MP किसान आंदोलन: 60% मूंग खरीदी के ऐलान के बाद भी क्यों था असंतोष? 4 लेयर बैरिकेडिंग तोड़ भोपाल पहुंचे किसान, जानिए पूरा विवाद और आगे क्या
मध्य प्रदेश में मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीदी और खाद वितरण की व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ किसान आंदोलन आखिरकार सरकार के बड़े फैसलों के बाद समाप्त हो गया। आंदोलन के दौरान किसानों ने भोपाल कूच किया, रास्ते में पुलिस की बैरिकेडिंग का सामना किया और राजधानी में पहुंचकर मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने की कोशिश की। कई जगह प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति भी बनी, लेकिन बड़े पैमाने पर बल प्रयोग से स्थिति को टाला गया।
बुधवार, 29 जुलाई को सरकार ने आंदोलनरत किसानों के साथ बातचीत के बाद मूंग खरीदी की सीमा को मौजूदा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर पात्र किसानों की उपज के 60 प्रतिशत तक करने की घोषणा की। इसके साथ ही खाद वितरण की ई-टोकन व्यवस्था को फिलहाल स्थगित करने और मूंग खरीदी व स्लॉट बुकिंग की समयसीमा बढ़ाने का फैसला किया गया।
सरकार के इन फैसलों के बाद आंदोलन समाप्त हो गया, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने कई बड़े सवाल खड़े किए—आखिर किसान 60 प्रतिशत खरीदी के ऐलान से पहले तक 100 प्रतिशत खरीदी की मांग पर क्यों अड़े थे? किसानों ने भोपाल में इतनी बड़ी संख्या में पहुंचकर प्रदर्शन क्यों किया? पुलिस ने बैरिकेडिंग टूटने के बाद भी व्यापक बल प्रयोग से परहेज क्यों किया? और क्या यह आंदोलन भविष्य में खाद, MSP और सरकारी खरीद की व्यवस्था को लेकर किसी बड़े किसान आंदोलन का आधार बन सकता है?
सबसे पहले समझिए पूरा मामला क्या था
इस आंदोलन की मुख्य मांग मूंग की 100 प्रतिशत उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर खरीदे जाने की थी। इसके अलावा किसान खाद वितरण में लागू ई-टोकन व्यवस्था को लेकर भी नाराज थे।
किसानों का कहना था कि यदि सरकार उनकी पूरी उपज MSP पर नहीं खरीदती है तो उन्हें बची हुई उपज खुले बाजार में कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। यही वजह रही कि आंदोलनकारी किसान केवल खरीद का प्रतिशत बढ़ाने की मांग नहीं कर रहे थे, बल्कि पूरी उपज की सरकारी खरीद की गारंटी चाहते थे।
27 जुलाई से किसानों के भोपाल कूच की गतिविधियां तेज हुईं। संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े किसानों के भोपाल पहुंचने की खबरों के बाद प्रशासन ने कई जगह सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई और बैरिकेडिंग की गई। औबेदुल्लागंज सहित कई स्थानों पर किसानों को रोकने की कोशिश हुई।
किसानों ने भोपाल में क्यों डाला डेरा?
किसानों की रणनीति केवल ज्ञापन देने तक सीमित नहीं थी। बड़ी संख्या में किसान भोपाल पहुंचकर मुख्यमंत्री आवास का घेराव करना चाहते थे।
नर्मदापुरम से किसानों के पैदल मार्च और वाहनों के जरिए राजधानी की तरफ बढ़ने की तस्वीरें सामने आईं। 27 जुलाई को करीब 2 हजार किसानों के सेठानी घाट से मुख्यमंत्री निवास तक मार्च की तैयारी की रिपोर्ट सामने आई थी।
कई किसानों ने आंदोलन के लिए कई दिनों का राशन भी साथ रखा। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में जरूरी सामान लेकर पहुंचने की तस्वीरों ने आंदोलन को व्यापक रूप दिया।
हालांकि इसे 2020-21 के दिल्ली किसान आंदोलन के समान बताने से पहले एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। दिल्ली का किसान आंदोलन तीन कृषि कानूनों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर का लंबा आंदोलन था, जबकि मध्य प्रदेश का मौजूदा आंदोलन मुख्य रूप से मूंग खरीदी, MSP और खाद वितरण जैसी राज्य-केंद्रित समस्याओं पर आधारित था।
4 लेयर बैरिकेडिंग क्यों लगाई गई?
