OTT से हटी 'सतलुज (Punjab 95)' पर बढ़ा विवाद: दिलजीत दोसांझ ने जताया विरोध, पंजाब के इतिहास, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर छिड़ी नई बहस

OTT से हटी 'सतलुज (Punjab 95)' पर बढ़ा विवाद: दिलजीत दोसांझ ने जताया विरोध, पंजाब के इतिहास, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर छिड़ी नई बहस

अभिनेता एवं गायक दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म 'सतलुज (Punjab 95)' एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है। भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने के महज दो दिन बाद फिल्म को हटाए जाने के बाद पंजाब में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बहस तेज हो गई है। एक ओर फिल्म के समर्थक इसे मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष और पंजाब के एक संवेदनशील दौर को सामने लाने वाली महत्वपूर्ण फिल्म बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि फिल्म आतंकवाद के दौर की घटनाओं को एकतरफा नजरिए से प्रस्तुत करती है।

फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ ने सोशल मीडिया पर लाइव आकर अपनी प्रतिक्रिया दी, जबकि विभिन्न राजनीतिक नेताओं, पूर्व सैन्य अधिकारियों और पूर्व पुलिस अधिकारियों ने भी इस मुद्दे पर अलग-अलग पक्ष रखे हैं।

रिलीज के दो दिन बाद भारत में OTT से हटाई गई फिल्म

लंबे समय तक सेंसर और रिलीज संबंधी प्रक्रियाओं में फंसी रहने के बाद फिल्म भारत में एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराई गई थी। हालांकि, रिलीज के केवल दो दिन बाद इसे भारतीय दर्शकों के लिए प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

फिल्म हटने के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई और कई लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बताया, जबकि अन्य लोगों ने इसके कंटेंट पर सवाल उठाए।

फिल्म को हटाए जाने के पीछे संबंधित प्लेटफॉर्म या अधिकारियों की ओर से सार्वजनिक रूप से विस्तृत आधिकारिक कारण सामने नहीं आए हैं।

दिलजीत दोसांझ ने लाइव आकर जताया विरोध

फिल्म हटाए जाने के बाद अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने लाइव प्रसारण के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से आशंका थी कि फिल्म पर कार्रवाई हो सकती है। उनके अनुसार उन्हें उम्मीद थी कि सप्ताहांत के बाद किसी कार्यदिवस पर ऐसा निर्णय लिया जाएगा, लेकिन फिल्म रविवार शाम को ही हटा दी गई।

दिलजीत ने यह भी कहा कि फिल्म के भविष्य को लेकर अनिश्चितता के कारण उसका प्रचार-प्रसार भी सीमित रहा। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि इंटरनेट पर एक बार उपलब्ध हुई सामग्री को पूरी तरह हटाना संभव नहीं होता और लोगों तक फिल्म विभिन्न माध्यमों से पहुंच चुकी है।

किस पर आधारित है फिल्म?

'सतलुज (Punjab 95)' मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष से प्रेरित बताई जाती है।

जसवंत सिंह खालड़ा 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों को उजागर करने के लिए जाने जाते हैं।

फिल्म में उस दौर की परिस्थितियों, पुलिस अधिकारियों तथा मानवाधिकार संबंधी मुद्दों को कहानी के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसी विषयवस्तु को लेकर फिल्म लगातार चर्चा और विवाद का केंद्र बनी हुई है।

राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने किया समर्थन

पंजाब से राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर फिल्म का समर्थन किया।

उन्होंने कहा कि फिल्म पंजाब के इतिहास के उस कठिन दौर की याद दिलाती है, जब आतंकवाद और उसके खिलाफ कार्रवाई के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप सामने आए थे।

साहनी ने अपने बयान में कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा ने कथित फर्जी मुठभेड़ों और बिना पहचान वाले शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े रिकॉर्ड जुटाने का कार्य किया था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा न्यायिक कार्यवाहियों में इन मामलों पर सुनवाई हुई थी।

हालांकि, उन्होंने जो व्यापक आंकड़े साझा किए, वे उनके सार्वजनिक दावों का हिस्सा हैं और अलग-अलग ऐतिहासिक तथा कानूनी संदर्भों में इन पर वर्षों से बहस होती रही है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायिक संदर्भ

फिल्म के समर्थन में दिए जा रहे तर्कों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की उन कार्यवाहियों का भी उल्लेख किया जा रहा है, जिनमें पंजाब में कथित अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों की जांच हुई थी।

इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णयों में जसवंत सिंह खालड़ा के कार्यों और उनके योगदान का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन न्यायिक टिप्पणियों का संदर्भ विशिष्ट मामलों से जुड़ा रहा है और उन्हें व्यापक ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाता।

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ढिल्लों ने भी की सराहना

भारतीय सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ढिल्लों (सेवानिवृत्त) ने भी फिल्म का समर्थन करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि यह अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाले एक व्यक्ति की प्रभावशाली कहानी प्रस्तुत करती है।

उन्होंने फिल्म देखने की अपील करते हुए दिलजीत दोसांझ और अभिनेता अर्जुन रामपाल के अभिनय की सराहना की।

शिरोमणि अकाली दल ने भी उठाए सवाल

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भारत में फिल्म हटाए जाने पर आपत्ति जताई।

उन्होंने कहा कि यह फिल्म पंजाब के इतिहास के एक संवेदनशील अध्याय को सामने लाती है और इसे हटाना केवल सेंसरशिप का मामला नहीं बल्कि इतिहास, स्मृति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा प्रश्न भी है।

उन्होंने यह भी कहा कि समाज को अपने अतीत पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए।

पूर्व पुलिस अधिकारियों का अलग पक्ष

वहीं, पंजाब पुलिस के कई पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने फिल्म को लेकर अलग दृष्टिकोण सामने रखा है।

उनका कहना है कि 1980 और 1990 का दशक पंजाब के लिए अत्यंत कठिन समय था, जब राज्य गंभीर आतंकवाद से जूझ रहा था। उनके अनुसार उस दौर में हजारों नागरिक, पुलिसकर्मी और सुरक्षा बलों के जवान आतंकवादी हिंसा में मारे गए थे।

पूर्व अधिकारियों का तर्क है कि उस समय की परिस्थितियों को समझे बिना केवल एक पक्ष को केंद्र में रखकर घटनाओं का चित्रण करना ऐतिहासिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

मानवाधिकार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की बहस

फिल्म को लेकर छिड़ी बहस अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है।

एक पक्ष का कहना है कि लोकतंत्र में ऐतिहासिक घटनाओं, मानवाधिकारों और न्याय से जुड़े विषयों पर फिल्में बनना और उन्हें देखने का अधिकार सुरक्षित होना चाहिए।

दूसरी ओर, कुछ लोगों का मानना है कि आतंकवाद से जुड़े दौर को प्रस्तुत करते समय सुरक्षा बलों की भूमिका, उस समय की वास्तविक परिस्थितियों और हजारों आतंकवादी हमलों में मारे गए निर्दोष लोगों को भी समान महत्व मिलना चाहिए।

विवाद अभी जारी

फिल्म के भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद यह मामला राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। अभी तक इस विषय पर कोई अंतिम आधिकारिक समाधान सामने नहीं आया है।

फिलहाल, 'सतलुज (Punjab 95)' को लेकर बहस दो प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित है—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पंजाब के आतंकवाद प्रभावित इतिहास की व्याख्या। आने वाले दिनों में संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाओं और किसी भी आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद इस विवाद की दिशा और स्पष्ट हो सकती है।