'40 साल का तनाव खत्म होना चाहिए': भारत-पाक रिश्तों पर उमर अब्दुल्ला की अपील, संवाद की वकालत; 117 भारतीय-पाकिस्तानी हस्तियों के संयुक्त पत्र से फिर तेज हुई बहस
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों को लेकर एक बार फिर संवाद और बेहतर रिश्तों की आवश्यकता पर जोर दिया है। गुरुवार को श्रीनगर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच पिछले 30 से 40 वर्षों से तनाव का माहौल बना हुआ है और अब समय आ गया है कि स्थायी शांति और सामान्य संबंधों की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब भारत और पाकिस्तान के 117 पूर्व राजनयिकों, नौकरशाहों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी हस्तियों ने दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों—नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ—को संयुक्त पत्र लिखकर संवाद बहाल करने तथा दक्षिण एशिया में शांति और सहयोग का वातावरण बनाने की अपील की है।
हालांकि, भारत सरकार की पाकिस्तान नीति में किसी बदलाव का कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है और इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से फिलहाल कोई नई घोषणा नहीं की गई है।
उमर अब्दुल्ला ने क्या कहा?
पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव कोई हालिया घटना नहीं है, बल्कि यह पिछले तीन से चार दशकों से लगातार बना हुआ है। उन्होंने कहा कि समय-समय पर विभिन्न घटनाओं के कारण दोनों देशों के संबंध और अधिक जटिल हुए हैं।
उन्होंने कहा कि यदि समाज के विभिन्न वर्गों के लोग, पूर्व अधिकारी या सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रतिष्ठित नागरिक दोनों देशों के बीच संवाद और बेहतर संबंधों की अपील करते हैं, तो इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि पड़ोसी देशों के बीच स्थायी शांति केवल सैन्य या राजनीतिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों, सीमावर्ती क्षेत्रों, व्यापार, पर्यटन और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
प्रधानमंत्री को लिखे गए संयुक्त पत्र का जिक्र
उमर अब्दुल्ला ने उस संयुक्त पत्र का भी उल्लेख किया, जिस पर भारत और पाकिस्तान की कुल 117 हस्तियों ने हस्ताक्षर किए हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पत्र में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों से अपील की गई है कि वे संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए सकारात्मक कदम उठाएं।
पत्र पर भारत की ओर से 61 तथा पाकिस्तान की ओर से 56 हस्ताक्षरकर्ताओं ने समर्थन दिया है। इनमें पूर्व राजनयिक, सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों की सार्वजनिक हस्तियां शामिल हैं।
भारतीय हस्ताक्षरकर्ताओं में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, राज्यसभा सांसद मनोज झा सहित कई प्रमुख नाम शामिल बताए गए हैं। पाकिस्तान की ओर से पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी समेत कई पूर्व अधिकारी और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग इस पहल का हिस्सा हैं।
यह पत्र किसी सरकारी पहल का हिस्सा नहीं है, बल्कि नागरिक समाज और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों द्वारा की गई स्वतंत्र अपील है।
RSS प्रमुख के बयान का हवाला
उमर अब्दुल्ला ने अपने बयान में RSS प्रमुख मोहन भागवत के हालिया सार्वजनिक वक्तव्य का भी उल्लेख किया, जिसमें भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत और बेहतर संबंधों की आवश्यकता की बात कही गई थी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जब विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोग भी संवाद की आवश्यकता पर जोर देते हैं, तो इस विषय पर व्यापक और गंभीर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस प्रकार की बात कोई राष्ट्रीय संगठन कहता है तो सामान्यतः उस पर विवाद नहीं होता, लेकिन जम्मू-कश्मीर के नेताओं द्वारा ऐसी बात कहे जाने पर अक्सर राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।
अटल बिहारी वाजपेयी की विदेश नीति का उल्लेख
अपने बयान के दौरान उमर अब्दुल्ला ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस प्रसिद्ध कथन का भी उल्लेख किया कि "दोस्त बदले जा सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं।"
उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान भौगोलिक रूप से स्थायी पड़ोसी हैं, इसलिए दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं होने चाहिए। हालांकि उन्होंने यह नहीं कहा कि सुरक्षा संबंधी मुद्दों की अनदेखी की जाए, बल्कि उन्होंने बेहतर संबंधों की दिशा में प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
भारत की आधिकारिक नीति क्या है?
भारत सरकार पिछले कई वर्षों से स्पष्ट रूप से कहती रही है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी सार्थक द्विपक्षीय वार्ता के लिए आतंकवाद और हिंसा से मुक्त वातावरण आवश्यक है। नई दिल्ली का लगातार यह रुख रहा है कि सीमा पार आतंकवाद समाप्त किए बिना संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाना कठिन है।
इसलिए भारत-पाक संबंधों में किसी भी संभावित बदलाव का निर्णय केवल केंद्र सरकार, विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संस्थानों द्वारा ही लिया जाता है। किसी राज्य सरकार या राजनीतिक नेता का बयान भारत की आधिकारिक विदेश नीति का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
भारत-पाक संबंधों की पृष्ठभूमि
भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध स्वतंत्रता के बाद से कई उतार-चढ़ाव से गुजरे हैं। दोनों देशों के बीच युद्ध, सीमा विवाद, आतंकवादी घटनाएं, नियंत्रण रेखा (LoC) पर तनाव, कूटनीतिक मतभेद और व्यापारिक प्रतिबंध समय-समय पर संबंधों को प्रभावित करते रहे हैं।
दूसरी ओर, दोनों देशों ने विभिन्न समय पर शांति वार्ता, संघर्षविराम समझौते, बस और रेल सेवाओं की शुरुआत, व्यापारिक संपर्क तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे विश्वास बहाली के प्रयास भी किए हैं। हालांकि सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के कारण ये पहल अक्सर बाधित होती रही हैं।
जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में बयान का महत्व
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री होने के कारण उमर अब्दुल्ला की टिप्पणी को सामान्य राजनीतिक बयान से अलग संदर्भ में देखा जाता है। जम्मू-कश्मीर नियंत्रण रेखा से जुड़ा सीमावर्ती क्षेत्र है, जहां सुरक्षा, पर्यटन, व्यापार, नागरिक जीवन और विकास पर भारत-पाक संबंधों का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
इसी कारण राज्य के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा शांति और संवाद की बात किए जाने पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा होती है। हालांकि किसी भी नीति परिवर्तन का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
आगे क्या?
फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से उमर अब्दुल्ला की टिप्पणी या 117 हस्तियों के संयुक्त पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। आने वाले दिनों में यदि विदेश मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से कोई बयान जारी किया जाता है, तो उससे इस विषय पर सरकार का आधिकारिक दृष्टिकोण और स्पष्ट होगा।
फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-पाक संबंधों में किसी भी प्रकार की प्रगति सुरक्षा, आतंकवाद, सीमा प्रबंधन और द्विपक्षीय विश्वास बहाली जैसे कई जटिल कारकों पर निर्भर करेगी।
news desk MPcg