किसानों के मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने की संभावना को देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने मार्गों पर बैरिकेडिंग की थी। कई जगह किसानों को रोकने की कोशिश की गई।
लेकिन भोपाल में एक समय प्रदर्शनकारी सुरक्षा घेरा पार करते हुए आगे बढ़ गए। चार स्तर की बैरिकेडिंग पार करने की तस्वीरों और वीडियो ने पूरे घटनाक्रम को चर्चा में ला दिया।
सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि अगर पुलिस ने इतने बड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे तो बैरिकेडिंग टूटने के बाद भी व्यापक लाठीचार्ज या अन्य कठोर बल प्रयोग क्यों नहीं किया गया?
इसका एक संभावित प्रशासनिक कारण यह माना जा सकता है कि पुलिस ने स्थिति को और उग्र होने से रोकने के लिए संयम बरता। हालांकि किसी विशेष कार्रवाई के पीछे अधिकारियों का आधिकारिक निर्णय या आदेश क्या था, इसे लेकर निष्कर्ष केवल प्रत्यक्ष आधिकारिक बयान के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
पुलिस ने बल प्रयोग क्यों नहीं किया?
किसी बड़े किसान प्रदर्शन में बल प्रयोग की स्थिति पैदा होने पर उसके राजनीतिक और सामाजिक असर को भी ध्यान में रखा जाता है।
भोपाल में किसान पहले ही बड़ी संख्या में पहुंच चुके थे। यदि बैरिकेडिंग टूटने के बाद बड़े पैमाने पर लाठीचार्ज या अन्य कार्रवाई होती तो स्थिति तेजी से तनावपूर्ण हो सकती थी।
प्रदर्शन के दौरान किसानों की ओर से पुलिस और सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी हुई। इसके बावजूद स्थिति को नियंत्रण में रखने की कोशिश की गई।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि बैरिकेडिंग टूटना और बल प्रयोग न होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि पुलिस ने जानबूझकर किसानों को प्रवेश दिया था। इसके लिए पुलिस की आधिकारिक ऑपरेशनल जानकारी या आदेश सामने आना जरूरी है।
सरकार ने क्या फैसला लिया?
29 जुलाई को सरकार ने किसान प्रतिनिधियों से बातचीत के बाद मूंग खरीदी और खाद वितरण को लेकर कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं।
1. मूंग खरीदी 25% से बढ़ाकर 60%
सबसे बड़ा फैसला पात्र किसानों से मूंग की उपज के 60 प्रतिशत तक सरकारी उपार्जन का था। इससे पहले खरीद का दायरा 25 प्रतिशत था।
सरकार का यह फैसला आंदोलन की सबसे प्रमुख मांगों में से एक पर बड़ी रियायत के तौर पर देखा गया।
2. ई-टोकन व्यवस्था फिलहाल स्थगित
खाद वितरण में ई-टोकन व्यवस्था को लेकर किसानों में लंबे समय से नाराजगी थी। सरकार ने तत्काल प्रभाव से इस व्यवस्था को फिलहाल स्थगित करने का निर्णय लिया।
इसका उद्देश्य खाद लेने में किसानों को आ रही व्यावहारिक परेशानियों को कम करना था।
3. स्लॉट बुकिंग की अवधि बढ़ाई
सरकार ने मूंग खरीदी के लिए स्लॉट बुकिंग की अवधि भी बढ़ाई। इससे किसानों को अपनी उपज सरकारी खरीद केंद्र तक पहुंचाने के लिए अतिरिक्त समय मिला।
रिपोर्टों के अनुसार खरीदी और स्लॉट बुकिंग की तारीखों को आगे बढ़ाने का फैसला भी पैकेज का हिस्सा था।
फिर सवाल—60% के बाद भी किसान पहले क्यों नाराज थे?
यह पूरे आंदोलन को समझने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
किसानों की मूल मांग 100 प्रतिशत खरीदी थी। इसलिए 25 से 60 प्रतिशत का बढ़ना उनके लिए राहत जरूर है, लेकिन यह उनकी मूल मांग के बराबर नहीं है।
यानी सरकार ने खरीद की सीमा में बड़ा इजाफा किया, लेकिन किसानों की मांग के अनुसार पूरी उपज खरीदने की गारंटी नहीं दी।
यहीं से 'प्रतिशत' और 'वास्तविक मात्रा' का सवाल सामने आता है।
किसानों का तर्क है कि उनके खेत में जितनी वास्तविक मूंग पैदा होती है, उसका बड़ा हिस्सा अगर सरकारी खरीद के दायरे से बाहर रह गया तो उन्हें बाजार में कम कीमत पर बेचने का जोखिम बना रहेगा।
इसी कारण आंदोलन के दौरान किसान 100 प्रतिशत खरीद की मांग पर जोर देते रहे।
क्या 60% का मतलब हर किसान की उपज का 60% है?
