सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बढ़ी बेचैनी, वैश्विक मंच से भारत के फैसले पर उठाए सवाल; जल संकट और क्षेत्रीय स्थिरता पर जताई चिंता

सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बढ़ी बेचैनी, वैश्विक मंच से भारत के फैसले पर उठाए सवाल; जल संकट और क्षेत्रीय स्थिरता पर जताई चिंता

भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को निलंबित किए जाने के बाद पाकिस्तान ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपनी चिंता जाहिर की है। इस्लामाबाद में आयोजित एक सेमिनार के दौरान पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री इशाक डार, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के नेता बिलावल भुट्टो जरदारी और पेट्रोलियम मंत्री मुसादिक मलिक ने संधि को लेकर अपने-अपने विचार रखे। तीनों नेताओं ने जल संसाधनों को लेकर क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देते हुए भारत के फैसले पर सवाल उठाए।

हालांकि, भारत सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि सीमा पार आतंकवाद को लेकर उसकी चिंताओं और परिस्थितियों में आए बदलाव के कारण संधि को निलंबित करने का निर्णय लिया गया है। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय और ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक संधि की स्थिति में बदलाव की संभावना नहीं है।

इस्लामाबाद में आयोजित सेमिनार में उठा सिंधु जल संधि का मुद्दा

इस्लामाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में पाकिस्तान के वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों ने सिंधु जल संधि के भविष्य पर चर्चा की। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि यह संधि केवल जल बंटवारे का समझौता नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण ढांचा रही है।

पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री इशाक डार ने कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि को एकतरफा समाप्त या निलंबित करना उचित नहीं है, यदि उसमें ऐसा प्रावधान न हो। उन्होंने यह भी कहा कि जल संसाधनों का उपयोग राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

पाकिस्तान ने जल सुरक्षा को बताया बड़ा मुद्दा

कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान के नेताओं ने कहा कि देश की कृषि, पेयजल और ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। उनका तर्क था कि यदि जल प्रवाह प्रभावित होता है तो इसका असर कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

पाकिस्तानी नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मुद्दे पर ध्यान देने की अपील की और कहा कि जल संसाधनों से जुड़े विवादों का समाधान संवाद और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के दायरे में होना चाहिए।

बिलावल भुट्टो ने भी रखा पक्ष

पीपीपी नेता बिलावल भुट्टो जरदारी ने अपने संबोधन में कहा कि पाकिस्तान अपने जल अधिकारों को लेकर गंभीर है और इस विषय को राष्ट्रीय हित से जुड़ा मानता है। उन्होंने कहा कि पानी को राजनीतिक या रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े क्षेत्रों की बड़ी आबादी इस जल पर निर्भर है और किसी भी बदलाव का सीधा प्रभाव करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ सकता है।

मुसादिक मलिक ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का किया उल्लेख

पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री मुसादिक मलिक ने अपने संबोधन में कहा कि सिंधु जल संधि दशकों से दोनों देशों के बीच लागू रही है और इसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जाता रहा है।

उन्होंने तर्क दिया कि यदि ऐसे दीर्घकालिक समझौतों की निरंतरता प्रभावित होती है, तो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संधियों की विश्वसनीयता पर भी व्यापक चर्चा हो सकती है।

भारत का क्या है रुख?

भारत ने पहले ही स्पष्ट किया है कि सिंधु जल संधि को निलंबित करने का निर्णय सुरक्षा चिंताओं और सीमा पार आतंकवाद के संदर्भ में लिया गया है।

संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वथनेनी ने कहा था कि भारत ने यह कदम लंबे समय से जारी आतंकवाद और द्विपक्षीय संवाद में अपेक्षित प्रगति न होने के कारण उठाया है। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के समर्थन को रोकने के लिए विश्वसनीय और ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि निलंबित रहेगी।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़ा तनाव

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद काफी बढ़ गया था। इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी।

इसके बाद भारत ने कई कूटनीतिक और रणनीतिक कदम उठाए, जिनमें सिंधु जल संधि को निलंबित करना भी शामिल था। दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों में कमी, सीमा पार गतिविधियों पर नियंत्रण और व्यापारिक प्रतिबंध जैसे कई निर्णय भी लिए गए।

क्या है सिंधु जल संधि?

सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल के उपयोग का ढांचा तय किया गया था।

भारत को पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज—के जल उपयोग का अधिकार मिला।
पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—का अधिकांश जल उपयोग करने का अधिकार दिया गया।

यह संधि कई दशकों तक दोनों देशों के बीच लागू रही और विभिन्न संघर्षों के बावजूद प्रभावी बनी रही।

आगे क्या?

सिंधु जल संधि को लेकर दोनों देशों के रुख फिलहाल अलग-अलग बने हुए हैं। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत अपने सुरक्षा हितों और आतंकवाद विरोधी नीति को प्राथमिकता दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जल सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय संबंधों के मद्देनजर यह मुद्दा आने वाले समय में भी भारत-पाकिस्तान संबंधों के प्रमुख विषयों में शामिल रहेगा।