया विवाद अब “डेवलपमेंट पॉलिटिक्स” का बड़ा उदाहरण बन चुका है। विकास योजनाएं अब केवल जनता की सुविधा तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का माध्यम बन गई हैं।
आंध्र प्रदेश ने हाल के वर्षों में इन गांवों में सड़क, मोबाइल नेटवर्क, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं और सौर ऊर्जा परियोजनाएं शुरू की हैं। हालिया घटनाक्रम में पुलिस सुरक्षा के बीच सोलर पैनल लगाए जाने को ओडिशा की क्षेत्रीय संप्रभुता के लिए सीधी चुनौती माना जा रहा है।
ओडिशा सरकार भी कर रही जवाबी तैयारी
ओडिशा सरकार ने भी कोटिया क्षेत्र के लिए विशेष पैकेज, सड़क निर्माण, आवास योजनाएं और प्रशासनिक शिविर शुरू किए हैं। राज्य सरकार लगातार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि विवादित गांवों पर उसका प्रशासनिक नियंत्रण कायम है।
हालांकि विपक्षी दलों ने सरकार पर सीमा सुरक्षा और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर कमजोरी दिखाने का आरोप लगाया है। वहीं भाजपा का कहना है कि केंद्र सरकार और दोनों राज्यों के बीच समन्वय से स्थायी समाधान निकाला जाएगा।
दुर्गम भूगोल ने बढ़ाई मुश्किलें
कोटिया क्षेत्र का कठिन भूगोल भी इस विवाद को जटिल बनाता है। घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों से घिरे इन गांवों तक पहुंचना बेहद मुश्किल है। कई इलाकों में आज भी सड़क और संचार की सुविधाएं सीमित हैं।
बरसात के मौसम में कई गांवों का संपर्क लगभग टूट जाता है। लंबे समय तक सरकारी सुविधाओं की कमी के कारण स्थानीय लोग उस राज्य की ओर झुकते गए जहां से उन्हें अधिक सहायता और योजनाएं मिलीं।
आम लोगों पर सबसे ज्यादा असर
इस सीमा विवाद का सबसे बड़ा असर स्थानीय ग्रामीणों पर पड़ा है। गांवों के लोग वर्षों से दोहरी पहचान और दोहरी राजनीति के बीच फंसे हुए हैं। बच्चों की पढ़ाई एक राज्य में होती है तो स्वास्थ्य सुविधाएं दूसरे राज्य से मिलती हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें राजनीति नहीं, बल्कि स्थायी विकास चाहिए। वे सड़क, अस्पताल, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं।
समाधान के लिए क्या जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानूनी लड़ाई से इस विवाद का समाधान संभव नहीं होगा। इसके लिए केंद्र सरकार की मध्यस्थता, दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक सहमति और स्पष्ट प्रशासनिक सीमांकन बेहद जरूरी है।
सीमा आयोग के गठन, डिजिटल सर्वे, संयुक्त प्रशासनिक तंत्र और स्थानीय लोगों की राय को समाधान का आधार बनाया जा सकता है।
कोटिया अब सिर्फ 21 गांवों का विवाद नहीं रह गया है। यह भारत के संघीय ढांचे, सीमाई राजनीति और विकास आधारित प्रभाव की नई लड़ाई का प्रतीक बन चुका है। जब तक स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक कोटिया की पहाड़ियों में यह संघर्ष समय-समय पर नए रूप में सामने आता रहेगा।
news desk MPcg