फिरोजाबाद: डेढ़ साल के मासूम आरव की हत्या के दोषी विराज को फांसी की सजा, सिर्फ 41 दिन में आया फैसला; अदालत ने माना 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामला
उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के शिकोहाबाद में डेढ़ साल के मासूम आरव की नृशंस हत्या के मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दोषी विराज उर्फ जितेंद्र पाठक को मृत्युदंड (फांसी की सजा) सुनाई है। घटना के महज 41 दिनों के भीतर अदालत द्वारा फैसला सुनाए जाने को न्यायिक प्रक्रिया की तेजी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान और अपराध की क्रूरता को देखते हुए इसे अत्यंत जघन्य अपराध माना।
यह मामला 30 मई 2026 को हुई उस दर्दनाक घटना से जुड़ा है, जिसने पूरे उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में लोगों को झकझोर दिया था। सोशल मीडिया पर घटना का वीडियो सामने आने के बाद लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिला था और आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग उठी थी।
क्या था पूरा मामला?
पुलिस के अनुसार, सिरसागंज तहसील के गांव बामई निवासी रति की शादी बदायूं के सियाराम नगर निवासी सुमित उर्फ प्रियंक से हुई थी। दोनों के बीच लंबे समय से घरेलू विवाद चल रहा था और रति अपने डेढ़ वर्षीय बेटे आरव के साथ अलग रह रही थी। बताया गया कि वह वैवाहिक संबंध समाप्त करने के लिए तलाक की प्रक्रिया में थी।
इसी दौरान रति का रिश्ते का फुफेरा देवर विराज उर्फ जितेंद्र पाठक, निवासी शेखुपुरा (जिला बदायूं), उस पर शादी करने का दबाव बना रहा था। जांच में सामने आया कि आरोपी एकतरफा प्रेम करता था और बार-बार विवाह का प्रस्ताव रख रहा था। रति हर बार अपने छोटे बेटे का हवाला देकर प्रस्ताव ठुकरा देती थी। पुलिस का आरोप है कि इसी बात से नाराज होकर आरोपी ने मासूम बच्चे को अपना निशाना बनाया।
दिनदहाड़े हुई दिल दहला देने वाली वारदात
30 मई की दोपहर शिकोहाबाद की यादव कॉलोनी में आरोपी ने मासूम आरव को गोद में उठाया और अचानक उसे जमीन पर पटकना शुरू कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, किसी को कुछ समझ में आता, उससे पहले ही बच्चा गंभीर रूप से घायल हो चुका था।
पूरी वारदात आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड हो गई। जांच अधिकारियों के अनुसार, फुटेज में आरोपी बच्चे को बार-बार जमीन पर पटकता दिखाई देता है। वीडियो सामने आने के बाद पूरे प्रदेश में आक्रोश फैल गया। पुलिस और अभियोजन पक्ष ने इसी सीसीटीवी फुटेज को मुकदमे का सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य बनाया।
छह घंटे के भीतर गिरफ्तारी
घटना की सूचना मिलते ही शिकोहाबाद पुलिस और वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे। पूरे जिले में नाकाबंदी की गई और आरोपी की तलाश शुरू हुई। पुलिस ने लगभग छह घंटे के भीतर आरोपी विराज को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के अनुसार, गिरफ्तारी के दौरान आरोपी ने भागने का प्रयास किया, जिसके बाद हुई मुठभेड़ में उसके दोनों पैरों में गोली लगी। प्राथमिक उपचार के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
रिकॉर्ड समय में पूरी हुई जांच
इस मामले को अत्यधिक संवेदनशील मानते हुए पुलिस ने जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। जांच टीम ने घटनास्थल का वैज्ञानिक निरीक्षण कराया, सीसीटीवी फुटेज जब्त किए, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए और मेडिकल एवं पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित सभी आवश्यक साक्ष्य जुटाए।
महज छह दिनों के भीतर पुलिस ने आरोप पत्र (चार्जशीट) न्यायालय में दाखिल कर दिया। इसमें कुल 13 अभियोजन गवाहों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज शामिल किए गए।
अदालत में चली त्वरित सुनवाई
मामले की सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायाधीश डॉ. बब्बू सारंग की अदालत में हुई। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए लगातार सुनवाई की। अभियोजन पक्ष की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता राजीव प्रियदर्शी ने पैरवी की।
अभियोजन ने अदालत के समक्ष कुल 13 गवाह प्रस्तुत किए, जिनमें प्रत्यक्षदर्शी, जांच अधिकारी, चिकित्सकीय विशेषज्ञ और अन्य संबंधित अधिकारी शामिल थे। बचाव पक्ष की ओर से एक गवाह पेश किया गया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने, डिजिटल साक्ष्यों और दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद आरोपी को दोषी करार दिया।
अदालत ने क्यों सुनाई फांसी की सजा?
