भोपाल की निजी यूनिवर्सिटी में ड्रग्स नेटवर्क का बड़ा खुलासा: सुरक्षा गार्ड ही बने सप्लायर, राजस्थान से कैंपस तक पहुंच रही स्मैक; जांच में सामने आई चौंकाने वाली कड़ियां

भोपाल की निजी यूनिवर्सिटी में ड्रग्स नेटवर्क का बड़ा खुलासा: सुरक्षा गार्ड ही बने सप्लायर, राजस्थान से कैंपस तक पहुंच रही स्मैक; जांच में सामने आई चौंकाने वाली कड़ियां

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक निजी विश्वविद्यालय परिसर से जुड़े कथित ड्रग्स नेटवर्क को लेकर एक मीडिया जांच में गंभीर खुलासे सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय परिसर के आसपास स्मैक की सप्लाई का संगठित नेटवर्क सक्रिय है, जिसमें सुरक्षा गार्डों की कथित संलिप्तता भी सामने आई है। जांच में यह भी दावा किया गया है कि राजस्थान की सीमा से लगे क्षेत्रों से स्मैक की खेप मध्य प्रदेश पहुंचती है और फिर छोटे पैडलर्स के माध्यम से कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी के छात्रों तक पहुंचाई जाती है।

महत्वपूर्ण नोट: इस खबर में वर्णित आरोप एक मीडिया संस्थान की खोजी रिपोर्ट पर आधारित हैं। संबंधित विश्वविद्यालय, आरोपित व्यक्तियों, पुलिस या अन्य जांच एजेंसियों की ओर से इन आरोपों पर अंतिम पुष्टि या न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। इसलिए इन दावों को जांच के दायरे में माना जाना चाहिए।

एक महीने की पड़ताल में सामने आया कथित नेटवर्क

रिपोर्ट के अनुसार, करीब एक महीने तक चली जांच में टीम ने भोपाल के 11 मील बायपास स्थित एक निजी विश्वविद्यालय परिसर और उसके आसपास कथित ड्रग्स सप्लाई नेटवर्क की पड़ताल की। दावा किया गया कि विश्वविद्यालय के मुख्य गेट के आसपास स्थित ढाबों, दुकानों और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कुछ लोगों के जरिए छात्रों तक स्मैक पहुंचाई जा रही थी।

जांच में सबसे गंभीर आरोप यह सामने आया कि विश्वविद्यालय में तैनात कुछ सुरक्षा गार्ड कथित तौर पर ड्रग्स सप्लाई चेन का हिस्सा बने हुए हैं और बाहरी सप्लायरों से स्मैक लेकर छात्रों तक पहुंचाने का काम करते हैं।

ग्राहक बनकर पहुंची टीम, कथित तौर पर मिला ड्रग्स का ऑफर

जांच के दौरान रिपोर्टर ने खुद को ग्राहक बताकर विश्वविद्यालय परिसर के गेट पर मौजूद सुरक्षा कर्मियों से संपर्क किया। रिपोर्ट के अनुसार, एक गार्ड ने कथित तौर पर सीधे पूछा कि क्या उन्हें "दम" चाहिए। बातचीत के दौरान रिपोर्टर को कथित रूप से बताया गया कि जरूरत पड़ने पर यहीं संपर्क किया जा सकता है और मोबाइल फोन पर किसी प्रकार की डील नहीं की जाती।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सुरक्षा कर्मी ने आगे चलकर कथित सप्लायर से मुलाकात कराने का भी आश्वासन दिया।

सुरक्षा सुपरवाइजर से कथित सौदेबाजी

अगले दिन टीम विश्वविद्यालय के दूसरे गेट पर पहुंची, जहां कथित तौर पर सुरक्षा सुपरवाइजर से मुलाकात हुई। रिपोर्ट के अनुसार, पहले रिपोर्टर की पहचान की पुष्टि की गई और उसके बाद कथित रूप से स्मैक उपलब्ध कराने पर बातचीत शुरू हुई।

