30 साल बाद 1996 श्रीनगर हिंसा केस में बड़ा मोड़: NIA ने शब्बीर शाह समेत 6 हुर्रियत नेताओं के खिलाफ दाखिल की चार्जशीट, अदालत में पेश किए विस्तृत साक्ष्य
करीब तीन दशक पुराने 1996 श्रीनगर हिंसा मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने बड़ी कानूनी कार्रवाई करते हुए हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के छह वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ विशेष अदालत में विस्तृत चार्जशीट दाखिल की है। यह मामला 17 जुलाई 1996 को श्रीनगर में निकली एक अंतिम यात्रा के दौरान हुई हिंसा, पुलिस पर हमले, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और कथित तौर पर अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देने से जुड़ा है।
एनआईए ने जम्मू स्थित विशेष NIA अदालत में दाखिल आरोपपत्र में कहा है कि जांच के दौरान एकत्र किए गए दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और अन्य तकनीकी प्रमाण इस ओर संकेत करते हैं कि यह हिंसा स्वतःस्फूर्त नहीं थी, बल्कि कथित रूप से पूर्व नियोजित आपराधिक साजिश का हिस्सा थी। एजेंसी का दावा है कि अंतिम यात्रा को राजनीतिक और अलगाववादी संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया गया तथा भीड़ को सुरक्षा बलों के खिलाफ उकसाया गया।
हालांकि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि चार्जशीट किसी व्यक्ति के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं होती। भारतीय कानून के अनुसार आरोपित तब तक निर्दोष माने जाते हैं, जब तक अदालत उन्हें दोषी करार नहीं देती।
किन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई?
NIA द्वारा दायर चार्जशीट में जिन छह नेताओं के नाम शामिल हैं, वे हैं—
शब्बीर अहमद शाह
सैयद अली शाह गिलानी
अब्दुल गनी लोन
मोहम्मद याकूब वकील (उर्फ मोहम्मद याकूब वकील)
जावेद अहमद मीर
शकील अहमद बख्शी
इन नेताओं पर तत्कालीन रणबीर दंड संहिता (Ranbir Penal Code - RPC) की विभिन्न धाराओं के तहत गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें आपराधिक साजिश, हत्या का प्रयास, दंगा, सरकारी कर्मचारी पर हमला और सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने जैसे आरोप शामिल हैं। इसके अलावा गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 की धारा 13 के तहत भी आरोप लगाए गए हैं।
क्या था 17 जुलाई 1996 का पूरा घटनाक्रम?
एनआईए के अनुसार यह मामला 17 जुलाई 1996 का है, जब श्रीनगर के नाज़ क्रॉसिंग इलाके में मारे गए आतंकी हिलाल अहमद बेग की अंतिम यात्रा निकाली गई थी।
जांच एजेंसी का आरोप है कि इस जनाजे में हजारों लोग शामिल हुए थे और भीड़ के बीच हथियारबंद आतंकवादी भी मौजूद थे।
एजेंसी के अनुसार—
अंतिम यात्रा के दौरान सुरक्षा बलों पर अचानक फायरिंग की गई।
पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर भारी पथराव हुआ।
कई सरकारी वाहनों को क्षतिग्रस्त किया गया।
सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया।
कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
पूरे इलाके में लंबे समय तक तनावपूर्ण स्थिति बनी रही।
एनआईए का कहना है कि यह हिंसा आकस्मिक नहीं थी बल्कि पहले से बनाई गई रणनीति के तहत अंजाम दी गई।
जांच में क्या-क्या सामने आया?
एनआईए ने चार्जशीट में दावा किया है कि विस्तृत जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए।
जांच एजेंसी के अनुसार—
अंतिम यात्रा का उपयोग अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किया गया।
भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए गए।
कथित रूप से भीड़ को उकसाने वाले भाषण दिए गए।
सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई का माहौल बनाया गया।
धार्मिक और राजनीतिक भावनाओं का इस्तेमाल कर बड़ी भीड़ को संगठित किया गया।
एनआईए का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि पूरी घटना केवल एक अंतिम यात्रा नहीं बल्कि कथित रूप से सुनियोजित राजनीतिक और हिंसक गतिविधि का हिस्सा थी।
तीन नेताओं का निधन, फिर भी चार्जशीट में क्यों शामिल?