सरकारी घोषणा को इसी संदर्भ में समझना जरूरी है। सरकार ने पात्र किसान की उपज के 60 प्रतिशत तक उपार्जन की बात कही है। इसलिए इसे सीधे 'हर किसान को निश्चित इतने क्विंटल खरीद' के बराबर समझना सही नहीं होगा।
किसान संगठनों की आपत्ति मुख्य रूप से इस बात पर रही कि उनके उत्पादन और सरकारी खरीद की सीमा के बीच अंतर रहने पर बची हुई उपज का बाजार मूल्य उनके लिए चिंता का विषय बना रहेगा।
इसलिए आंदोलन की बहस केवल प्रतिशत की नहीं, बल्कि किसान की वास्तविक उपज, खरीद सीमा, MSP और खुले बाजार के भाव के बीच संबंध की भी है।
खाद का ई-टोकन किसानों के लिए इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना?
आंदोलन का दूसरा बड़ा मुद्दा खाद की उपलब्धता था।
ई-टोकन व्यवस्था के जरिए किसानों को खाद लेने के लिए पहले ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती थी। किसानों की शिकायत थी कि तकनीकी समस्या, स्लॉट उपलब्धता, इंटरनेट या पोर्टल से जुड़ी परेशानियों के कारण उन्हें समय पर खाद हासिल करने में मुश्किल होती है।
यही वजह है कि आंदोलन केवल मूंग खरीदी तक सीमित नहीं रहा। किसानों ने खाद वितरण व्यवस्था को भी अपनी मांगों में शामिल किया।
सरकार द्वारा ई-टोकन व्यवस्था को फिलहाल स्थगित करने का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे किसानों की रोजमर्रा की कृषि जरूरत से जुड़ा मुद्दा था।
क्या सरकार का फैसला आंदोलन की सभी मांगें पूरी करता है?
नहीं।
सरकार ने आंदोलन की कुछ प्रमुख मांगों पर तत्काल राहत दी है, लेकिन 100 प्रतिशत मूंग खरीदी की मांग और सरकार के 60 प्रतिशत के फैसले में अंतर बना हुआ है।
यही वजह है कि आंदोलन खत्म होने के बावजूद यह मुद्दा पूरी तरह खत्म माना जाना जल्दबाजी होगी।
अब वास्तविक परीक्षा सरकारी खरीद शुरू होने के दौरान होगी—कितने किसानों की उपज खरीदी जाती है, खरीद केंद्रों पर क्या व्यवस्था रहती है, किसानों को स्लॉट कितनी आसानी से मिलते हैं और बची हुई उपज का बाजार भाव क्या रहता है।
मूंग बेल्ट के किसानों पर इसका सबसे ज्यादा असर
मध्य प्रदेश में मूंग की खेती विशेष रूप से नर्मदापुरम, हरदा, रायसेन, सीहोर और आसपास के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है।
इसी वजह से आंदोलन का सबसे मजबूत आधार भी इन्हीं क्षेत्रों के किसान बने।
नर्मदापुरम से किसानों के भोपाल कूच और आंदोलन की शुरुआत ने यह स्पष्ट किया कि मूंग खरीदी का मुद्दा केवल एक स्थानीय शिकायत नहीं, बल्कि प्रदेश के महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
बुजुर्ग किसानों से लेकर युवा किसानों तक दिखी भागीदारी
इस आंदोलन की एक खास तस्वीर यह भी रही कि इसमें अलग-अलग पीढ़ियों के किसान दिखाई दिए।
जहां बुजुर्ग किसान पारंपरिक तरीके से आंदोलन और धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए सरकार तक अपनी बात पहुंचाते नजर आए, वहीं युवा किसान सोशल मीडिया, वीडियो और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए आंदोलन की जानकारी साझा करते रहे।
युवा किसानों के लिए ई-टोकन, पोर्टल, ऑनलाइन स्लॉट और डेटा जैसी समस्याएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण रहीं जितनी MSP और सरकारी खरीद।
इससे किसान आंदोलन का स्वरूप भी बदलता हुआ नजर आया—एक तरफ सड़क पर प्रदर्शन और दूसरी तरफ मोबाइल स्क्रीन पर डिजिटल अभियान।
क्या यह आंदोलन पूरे मध्य प्रदेश में फैल सकता था?
