जून में थोक महंगाई 44 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंची, WPI 9.81% पर; खाने-पीने और रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़े
देश में महंगाई को लेकर आम लोगों की चिंता बढ़ाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। जून 2026 में थोक महंगाई दर (Wholesale Price Index - WPI) बढ़कर 9.81 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यह पिछले करीब 44 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से मंगलवार, 14 जुलाई को जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, मई 2026 में थोक महंगाई दर 9.68 प्रतिशत थी, जो जून में बढ़कर 9.81 प्रतिशत हो गई।
इससे पहले सितंबर 2022 में थोक महंगाई दर 10.70 प्रतिशत दर्ज की गई थी। जून 2026 का स्तर उसके बाद सबसे ज्यादा है। महंगाई बढ़ने की मुख्य वजह खाने-पीने की वस्तुओं और रोजमर्रा की जरूरत के सामानों की कीमतों में तेजी को माना जा रहा है।
खाने-पीने की चीजों में बढ़ी महंगाई
जून महीने में प्राथमिक वस्तुओं (Primary Articles) की महंगाई दर में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इन वस्तुओं में मुख्य रूप से खाद्य पदार्थ, कच्चा माल और प्राकृतिक संसाधन शामिल होते हैं।
आंकड़ों के अनुसार:
प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई दर मई के 4.99 प्रतिशत से बढ़कर जून में 7 प्रतिशत हो गई।
फूड इंडेक्स की महंगाई दर 4.49 प्रतिशत से बढ़कर 6.14 प्रतिशत पर पहुंच गई।
फ्यूल और पावर सेक्टर की महंगाई दर हालांकि 30.33 प्रतिशत से घटकर 27.41 प्रतिशत रही।
मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की महंगाई दर में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ और यह 7.48 प्रतिशत पर बनी रही।
महंगाई बढ़ने का सीधा असर आम लोगों के घरेलू बजट पर पड़ सकता है, क्योंकि खाद्य पदार्थ और दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी होने से खर्च बढ़ जाता है।
अंतरराष्ट्रीय तनाव से बढ़ सकती है परेशानी
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर चल रहे तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर आने वाले समय में महंगाई पर पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव यदि लंबे समय तक बना रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर ईंधन, परिवहन लागत और कई अन्य उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है।
थोक महंगाई के तीन बड़े हिस्से
भारत में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) को मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बांटा जाता है:
1. प्राथमिक वस्तुएं (Primary Articles)
इनका WPI में करीब 22.62 प्रतिशत भार होता है। इसमें शामिल हैं:
खाद्य पदार्थ
अनाज
सब्जियां
तेल बीज
खनिज
कच्चा पेट्रोलियम
2. ईंधन और बिजली (Fuel & Power)
इसका भार करीब 13.15 प्रतिशत है। इसमें पेट्रोलियम उत्पाद, गैस और बिजली शामिल हैं।
3. मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स
यह WPI का सबसे बड़ा हिस्सा है, जिसका भार करीब 64.23 प्रतिशत है। इसमें धातु, रसायन, प्लास्टिक, रबर और अन्य औद्योगिक उत्पाद आते हैं।
आम आदमी पर कैसे पड़ता है असर?
थोक महंगाई बढ़ने का असर तुरंत आम उपभोक्ता पर नहीं दिखता, लेकिन अगर लंबे समय तक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो कंपनियां अपनी लागत बढ़ने का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं।
उदाहरण के तौर पर अगर कच्चा माल, ईंधन या उत्पादन लागत बढ़ती है तो कंपनियां अपने उत्पादों के दाम बढ़ा सकती हैं। इससे बाजार में रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
सरकार महंगाई को नियंत्रित करने के लिए टैक्स में बदलाव, आयात नीति और अन्य आर्थिक उपायों का इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि, वैश्विक कीमतों पर सरकार का नियंत्रण सीमित होता है।
रिटेल महंगाई भी लगातार छठे महीने बढ़ी
थोक महंगाई के साथ-साथ खुदरा महंगाई (Retail Inflation) में भी लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
जून 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई है। यह जनवरी 2026 में 2.74 प्रतिशत थी। मई 2026 में यह 3.93 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
इस तरह जनवरी से जून तक लगातार छठे महीने खुदरा महंगाई में वृद्धि हुई है।
खाने-पीने की वस्तुओं, खासकर आलू, अदरक और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी को इसके पीछे बड़ी वजह माना जा रहा है।
WPI और CPI में क्या अंतर है?
भारत में महंगाई को मुख्य रूप से दो तरीकों से मापा जाता है:
थोक महंगाई (WPI)
यह उन कीमतों को मापती है जो थोक बाजार में कारोबारी स्तर पर होती हैं।
इसमें फैक्ट्री उत्पाद, कच्चा माल और थोक व्यापार की कीमतें शामिल होती हैं।
खुदरा महंगाई (CPI)
यह आम ग्राहकों द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों को दर्शाती है।
इसमें भोजन, आवास, ईंधन, कपड़े और अन्य घरेलू खर्च शामिल होते हैं।
आम लोगों पर सीधा असर खुदरा महंगाई का ज्यादा पड़ता है, क्योंकि यह बाजार में खरीदी जाने वाली चीजों की कीमतों को दर्शाती है।
आगे क्या असर हो सकता है?
अगर महंगाई का दबाव लगातार बना रहता है तो इसका असर ब्याज दरों, घरेलू खर्च और आर्थिक नीतियों पर पड़ सकता है। रिजर्व बैंक भी महंगाई के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए अपनी मौद्रिक नीति तय करता है।
फिलहाल जून के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। आने वाले महीनों में मानसून, उत्पादन, वैश्विक तेल कीमतें और अंतरराष्ट्रीय हालात महंगाई की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
news desk MPcg