चार्जशीट में शामिल छह नेताओं में से तीन—सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन और मोहम्मद याकूब वकील—का निधन हो चुका है।
कानूनी प्रक्रिया के अनुसार मृत व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा आगे नहीं बढ़ाया जाता, लेकिन एनआईए ने उनके कथित रोल और उपलब्ध साक्ष्यों का उल्लेख चार्जशीट में किया है ताकि अदालत के समक्ष पूरे घटनाक्रम की श्रृंखला प्रस्तुत की जा सके।
किन धाराओं के तहत लगाए गए आरोप?
चार्जशीट में तत्कालीन रणबीर दंड संहिता (RPC) की कई धाराएं लगाई गई हैं, जिनमें प्रमुख रूप से—
आपराधिक साजिश
हत्या का प्रयास
दंगा
सरकारी कर्मचारी पर हमला
गैरकानूनी जमावड़ा
सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान
के साथ-साथ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 13 भी शामिल है।
30 साल बाद NIA ने जांच क्यों शुरू की?
यह मामला मूल रूप से 17 जुलाई 1996 को श्रीनगर के शेरगढ़ी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर पर आधारित था।
घटनाक्रम की टाइमलाइन
17 जुलाई 1996
हिंसा के तुरंत बाद शेरगढ़ी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज।
1996–2025
मामला विभिन्न स्तरों पर लंबित रहा।
अप्रैल 2026
केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने मामले की जांच अपने हाथ में ली।
जुलाई 2026
विस्तृत जांच पूरी होने के बाद विशेष NIA अदालत, जम्मू में चार्जशीट दाखिल की गई।
NIA ने जांच में किन पहलुओं पर काम किया?
जांच एजेंसी ने कथित तौर पर—
पुराने पुलिस रिकॉर्ड का अध्ययन किया।
केस डायरी और एफआईआर का विश्लेषण किया।
गवाहों के बयान दर्ज किए।
उपलब्ध वीडियो, फोटोग्राफ और दस्तावेजों की समीक्षा की।
सुरक्षा एजेंसियों के रिकॉर्ड और खुफिया सूचनाओं का परीक्षण किया।
उस समय की परिस्थितियों और घटनाओं का पुनर्निर्माण किया।
इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर चार्जशीट तैयार की गई।
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस क्या है?
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर के कई राजनीतिक और अलगाववादी संगठनों का एक गठबंधन रहा है, जिसका गठन 1993 में हुआ था। समय के साथ इसमें कई गुट बने और विभिन्न नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद भी सामने आए।
भारत सरकार लंबे समय से हुर्रियत के कुछ नेताओं और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियों की जांच करती रही है। बीते वर्षों में आतंकवादी फंडिंग, अलगाववाद और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े कई मामलों में भी जांच एजेंसियों ने कार्रवाई की है।
कानूनी प्रक्रिया अब कैसे आगे बढ़ेगी?
चार्जशीट दाखिल होने के बाद अब विशेष NIA अदालत उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करेगी।
इसके बाद अदालत—
आरोपपत्र पर संज्ञान लेगी।
अभियुक्तों को समन जारी कर सकती है।
आरोप तय करने की प्रक्रिया शुरू होगी।
अभियोजन और बचाव पक्ष अपने-अपने साक्ष्य पेश करेंगे।
गवाहों की जिरह होगी।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत अंतिम निर्णय देगी।
यदि जांच के दौरान नए साक्ष्य सामने आते हैं, तो NIA पूरक चार्जशीट (Supplementary Chargesheet) भी दाखिल कर सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
विशेषज्ञों का मानना है कि 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद अपने चरम पर था। उस दौरान हुई कई घटनाओं की जांच वर्षों तक अधूरी रही या लंबित रही।
ऐसे में 30 साल पुराने इस मामले में चार्जशीट दाखिल होना केवल एक कानूनी कार्रवाई नहीं बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं की न्यायिक समीक्षा का भी हिस्सा माना जा रहा है। यह कार्रवाई यह भी संकेत देती है कि सुरक्षा एजेंसियां पुराने मामलों में भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ा रही हैं।
निष्कर्ष
1996 श्रीनगर हिंसा मामले में NIA द्वारा छह हुर्रियत नेताओं के खिलाफ चार्जशीट दाखिल किया जाना जम्मू-कश्मीर से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रमों में से एक माना जा रहा है। जांच एजेंसी ने इस घटना को सुनियोजित साजिश बताते हुए विस्तृत साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए हैं। अब इस मामले का भविष्य न्यायालय की सुनवाई, उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर निर्भर करेगा। भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुसार अंतिम निर्णय आने तक सभी आरोप केवल आरोप हैं और उनका परीक्षण अदालत में होना बाकी है।
news desk MPcg