अदालत ने माना कि आरोपी ने एक पूरी तरह निर्दोष, असहाय और डेढ़ वर्षीय बच्चे की अत्यंत क्रूर तरीके से हत्या की। अपराध की प्रकृति, हत्या की बर्बरता, आरोपी की मंशा और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए अदालत ने इसे ऐसा मामला माना जिसमें कठोरतम दंड उचित है।
हालांकि विस्तृत निर्णय की प्रति में न्यायालय ने किन कानूनी आधारों पर इसे "रेयरेस्ट ऑफ द रेयर" माना, इसका पूरा विवरण निर्णय आदेश से ही स्पष्ट होगा। भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड केवल अत्यंत असाधारण मामलों में ही दिया जाता है।
41 दिनों में फैसला, बनी मिसाल
30 मई को हुई घटना के बाद पुलिस की त्वरित जांच, रिकॉर्ड समय में चार्जशीट दाखिल होना और अदालत में लगातार सुनवाई के चलते सिर्फ 41 दिनों में फैसला आ गया। आमतौर पर हत्या जैसे गंभीर मामलों में सुनवाई महीनों या वर्षों तक चलती है, ऐसे में इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया की गति विशेष रूप से चर्चा का विषय बनी हुई है।
प्रशासन ने की थी विशेष निगरानी
जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने मामले की नियमित समीक्षा की। अधिकारियों ने जांच टीम को सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए ताकि साक्ष्य समय पर एकत्र किए जा सकें और अभियोजन पक्ष अदालत में मजबूत पैरवी कर सके। अभियोजन पक्ष का कहना है कि मजबूत डिजिटल साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और वैज्ञानिक जांच के कारण आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे सिद्ध हुए।
भारतीय कानून में मृत्युदंड की प्रक्रिया
जिला अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद भी सजा तत्काल लागू नहीं होती। दंड प्रक्रिया के अनुसार जिला अदालत के मृत्युदंड के आदेश की पुष्टि संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा किया जाना अनिवार्य है। इसके बाद दोषी के पास उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने तथा अंत में राज्यपाल और राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने का संवैधानिक अधिकार भी होता है। इन सभी कानूनी प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही मृत्युदंड के क्रियान्वयन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
मामले की प्रमुख बातें
घटना की तारीख: 30 मई 2026
स्थान: यादव कॉलोनी, शिकोहाबाद, फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश)
पीड़ित: डेढ़ वर्षीय मासूम आरव
दोषी: विराज उर्फ जितेंद्र पाठक (रिश्ते का फुफेरा देवर)
मकसद (पुलिस के अनुसार): शादी का प्रस्ताव ठुकराए जाने की रंजिश
गिरफ्तारी: घटना के लगभग 6 घंटे के भीतर
चार्जशीट: 6 दिनों में दाखिल
अभियोजन गवाह: 13
निर्णय: 41 दिनों में
सजा: मृत्युदंड (फांसी), जिसकी पुष्टि उच्च न्यायालय से होना अभी शेष है।
नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध न्यायालयी जानकारी, पुलिस जांच और सार्वजनिक रूप से प्रकाशित तथ्यों पर आधारित है। दोषी को मृत्युदंड सुनाया गया है, लेकिन भारतीय कानून के अनुसार इस सजा के प्रभावी होने से पहले संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा इसकी पुष्टि तथा आगे की अपीलीय प्रक्रियाएं पूरी होना आवश्यक है।
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