दावे के मुताबिक, रिपोर्टर को प्रति "टोकन" निश्चित राशि बताई गई तथा कम मात्रा में बिक्री से इनकार करते हुए न्यूनतम दो टोकन लेने की शर्त रखी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके बाद एक अन्य सुरक्षा गार्ड को कथित रूप से माल लाने के लिए भेजा गया।

संदिग्ध गतिविधियों का पीछा करते हुए कथित सप्लायर तक पहुंची टीम

जांच के अगले चरण में रिपोर्टर ने कथित रूप से उस गार्ड का पीछा किया, जो विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर कटारा हिल्स क्षेत्र होते हुए गौरीशंकर परिसर पहुंचा। वहां उसकी कुछ युवकों से मुलाकात हुई और फिर वह वापस लौट आया।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसी कड़ी से जांच टीम कथित मुख्य सप्लायर तक पहुंचने में सफल रही।

राजस्थान से आने वाली सप्लाई का दावा

जांच में एक युवक के माध्यम से कथित मुख्य सप्लायर से संपर्क स्थापित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी ने दावा किया कि वह राजस्थान सीमा से सटे राजगढ़ जिले के गांवों से थोक में स्मैक मंगवाता है और भोपाल के विभिन्न इलाकों, विशेषकर हॉस्टल और विश्वविद्यालयों के आसपास इसकी सप्लाई करता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कथित सप्लायर कार और स्पोर्ट्स बाइक के जरिए होम डिलीवरी जैसी व्यवस्था भी संचालित करता है।

कीमत और कोड वर्ड का कथित खुलासा

जांच में यह दावा किया गया कि ड्रग्स नेटवर्क में स्मैक की छोटी पुड़िया को "टोकन" कहा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, एक ग्राम स्मैक से कई छोटी-छोटी पुड़ियां तैयार की जाती हैं और ग्राहकों के आधार पर अलग-अलग कीमत वसूली जाती है।

बताया गया कि पुराने ग्राहकों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर जबकि नए ग्राहकों से अधिक राशि ली जाती है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

पुलिस से बचने के लिए बदलते रहते हैं पैडलर्स

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कथित तस्कर पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए लगातार नए पैडलर्स को जोड़ते रहते हैं। जांच के दौरान यह भी सामने आने का दावा किया गया कि कई मामलों में ग्राहकों से नया सिम कार्ड लाने के लिए कहा जाता है ताकि संपर्क का कोई स्थायी रिकॉर्ड न बन सके।

इन दावों की भी स्वतंत्र जांच और पुलिस पुष्टि अभी शेष है।

नशा विरोधी अभियान से पहले सामने आया मामला

यह पूरा खुलासा ऐसे समय सामने आया है जब मध्य प्रदेश सरकार 15 जुलाई से 30 जुलाई 2026 तक "नशे से दूरी है जरूरी 2.0" अभियान शुरू करने जा रही है। इस अभियान के तहत स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों पर नशे के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम चलाने के साथ-साथ अवैध मादक पदार्थों के कारोबार पर कार्रवाई का दावा किया गया है।

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि जांच के दौरान संबंधित क्षेत्रों में पुलिस की सक्रिय मौजूदगी दिखाई नहीं दी। हालांकि, इस संबंध में पुलिस विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।

छात्रों को निशाना बनाए जाने की आशंका

यदि जांच में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल अवैध मादक पदार्थों की तस्करी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसर में सक्रिय ड्रग्स नेटवर्क युवाओं के भविष्य और कानून-व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती है।

पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर नजर

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित पुलिस, नारकोटिक्स एजेंसियां और प्रशासन इस मीडिया जांच का संज्ञान लेकर स्वतंत्र जांच शुरू करते हैं या नहीं। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो पूरे नेटवर्क में शामिल कथित सप्लायरों, पैडलर्स और अन्य सहयोगियों के खिलाफ एनडीपीएस अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।