फिलहाल आंदोलन समाप्त हो चुका है, इसलिए तत्काल व्यापक विस्तार का सवाल खत्म हो गया है। लेकिन इसके मुद्दे केवल मूंग उत्पादक किसानों तक सीमित नहीं हैं।
मूंग की MSP खरीद मुख्य रूप से उन क्षेत्रों को प्रभावित करती है जहां इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। दूसरी ओर खाद की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था का असर प्रदेश के लगभग हर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि भविष्य में यदि खाद, MSP, सरकारी खरीदी या पोर्टल संबंधी समस्याएं फिर सामने आती हैं तो अलग-अलग किसान संगठन इन मुद्दों को दोबारा आंदोलन का आधार बना सकते हैं।
सरकार के लिए आगे की चुनौती क्या है?
सरकार ने फिलहाल आंदोलन को खत्म कराने में सफलता हासिल कर ली है, लेकिन असली चुनौती अब फैसलों को जमीन पर लागू करने की है।
तीन मुद्दे सबसे अहम रहेंगे—
पहला, 60 प्रतिशत मूंग खरीदी की प्रक्रिया कितनी सहज रहती है।
दूसरा, जिन किसानों की बाकी उपज सरकारी खरीद में शामिल नहीं होगी, उन्हें बाजार में क्या कीमत मिलती है।
तीसरा, ई-टोकन व्यवस्था को स्थगित करने के बाद खाद वितरण की वैकल्पिक व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होती है।
यदि किसानों को खरीद केंद्रों पर फिर लंबी कतार, स्लॉट की समस्या, गुणवत्ता जांच, भुगतान में देरी या खाद की कमी जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ा, तो सरकार का मौजूदा फैसला भी नए विवाद को जन्म दे सकता है।
आंदोलन ने सरकार को क्या संदेश दिया?
भोपाल का यह किसान आंदोलन संख्या के लिहाज से देशव्यापी किसान आंदोलन नहीं था, लेकिन इसने मध्य प्रदेश की कृषि नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों को सामने ला दिया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि MSP पर सरकारी खरीद का लाभ किसान की पूरी वास्तविक उपज तक किस हद तक पहुंचता है?
दूसरा सवाल डिजिटल सिस्टम का है—क्या ऑनलाइन टोकन और पोर्टल किसानों की सुविधा के लिए बनाए जा रहे हैं या वे खुद एक नई बाधा बन रहे हैं?
तीसरा सवाल प्रशासन और आंदोलन के बीच संवाद का है। किसानों का आरोप रहा कि उन्हें अपनी बात रखने के लिए राजधानी तक आना पड़ा। सरकार की ओर से बातचीत और फैसले के बाद आंदोलन समाप्त हुआ।
अब आगे क्या करेंगे किसान?
फिलहाल सरकार के 60 प्रतिशत खरीद और ई-टोकन स्थगित करने के फैसले के बाद किसानों ने आंदोलन समाप्त कर दिया है।
लेकिन 100 प्रतिशत खरीद की मूल मांग पूरी नहीं हुई है। इसलिए किसान संगठनों की नजर अब सरकारी खरीद की वास्तविक प्रक्रिया पर रहेगी।
यदि किसानों को 60 प्रतिशत सीमा के भीतर खरीद में भी परेशानी आती है या बची हुई उपज के दाम MSP से नीचे जाते हैं, तो आंदोलन का मुद्दा दोबारा उठ सकता है।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश का किसान आंदोलन फिलहाल सड़क से हट गया है, लेकिन विवाद की मूल जड़ पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
सरकार ने 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत मूंग खरीदी, ई-टोकन व्यवस्था स्थगित की और खरीद-स्लॉट की समयसीमा बढ़ाकर तत्काल राहत दी है। दूसरी तरफ किसानों की मूल मांग 100 प्रतिशत सरकारी खरीद की रही है।
इसलिए आने वाले दिनों में सबसे अहम सवाल यही रहेगा—क्या 60 प्रतिशत खरीदी का सरकारी फैसला किसानों की वास्तविक परेशानी को कम कर पाएगा, या खरीद सीजन शुरू होते ही 100 प्रतिशत बनाम 60 प्रतिशत की बहस फिर सड़कों पर लौटेगी?
news desk MPcg